उद्यमिता में बाधाएँ - Barriers to Entrepreneurship
उद्यमिता में बाधाएँ - Barriers to Entrepreneurship
प्रत्येक उद्यम की स्थापना उसको सफल करने के सपने तथा बड़ी-बड़ी उम्मीदों व आशाओं के साथ की जाती है। परंतु इस कार्य के लिए अनेक प्रयत्न करने पड़ते हैं जो आसान कार्य नहीं होता इस प्रक्रिया में उद्यमी को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उद्यमिता की प्रक्रिया उद्यम की सफलता को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। उद्यमिता से संबंधित कुछ मुख्य समस्याएँ इस प्रकार हैं:
1. नियामक संबंधी बाधाएं हमारे देश की औद्योगिक इकाइयों पर सरकार का नियंत्रण भी रहता है। - सरकार यह कार्य स्वयं करती है अथवा इस संबंध में अलग-अलग नियमों का निर्माण करती है जिनकी पालना करना अनिवार्य होता है। सरकार का नियंत्रण व्यवसाय के कई तत्त्वों पर होता है; जैसे नए व्यापार का बाजार में प्रवेश, लाइसेंस जारी करना, सरकार को रिपोर्ट जमा करना, खाते तैयार करना, उनका प्रकाशन करना,
व्यापार का पंजीकरण आदि। यह कार्य व्यवसायियों को विभिन्न कार्यवाहियाँ पूरी तथा भिन्न-भिन्न फार्म भरकर करना होता है ये कानूनी कार्य आसान न होकर जटिल होते हैं। उद्यमी इनको पूरा करते समय इनके लाभ तथा हानि की तुलना करता है। इसके लिए कई समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इसी प्रकार सरकार द्वारा विभिन्न उद्योगों को जारी किए जाने वाले प्रोत्साहन आदि प्राप्त करने के लिए भी आवश्यक कानूनी औपचारिकताएँ पूरी करनी होती हैं। उन्हें कई तरह की परियोजनाएँ जमा करवानी पड़ती हैं। इसके लिए काफी समय एवं लागत भी लगती है। इस तरह के कार्यों से उद्यमिता की भावना को उद्यम में परिवर्तित होने में प्रोत्साहन की अपेक्षा हताशा मिलती है।
2. विलय तथा अधिग्रहण हमारे देश में विलय, एकीकरण, अधिग्रहण, समझौते आदि पर नियंत्रण रखने के लिए सरकार ने विभिन्न नियम एवं अधिनियम बनाए हुए हैं।
लेनिक ये मुख्य रूप से बड़े उद्यमों के लिए ही हैं। ये अधिनियम लघु तथा मध्यम स्तर की इकाइयों पर ज्यादा प्रभावी नहीं है। इन नियमों की लोचशीलता उद्यमिता को उद्यम के लिए सही दिशा में प्रयास करने से रोकती है। इससे उद्यमियों में यह भावना उत्पन्न हो जाती है कि उनके द्वारा तैयार व स्थापित किया गया व्यवसाय बड़े व्यावसायियों द्वारा हथिया लिया जाएगा। इसके अतिरिक्त छोटे उद्यमी बड़े उद्यमियों का प्रतियोगिता में भी मुकाबला नहीं कर सकते। इसलिए सरकार को विलय, अधिग्रहण, समझौते संबंधी नियमों को और अधिक पारदर्शक तथा प्रभावी बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
3. प्रतिस्पर्धा नीति – यह एक और क्षेत्र है जो छोटे तथा मध्यम स्तर के उद्यमियों के विकास में बाधा बनता है तथा उद्यमिता को भी हतोत्साहित करता है।
वर्तमान उद्यमियों में अधिकांश प्रतिस्पर्धा का सामना करते हैं तथा बाजार में गुणवत्ता वाले उत्पाद लाने का भी प्रयास करते हैं। परंतु बाजार में स्थापित बड़े आकार के व्यवसायी अपनी बाजार प्रभुता तथा सुदृढ़ वित्तीय स्थिति का फायदा उठाते हुए छोटे उद्यमियों को बाजार में स्थापित होने से रोकते हैं। इससे बाजार का वातावरण भी प्रतिकूल होता है तथा उद्यमिता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
4. दोषपूर्ण कर संरचना करों की ऊँची दरें आर्थिक क्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं तथा व्यवसायियों की लाभ की दर को भी कम करती हैं। ऊँची कर की दरों से व्यापार का लाभ कम होता है तथा वे ज्यादा विकास नहीं कर पाते हैं। इससे उनकी अल्पकालीन वित्तीय स्थिति भी प्रभावित होती है।
उद्यमी कर को भार समझने लगते हैं तथा इससे बचने के लिए गैर-कानूनी तरीक अपनाते हैं । इसका अर्थ यह नहीं कि करों की दर कम करने से ही समस्याएँ खत्म हो जाएँगी परंतु कर के क्षेत्र में एक संतुलित एवं व्यवहारिक एवं स्वीकार्य नीति से उद्यमिता को प्रोत्साहित अवश्य किया जा सकता है।
उपरोक्त वर्णित समस्याओं के अतिरिक्त उद्यमिता के क्षेत्र में बाधाओं को एक और तरह से वर्णित किया जा सकता है। कार्ल एच. वास्कर ने अपने शोध कार्य 'उद्यमिता राय राष्ट्रीय नीति' में उद्यमिता के क्षेत्र में निम्नलिखित बाधाओं के बारे में वर्णन किया है। ये बाधाएँ इस प्रकार से हैं:
1. स्वीकार्य परियोजनाओं की कमी,
2. बाजार के ज्ञान की कमी,
3. तकनीकी ज्ञान की कमी
4. प्रारम्भिक पूँजी की कमी,
5. व्यापार के ज्ञान की कमी,
6. अभिप्रेरण की कमी,
7. समय का दबाव,
8. वैधानिक बाधाएँ
9. एकाधिकार की उपस्थिति,
10. माता-पिता पर अधिक निर्भरता,
11. खराब गुणवत्ता वाले उत्पाद,
12. उच्च स्तर का जोखिम
13. रीतिरिवाज तथा प्रथाएँ.
14. संसाधनों की कमी,
15. संचार व्यवस्था की कमी।
अंत में यह कहा जा सकता है कि जब एक उद्यमी अपना व्यवसाय प्रारम्भ करता है तो पूर्ण उत्साह एवं मेहनत से कार्य करता है ताकि वह सफलता प्राप्त कर सके। यही सही उद्यमिता भी होती है। परंतु जैसे जैसे वह व्यवसाय के क्षेत्र में आगे बढ़ता है, तथा वास्तविक रूप में चुनौतियों का सामना करता है तो अक्सर वह हतोत्साहित हो जाता है। व्यवसाय में प्रतियोगिता, निरंतर हानि, जटिलता पूर्ण कानूनी कार्यवाहियाँ उद्यमी और उद्यमिता दोनों को ही समस्याओं में डाल देती है। सरकार द्वारा किए जा रहे संपूर्ण प्रयासों के द्वारा देश में उद्यमिता को बढ़ावास देने का पूरा प्रयास किया जाता है, परंतु इसके बावजूद भी देश में सफल उद्यमियों की संख्या बहुत अधिक देखने को नहीं मिलती।
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