उद्यमिता की वैचारिक संरचना - conceptual structure of entrepreneurship

उद्यमिता की वैचारिक संरचना - conceptual structure of entrepreneurship


उद्यमिता एक जटिल अवधारणा है। इसकी स्पष्ट परिभाषा दिया जाना एक कठिन कार्य है क्योंकि इसके बारे में अलग-अलग विद्वानों के अलग-अलग विचार हैं। प्रत्येक व्यक्ति की इसके बारे में अपनी एक अलग विचारधारा है। निम्नलिखित तरीकों से उद्यमिता की अवधारणा का वर्णन किया जा सकता है:


1. आर्थिक मत – उद्यमिता एक व्यवसाय की स्थापना की प्रक्रिया से शुरू होती है, इसमें संसाधनों को इकट्ठा किया जाता है तथा उससे संबंधित जोखिमों की जिम्मेदारी भी स्वीकार की जाती है। उद्यमिता शब्द 17वीं शताब्दी में फ्रांसीसी शब्द 'ऐट्रप्रेण्कर' से लिया गया है जो उन व्यक्तियों के बारे में वर्णन करता है जो नए उद्यमों के जोखिमों की जिम्मेदारी उठाते हैं। 1776 में एडम स्मिथ ने अपने महान ग्रंथ 'वेल्थ ऑफ नेशन्स' में उल्लेख किया है कि उद्यमी वह व्यक्ति है जो किसी संगठन का निर्माण व्यावसायिक उद्देश्यों हेतु करता है। वह असाधारण दूरदर्शी होता है

तथा वस्तुओं तथा सेवाओं की सम्भावित माँग का अनुमान लगा सकता है। वह आर्थिक परिवर्तनों पर अपनी प्रतिक्रिया देता है, तथा आर्थिक एजेंट के रूप में कार्य करते हुए माँग का अनुमान लगा सकता है। वह आर्थिक परिवर्तनों पर अपनी प्रतिक्रिया देता है, तथा आर्थिक एजेंट के रूप में कार्य करते हुए माँग को प्रभावशाली ढंग से पूर्ति में परिवर्तित कर देता है। एक अन्य आस्ट्रेलियन अर्थशास्त्री जोसेफ शुम्पीटर ने अपने शोध कार्य, 'आर्थिक विकास के सिद्धांत में वर्णित किया है "उद्यमी सृजनात्मकता विन्यास की ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा निर्माण की वर्तमान विधियों का विनाश कर नई विधियों का सृजन किया जाता है।” उद्यमिता एक प्रक्रिया होती है तथा उद्यमी नवप्रवर्तक होते हैं जो इस प्रक्रिया को संसाधनों के नए संयोजन एवं व्यापार की नई विधियों द्वारा यथास्थिति का विनाश करते हैं।


2. सामाजिक मत सामाजशास्त्री उद्यमिता को एक आदर्श निष्पादन की प्रक्रिया मानते हैं। उनके अनुसार उद्यमी समाज की आशाओं, ग्राहकों की इच्छाओं, मानवीय मूल्यों तथा शिशु पोषण आदि तत्त्वों द्वारा प्रभावित एवं शासित हुए माने जाते हैं। थॉमस काचरोन ने अपने एक संबंधित अध्ययन 'आर्थिक परिवर्तन में उद्यमी उद्यमिता के इतिहास की खोज, 1965 में वर्णित किया है कि उद्यमी समाज के आदर्श व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है। उसका कार्य निष्पादन उसके अपने पेशे के प्रति रुझान, स्वीकारक समूह की अपेक्षाओं तथा कार्य की पेशेवर आवश्यकताओं पर बहुत हद तक निर्भर करता है। समाज के मूल्य ही उन रुचियों एवं आदर्श अपेक्षाओं को निर्धारित करते हैं।


3. मनोवैज्ञानिक मत- इस मत के अंतर्गत मैक्कलैण्ड तथा हैमन द्वारा विकसित विचारधारा का वर्णन किया जा सकता है, 1961 में अपने शोध कार्य 'सफलता को अग्रसर समाज' में उन्होंने कहा कि, कुछ उपलब्ध करने की चाह ही लोगों को असाधारण कार्यों के प्रति अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है। उपलब्धि उद्देश्य को मूल रूप से शिशु पालन परमपराओं द्वारा मापा जा सकता है; जैसे - श्रेष्ठता के प्रमाप, आत्मनिर्भरता, प्रशिक्षण एवं पिता पर कम निर्भरता आदि। वे व्यक्ति जो ऊँचे स्तर तक पहुँचने की इच्छा रखते हैं, वे अधिक जोखिम उठाते हैं, जिम्मेदारी वहन करने की इच्छा रखते हैं तथा कार्य निष्पादन के तीव्र इच्छा जैसे कार्यों में रुचि दिखाते हैं।