समष्टि वातावरण के तत्व - elements of macro environment
समष्टि वातावरण के तत्व - elements of macro environment
समष्टि वातावरण से तात्पर्य व्यवसाय के सामान्य वातावरण से हैं। समष्टि वातावरण में पाए जाने वाले मुख्य घटक आर्थिक वातावरण, राजनीतिक वातावरण, सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण, तकनीकी वातावरण, जनांकिकीय तथा अंतर्राष्ट्रीय वातावरण आदि हैं। ये सभी मिलकर व्यवसाय को प्रभावित करते हैं । हिल व जोन्स के अनुसार, “समष्टि वातावरण में सभी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, कानूनी, जनांकिकीय तथा तकनीकी इकाइयाँ कार्य करती हैं।" समष्टि वातावरण में निम्नलिखित तत्वों को शामिल किया जाता है।
1. आर्थिक वातावरण आर्थिक वातावरण से तात्पर्य ग्राहकों की खरीदने की क्षमता और उसे खर्च करने की इच्छा से है, जिसके कारण प्रभावी माँग उत्पन्न होती है जो अपने आप में आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होती है। अतः आर्थिक दशाएँ एक व्यवसाय की सफलता पर बहुत अधिक प्रभाव डालते हैं।
आर्थिक वातावरण का अभिप्राय उन आर्थिक तत्वों से है जिनका व्यवसाय के कार्य संचालन पर प्रभाव पड़ता है; जैसे आर्थिक व्यवस्था, आर्थिक नीति, अर्थव्यवस्था की प्रकृति, व्यापार चक्र, आय और धन का वितरण आदि। आर्थिक वातावरण एक जटिल व गतिशील विषय है, जो निरंतर परिवर्तित होता रहता है। इसमें मुख्य रूप से आर्थिक व्यवस्था तथा आर्थिक नीतियों एवं स्थितियों को शामिल किया जाता है। उन्हें भी यहाँ वर्णित किया गया है।
• आर्थिक व्यवस्था किसी देश की आर्थिक प्रणाली उसकी आर्थिक संरचना, आर्थिक विचारधारा तथा आर्थिक खुलेपन को दर्शाती है। किसी भी देश की आर्थिक व्यवस्था निम्न में से कोई भी हो सकसती है:
• पूँजीवादी - इस प्रणाली में अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र पर अधिक बल दिया जाता है।
निजी क्षेत्र अर्थव्यवस्था में अधिक प्रभुत्व रखते हैं। इसे खुली अर्थव्यवस्था भी कहा जाता है; जैसे- अमेरिका व इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था ।
• समाजवादी- इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में आर्थिक क्रियाएँ सरकार द्वारा संचालित की जाती हैं। सरकार की भूमिका ऐसी अर्थव्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण होती हैं।
• मिश्रित इस अर्थव्यवस्था में निजी व सार्वजनिक क्षेत्र मिलकर कार्य करते हैं। इसमें पूँजीवाद व समाजवाद दोनों का समावेश होता है।
आर्थिक नीतियाँ - आर्थिक नीतियों का अर्थ है संपूर्ण अर्थव्यवस्था के प्रति सरकार की नीति इन नीतियों का व्यवसाय पर अधिक प्रभाव पड़ता है। आर्थिक नीति सरकार एवं व्यवसाय के बीच समन्वय स्थापित करती है।
