कार्यशील पूँजी की आवश्यकता के निर्धारक तत्त्व - Determinants of Working Capital Requirement

कार्यशील पूँजी की आवश्यकता के निर्धारक तत्त्व - Determinants of Working Capital Requirement


कार्यशील पूँजी की आवश्यकता अनेक तत्त्वों पर निर्भर करती है। सामान्यतः उद्यम की कार्यशील पूँजीको निम्नलिखित तत्त्व प्रभावित करते हैं:


(1) व्यवसाय की प्रकृति : किसी उद्यम की कार्यशील पूँजी की आवश्यकताएँ उसकी प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न होती हैं। उदाहरण के लिए जनोपयोगी संस्थाओं की कार्यशील पूँजी की मात्रा बहुत सीमित होती है क्योंकि इनमें केवल नकद बिक्री होती है और ये संवाएँ प्रदान करती हैं। इनको सेवाओं के बदले तुरंत भुगतान प्राप्त हो जाता है और स्कंधों की आवश्यकता नहीं होती। इसी प्रकार, व्यापारिक संस्थाओं को अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता है क्योंकि उन्हें नकदी, स्टॉक तथा देनदार रखने पड़ते है। लेकिन निर्माणी संस्थाओं को बहुत अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है क्योंकि संचालन चक्र में राशि निवेशित रहती है।


(2) उद्यम का आकार उद्यम का आकार जितना बड़ा होगा उतनी ही कार्यशील पूँजी की आवश्यकता अधिक होगी। किसी उद्यम के आकार को उसकी व्यावसायिक क्रियाओं के आकार के आधार पर मापा जा सकात है।


( 3 ) विकास एवं विस्तार : जैसे-जैसे उद्यम का विकास होता है वैसे-वैसे कार्यशील पूँजी की आवश्यकता अधिक होती है। विकासशील उद्योगों को अपनी व्यावसायिक क्रियाओं के विस्तार के लिए अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है।


(4) संचालन चक्र: रोकड़ को दोबारा रोकड़ में परिवर्तित करने के लिए विभिन्न अवस्थाओं जैसे कि कच्चा माल, अर्द्ध-निर्मित माल, निर्मित माल, विक्रय, देनदार, रोकड़ आदि से होकर गुजराना पड़ता है। इस संचालन चक्र की अवधि जितनी लंबी होगी, कार्यशील पूँजी की आवश्यकता भी उतनी ही अधिक होगी।


(5) उधार विक्रय की शर्तें: कार्यशील पूँजी की मात्रा के निर्धारण में यह एक महत्त्वपूर्ण घटक है। यदि कोई उद्यम विक्रय के संबंध में उदार साख नीति अपनाता है तो देनदारों में निवेशित राशि भी अधिक होगी। इसका अर्थ है कि उदार साख नीति से अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है। दूसरी तरफ, यदि उधार केवल चुनिंदा तथा विश्वासपात्र ग्राहकों को ही दिया जाता है तो कार्यशील पूँजी की आवश्यकता भी कम होगी।


(6) उधार क्रय शर्तें: यदि कच्चे माल की आपूर्ति लंबे समय के लिए उधार में उपलब्ध हो तो कार्यशील पूँजी की आवश्यकता कम होती है। इसके विपरीत कच्चा माल उधार पर उपलब्ध न होने पर या कम समय के लिए उधार माल मिलने पर कार्यशील पूँजी की आवश्यकता अधिक होती है।


(7) उत्पादन नीति : कार्यशील पूँजी की मात्रा उत्पादन नीति पर भी निर्भर करती है। यदि माल का उत्पादन माँग के समय ही किया जाता है तो कार्यशील पूँजी की आवश्यकता कम होती है। इसके विपरीत, यदि माल का उत्पादन वर्ष भर होता रहता है तो स्टॉक माँग के मौसम तक इकट्ठा होता रहता है जिसमें अधिक राशि निवेशित रहती है अर्थात कार्यशील पूँजी की आवश्यकता अधिक होगी।


(8) कच्चे माल की उपलब्धता यदि उद्यम द्वारा कच्चा माल आसानी से तथा नियमित रूप से : प्राप्त किया जा सकता है

तो ऐसे माल का अधिक मात्रा में स्टॉक रखने की आवश्यकता नहीं होती जिससे कि कार्यशील पूँजी की आवश्यकता भी कम होगी। इसके विपरीत, यदि कच्चा माल विशेष मौसम में ही उपलब्ध होता है तो उद्यम को अधिक मात्रा में स्टॉक रखने की आवश्यकता होगी जिससे कि कार्यशील पूँजी की आवश्यकता भी अधिक होगी।


(9) उत्पादन तकनीक : यदि उत्पादन में श्रमिकों का प्रयोग अधिक होता है तो कार्यशील पूँजी भी अधिक मात्रा में आवश्यक होती है क्योंकि मजदूरी का भुगतान करना पड़ता है। इसके विपरीत, यदि उत्पादन में श्रमिकों के बजाए मशीनों का अधिक का अधिक प्रयोग होता है तो कम कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होगी।


(10) आकस्मिकताएँ: यदि किसी उद्यम के उत्पादों की माँग तथा मूल्य घटता-बढ़ता रहता है तो इसके लिए आकस्मिक प्रावधान बनाने की आवश्यकता होती है। प्रावधान बनाने के लिए अतिरिक्त कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है।