प्रभार , प्रभार एवं बधक में अतंर - Difference between charge, charge and mortgage

प्रभार , प्रभार एवं बधक में अतंर - Difference between charge, charge and mortgage


प्रभार : ऋण लेने के लिए प्रतिभूति अथवा जमानत कंपनी द्वार लिए गए ऋण अरक्षित अथवा रक्षित हो सकते हैं। यदि ऋण अरक्षित हो तो मूल राशि या ब्याजकी अदायगी में कोई चूक होने पर लेनदार को कंपनी पर केवल मुकदमा करने का अधिकार होता है। कंपनी की वित्तीय स्थिति बिगड़ जाने पर अरक्षित ऋणदाता सुरक्षित नहीं होते है। यदि ऋण रक्षित हो तो भुगतान में कोई चूक होने पर लेनदार को अपनी जमानत या प्रतिपूर्ति प्रवर्तित करने का अधिक सुदृढ़ रहती है क्योंकि कंपनी के विरूद्ध कार्यवाही करने के अपने अधिकार के अतिरिक्त उसे कंपनी की उस संपत्ति पर भी दावा करनेका अधिकार होता है जो प्रतिभूति के रूप में दी गई हो।


धारा 2(16) में दी गई परिभाषा के अनुसार, प्रभार से किसी कंपनी या इसके किन्हीं उपक्रमों या दोनों की संपत्ति या आस्तियों पर प्रतिभूति के रूप में सृजित हित या ग्रहणाधिकार अभिप्रेत है तथा इसमें बंधक भी शामिल है।


प्रभार एवं बधक में अतंर


प्रभार से ऋणदाता को विशिष्ट संपत्ति या निधि में से भुगतान का अधिकार प्राप्त होता है जिसे ऋणदाता न्यायालय के माध्यम से लागू करा सकता है यदि ऋण का भुगतानन किया जाये। दूसरी ओर बंधक में विशिष्ट अचल संपत्ति में ऋणदाता को हित का अंतरण किया जाता है। भुगतान में चूक करने की दशा में ऋणदाता, न्यायालय के हस्तक्षेप के बिना बंधित संपत्ति को बेचने का अधिकार रखता है।


कंपनी की संपत्तियों पर निम्नलिखित दो प्रकार के प्रभार सृजित किया जा सकते है :


1) स्थायी बंधक अथवा प्रभार


2) अस्थायी अथवा चल प्रभार


1) स्थायी बंधक अथवा प्रभार : स्थायी बंधक अथवा प्रभार वह होता है जो भवन अथवा भारी मशीनों आदि जैसी स्थिर किस्म की किसी विशिष्ट अथवा निश्चित संपत्ति पर सृजित किया जाता है तथा इसके अनुसार कंपनी इस प्रकार बंधक रखी गई संपत्ति को बंधक ऋण के भार से मुक्त नहीं बेचल सकती। इस प्रकार का बंधक कानूनी अथवा साम्यिक हो सकता है:


i) कानूनी स्थायी बंधक अथवा प्रभार-कानूनी स्थायी बंधक अथवा प्रभार इसके अंतर्गत बंधक रखी गई संपत्ति का कब्जा दिए गैर संपत्ति का पूर्ण कानूनी स्वामित्व लेनदार को अंतरित किया जाता है और देनदार ब्याज सहित ऋण का भुगतान करने पर पूर्ण कानूनी स्वामित्व पुनः प्राप्त करनेका अपना अधिकार आरक्षित रखता है। ऐसा बधक एक 'बंधक विलेख' निष्पादित करके प्रभावी बनाया जाता है और इसे कंपनियों के रजिस्ट्रार के पास पंजीकृत कराना पड़ता है।


(ii) साम्यिक स्थायी बंधक अथवा प्रभार : - इसका अर्थ किसी ऐसे बंधक से है जो ईमानदारी और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतो पर आधारित हो। ऐसे बंधक के अंतर्गत बंधन संपत्तिका कानूनी स्वामित्व और कब्जा लेनदार को अंतरित किए बगैर संपत्ति के स्वात्वाधिकार- विलेख उसके पास जमानत के रूप में जमा कर दिए जाते हैं और साथ ही बंधक से राशि का भुगतान तय की गई तिथि पर न कर सकने की स्थिति में बंधककर्ता जमा ज्ञापन पत्र के माध्यम से एक कानूनी बंधक विलेख निष्पादित करने का वचन देता है।

धारा 77 के अधीन इस प्रकार केबंध को कंपनियोंके रजिस्ट्रार के पास पंजीकृत कराना पड़ता है। इस प्रार की जमानत अत्यंत सहज होती है और इससे शीघ्र ऋण प्राप्तकरने में सुविधा रहती है क्योंकि इसमें बंधक विलेख' निष्पादित करने की आवश्यकता नहीं होती। चल प्राभार किसी कंपनी की वर्तमान तथा भावी चल संपत्तियों पर साम्यिक प्रभार होता है।


यह कंपनी की सामान्य संपत्तियों पर प्रभार होता है इसके अंतर्गत सभी संपत्तियां आ जाती है चाहे वे स्थायी प्रभाराधीन हों अथवा नहीं और प्रभारित संपत्तियों पर यह प्रभार चलायमान रहता है। चल प्रभार तब तक किसी विशेष संपत्ति से संबद्ध नहीं होता जब तक कि इसे स्थायी प्रभार में बदलने वाली घटित हो जाती है।


चल प्रभार का मुख्य लाभ यह है जब तक प्रभार स्थित पर धारण नहीं कर लेता, तब तक कंपनी सामान्य व्यापार के दौरान इस प्रकार प्रभावित की गई संपत्तियों में अपनी इच्छा से चधोचित व्यवहार करती रह सकती है।