इन नीतियों का प्रभाव कुछ व्यवसायों के हित में होता है और कुछ के विपरीत तथा कुछ के लिए तटस्थ। आर्थिक नीतियों का मुख्य उद्देश्य विकास की गति को बनाए रखना, उसे बढ़ावा देना, आर्थिक स्थिरता प्राप्त करना, व्यापार संतुलन को बनाए रखना, रोजगार का सृजनात्मकता, अर्थव्यवस्था को प्रतिस्पर्धात्मक बनाना आदि होते हैं। इसके अंतर्गत सरकार द्वारा बनाई गई सभी महत्वपूर्ण नीतियाँ शामिल होती हैं; जैसे मौद्रिक नीति, राजकोषीय नीति, आयात-निर्यात नीति, विदेशी निवेश नीति, औद्योगिक नीति, औद्योगिक लाइसेंस नीति आदि । इन नीतियों के अतिरिक्त सरकार द्वारा व्यवसायों एवं उद्योगों पर नियंत्रण रखने के लिए विभिन्न अधिनियम पारित किए जाते हैं, जैसे- औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, कारखाना अधिनियम 1948, कंपनी अधिनियम 1956, (संशोधित 2013), उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986, विदेशी विनिमय प्रबंध अधिनियम 2000, प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 इस प्रकार ये सभी नीतियाँ देश की अर्थव्यवस्था में व्यवसायों को भी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। यदि इनका प्रभाव व्यवसाय पर अनुकूल पड़ता है तो व्यवसाय की सफलता की संभावना भी बढ़ जाती है। इसके विपरीत परिस्थितियों में उद्यम को परिस्थितियों के अनुरूप व्यवसाय को ढालना पड़ता है।
आर्थिक स्थितियाँ किसी भी अर्थव्यवस्था की आर्थिक स्थितियाँ व्यवसाय पर गहरा प्रभाव डालती हैं। आर्थिक स्थितियों के अनुरूप ही उद्यमी अपने व्यवसाय की कार्यप्रणालियाँ एवं नीतियाँ निर्धारित करता है। विभिन्न आर्थिक स्थितियाँ जैसे- आय का स्तर, आय का विवरण, माँग की प्रवृत्ति, व्यापार चक्र, उपभोग स्तर, बाजार का आकार, विदेशी व्यापार, विदेशी पूँजी, प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता आदि सभी व्यवसायों को प्रभावित करते हैं। यदि अर्थव्यवस्था में तेजी की स्थिति हो तो व्यापार में विकास का वातावरण बनता है तथा सफलता की संभावनाएँ भी बढ़ जाती है। इसी प्रकार यदि अर्थव्यवस्था में मंदी का वातावरण बनता है तो बाजार में माँग की कमी आ
जाती है तथा व्यवसायों पर उसका विपरीत प्रभाव देखने को मिलता है। इसलिए उद्यमी से यह आशा की जाती है कि वह देश के आर्थिक वातावरण को गहराई से समझे । अर्थव्यवस्था की प्रकृति, नीतियाँ और स्थितियाँ, सभी के बारे में उसे सजग रहना चाहिए। ये सभी तत्व व्यवसाय के प्रत्येक निर्णय को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं, अत: किसी भी स्तर में इनकी अवहेलना नहीं की जानी चाहिए।
यह स्वीकृत तथ्य है कि ये सभी उद्यमी के नियंत्रण में नही होते, परंतु उद्यमी सजग रहकर अपने व्यवसाय की सफलता बनाए रख सकता है।
2. राजनीतिक वातावरण राजनीतिक वातावरण देश के व्यावसायिक वातावरण को भी प्रभावित करता है। राजनीतिक वातावरण में मुख्यतः निम्नलिखित घटकों को शामिल किया जाता है :
1. सरकार का राजनीतिक दृष्टिकोण
2. देश में राजनीतिक स्थिरता
3. देश के अन्य राष्ट्रों के साथ संबंध
4. सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था
5. सरकार की कल्याणकारी योजनाएँ 6. सरकार की औद्योगिक नीतियाँ
7. केंद्र और राज्य सरकारों के संबंध
8. विपक्षी दलों का व्यवसाय के प्रति दृष्टिकोण
