संचालक , संचालकों की कानूनी स्थिति - Director, Legal Status of Operators

संचालक , संचालकों की कानूनी स्थिति - Director, Legal Status of Operators


कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 (34) के अनुसार, " संसचालक एक ऐसा व्यक्ति है जो संचालक की हैसियत से कंपनी के संचालक मंडल में नियुक्त किया जाता है।" यह परिभाषा संतोषप्रद नहीं है। अतः इसे इसप्रकार परिभाषित किया जा सकता है, " संचालक व्यक्तियों में से एक व्यक्ति होता है जो किसी कंपनी की नीति अथवा प्रबंधन को निदशित करने, अधिशासित करने अथवा नियंत्रित करने के लिए उत्तरदायी होता है।' इन संचालकों को सामूहिक रूप से 'संचालक मंडल' कहा जाता है। संचालक मंडल कंपनी की उच्चतम प्रशासकीय इकाई होती है। धारा 179 के अंतर्गत किसी कंपनी के व्यवसाय का प्रबंधन स्पष्ट तथा उसके संचालकों को सौपा गया है। संचालकों का चुनाव हो जाने पर शेयरधारियों का कार्य लगभग समाप्त हो जाता है। वस्तुत: कंपनी की नीति निर्धारित करने और निर्णय लेने के मामले में संचालक मंडल कंपनी की उच्चतम इकाई है।

1234

संचालकों की कानूनी स्थिति


कंपनी के संचालकों की वास्तविक कानूनी स्थिति का यथार्थ चित्रण करना अत्यंत कठिन है। एल.जे. बोवन के अनुसार संचालकों की कभी एजेंटों, कभी न्यासियों और कभी-कभी प्रबंधक साझेदारों की संज्ञा दी जाती है। परन्तु इनमें से कोई भी अभिव्यक्ति उनकी संपूर्ण शक्तियों व दायित्वों को पूर्ण रूप से बयान नहीं कर पाती अपितु इनका प्रयोग किसी एक समय पर अथवा किसी विशेष उद्देश्य के लिए इन व्यक्तियों के प्रति अपनाए गए उपयोगी दृष्टिकोण का संकेत देने के लिए किया जाता है।” संचालकों की स्थिति का विस्तृत विवरण निम्ननलिखित है:


एजेन्टों के रूप में – एल.जे कैर्नस के अनुसार संचालक कंपनीके केवल एजेन्ट होते हैं। कंपनी स्वयं किसी व्यक्ति के रूप में काम नहीं कर सकती क्योंकि यह व्यक्ति होती ही नहीं। कंपनी केवल अपने संचालकों के माध्यम से काम कर सकती है और जहाँ तक उन संचालकों एजेंट का साधारण मामला है। जहाँ कहीं एजेंट दायी होता है वहा संचालक भी दायी होंगे और जहाँ कहीं दायित्व स्वामी का ठहराया जाएगा, वह दायित्व कंपनी का दायित्व होगा......।" इसलिए संचालकों को कंपनी के एजेंटों की संज्ञा दी गई है। एजेन्ट के रूप में, संचालकों को कंपनी का कामकाज अनिवार्यतः समुचित सावधानी और कर्मनिष्ठा के साथ करना चाहिए एवं कंपनी के ज्ञापन पत्र तथा अंतर्नियमावली का अनुपालन करना चाहिए।


प्रबंधन साझेदारों के रूप में:- संचालक शेयरधारियों के प्रतिनिधि के रूप में चुने जाने के कारण प्रबंधक साझेदारों के रूप में होते हैं।

स्वयं महत्वपूर्ण शेयरधारी होने के कारण भी वे अन्य शेयरधारियों के साझेदार बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त संचालक, शेयर आबंटित करने, मांग करने और शेयर जब्त करने आदि जैसे स्वामित्वपूर्ण कार्य भी करते हैं जो उनके प्रबंधक साझेदार होने का प्रतीक है।


न्यासियों के रूप में:- कुछ पहलुओं से संचालक कंपन के लिए न्यासियों की हैसियत से कार्य करते हैं। वी.सी. बैकन के अनुसार, " संचालकों का, जो कंपनी के न्यासी होते हैं, यह स्पष्ट कर्तव्य है कि वे कंपनी के न्यासी होते हैं, यह स्पष्ट कर्तव्य है कि वे कंपनी से संबंधित करोबार के सभी मामलों पर स्वयं अपने व्यक्तिगत हितों के लिए नहीं अपितु कंपनी के हित में कार्यवाही करें।" संचालकों की अलभग सभी शक्तियां जैसे- शेयर आबंटित करना,

मांग करना, अंतरण स्वीकार अथवा अस्वीकार करना आदि न्यासवत शक्रियां है जिन्हें सद्भावना से कंपनी के हित में प्रयोग करना पड़ता है। परन्तु यह उल्लेखनीय है कि संचालकगण व्यक्तिग शेयरधारियों के लिए अथवा कंपनी के साथ संविदा करने वाले अन्य व्यक्तियों के लिए न्यासियों की स्थिति में नहीं होते। वे केवल कंपनी के लिए ही न्यासी होते है।


अतः वास्तविक दृष्टि से संचालक पूर्ण रूपेण न तो एजेन्ट है और न ही प्रबंधक साझेदार अथवा स्वामी और नहीं न्यासी। उनमें ये सभी हैसियतें एक साथ रहती है। वास्तव में वे कंपनी के प्रति विश्वासास्तित संबंध रखते हैं और अधिक से अधिक उन्हें कंपनी का उच्च अधिकारी कहा जा सकता है।