कंपनी निर्माण की प्रक्रिया - company formation process

कंपनी निर्माण की प्रक्रिया - company formation process


कंपनी के वैधानिक रूप से जन्म लेने का आशय उस व्यवस्था से लगाया जाता है, जब कंपनी स्वयं अस्तित्व में आ जाती है। कंपनी के अस्तिव में आने के लिए इसका पंजियन कराना तथा इसका प्रमाण-पत्र प्राप्त करना अनिवार्य होता है। इस प्रकार कंपनी का वैधानिक को इस पंजीकृत कराया जाता है। इस तिथि का उल्लेख समामेलन प्रमाण पत्र में होता है। कंपनी के निर्माण के संबंध में अनेक शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जैसे फ्लोटेशन, फारमेशन, इनकारपोरेशन, रजिस्ट्रेशन इत्यादि। कंपनियों का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है।


कंपनी निर्माण की अवस्थाएँ


कंपनी के निर्माण संबंधी कार्यवाही को निम्नलिखित अवस्थाओं में विभाजित किया जा सकता है


1. प्रवर्तन


2. समामेलन अथवा पंजीकरण


3. पूँजी अभिदान


1. प्रवर्तन :- प्रवर्तन कंपनी के निर्माण की प्रथम सीढ़ी है। गर्सटनबर्ग के अनुसार, "प्रवर्तन में व्यावसायिक सुअवसरों की खोज की जाती है और तलश्चात लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से पूँजी, संपत्ती तथा प्रबंधन क्षमता को एक व्यावसायिक संगठन के रूप में संगठित किया जाता है।" प्रवर्तन कार्य की शुरूआत उस समय से हो जाती है जब किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के मस्तिष्क में किसी ऐसे व्यावसायिक विचार की उत्पत्ति होती है

जो एक कंपनी द्वारा लाभपूर्वक चलाया जा सकता हो तथा इसके बाद विचार की क्रियात्मकता के बारे में प्रारंभिक एवं विस्तृत जाँच, व्यावसायिक तत्वों को एकत्रीकरण और उपक्रम को चालु करने के लिए आवश्यक पूँजी जुटाने की योजना बनाना आदि कार्य भी प्रवर्तन के अंतर्गत सम्मिलित हैं। वह व्यक्ति जो उक्त कार्य के संबंध में प्रमुख उत्तरदायित्व लेते हैं, प्रवर्तक कहलाते हैं।


प्रवर्तक


कंपनी अधिनियम की धारा 2 (69) में प्रवर्तक शब्द की परिभाषा दी गयी है। इस परिभाषा के अनुसार


प्रवर्तक का आशय ऐसे व्यक्ति से है - > जिसका नाम विवरण पत्रिका में इस रूप में लिखा गया हो; अथवा जिसे कंपनी द्वारा वार्षिक विवरणी में पहचान वाया गया हो; अथवा


जिसका शेयरधारक, संचालन या अन्यथ रूप में प्रत्यक्ष तथा या अप्रत्यक्षताया कंपनी के काम-काज पर नियंत्रण हो; अथवा


• जिसकी सलाह, निर्देशों या निदेशों के अनुरूप संचालक मंडल कार्य करता हो । बोवेन, एल. जे. के शब्दों में, “प्रवर्तक शब्द कानूनी शब्द न होकर व्यापारिक शब्द है, यह अनेक व्यापार संबंधी क्रियाओं को एक शब्द से व्यक्त करता है जो व्यापारिक जगत में प्रचलित है एवं जिनके द्वारा कंपनी सामान्यतः अस्तित्व में लाई जाती है।"


प्रायः प्रवर्तक एक औद्योगिक विशेषज्ञ होता है, जो दक्ष विशेषज्ञों की सहायता से वे सारे प्रारंभिक कार्य करता है जो कंपनी की स्थापना करने से पहले करने आवश्यक हैं। वह जापन-पत्र पर हस्ताक्षर करने तथा प्रथम संचालन बनने को तैयार व्यक्ति का चुनाव करता है। वह कंपनी का नाम उद्देश्य पूँजी एवं पंजीकृत कार्यालय का निश्चय करता है तथा ज्ञापन पत्र, अन्तर्नियमावली एवं समामेलन के लिए अन्य ऐसे आवश्यक प्रलेखों को पॉलिसिटर से कहकर तैयार कराता है जो कंपनी रजिस्ट्रार के पास फाइल किये जाने होते हैं। वह पंजीकरण संबंधी व्यय करने हेतु आवश्यक धन का प्रबंध करता है तथा कंपनी की प्रारंभिक पूँजी करने का प्रबंध भी करता है।