सरकार के राजनीतिक दृष्टिकोण से आशय, देश की विभिन्न आर्थिक व सामाजिक क्रियाओं के प्रति सरकार की विचारधारा एवं सोच से है। राजनीतिक दृष्टिकोण व्यावसायिक वातावरण पर प्रभाव डालता है। सरकार की विचारधारा यह निर्धारित करती है कि देश में किस तरह के व्यापार किए जाने चाहिए, कौन-सा क्षेत्र निजी क्षेत्र के लिए खुला रखा जाना चाहिए, किन क्षेत्रों को सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित रखा जाए, किन क्षेत्रों में विदेशी निवेश की अनुमति दी जानी चाहिए, आदि। ये सभी निर्णय व्यवसाय की सफलता पर प्रभाव डालते हैं। इसी प्रकार यदि देश का राजनीतिक स्थिति स्थिर है तथा सरकार योग्य एवं ईमानदार है, तथा वह समाज में लोगों की व्यक्तिगत सुरक्षा तथा व्यावसायिक इकाइयों की सुरक्षा के साथ-साथ अच्छा आर्थिक महौल भी प्रदान करती है तो इससे आर्थिक विकास में वृद्धि होती है। इससे व्यवसायों के लिए भी सकारात्मक माहौल तैयार होता है। राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति में दीर्घकालीन योजनाओं का निर्माण संभव नहीं होता।
इस स्थिति में दूसरे देशों के साथ संबंध भी प्रभावित होते हैं। जो विदेशी व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं । यिद दूसरे देशों के साथ संबंध अच्छे हों तो विदेशी व्यापार को भी बढ़ावा मिलता है। देश के सुरक्षा बजट में भी तभी कमी संभव हो पाती है तथा वह राशि देश में ढाँचागत सुविधाएँ उपलब्ध करवाने पर खर्च की जा सकती है। स्थिर सरकार औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न कटौतियाँ, रियायतें, प्रोत्साहन आदि देती है, जिससे उद्यमिता को भी बढ़ावा मिलता है। ऐसा विपरीत परिस्थितियों में होना संभव नहीं हो पाता ।
एक सफल उद्यमी होने के लिए उससे यह आशा की जाती है कि वह देश की राजनीतिक परिस्थितियों पर भी अपनी नज़र बनाए रखे। इससे उसे राजनीतिक परिवर्तनों के अनुसार व्यवसाय पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में सहायता मिलेगी तथा वह परिस्थितियों का सामना अच्छेसे कर सकेगा।
3. सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण व्यवसाय सामज का एक अभिन्न अंग है तथा दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। यह एक महत्वपूर्ण गैर आर्थिक घटक है, जो बाहरी वातावरण से संबंधित है। सामाजिक तथा सांस्कृतिक वातावरण का अभिप्रायः सामाजिक और सांस्कृतिक तत्वों के व्यावसायिक इकाई पर पड़ने वाले प्रभाव से है। इस वातावरण में मुख्य रूप से परिवारिक व्यवस्था, शिक्षा, जाति प्रथा, विवाह, आदतें, प्राथमिकताएँ, भाषा, शहरीकरण, रीति-रिवाज एवं प्रथाएँ तथा सामाजिक प्रवृत्तियाँ आदि को शामिल किया जाता है। संस्कृति किसी भी समाज के लोगों की सोच एवं व्यवहार के ढंग को निर्धारित करती है। यह उनके मूल्यों, सोच, आदतों, विश्वास, जीवन स्तर जीने के ढंग आदि को भी प्रभावित करती है । सांस्कृतिक घटकों में हुए या हो रहे परिवर्तन व्यवसाय पर भी प्रभाव डालते हैं। जैसे - संयुक्त परिवार ढाँचा धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। इसके स्थान पर एकाकी व छोटे परिवार उभर रहे हैं । इससे व्यवसाय पर भी प्रभाव देखने को मिलता है। इससे उपभोक्ता उत्पादों की माँग में वृद्धि हुई है । यह प्रभाव धीरे-धीरे व्यवसाय पर बढ़ता जाता है हमारे समाज में हुए परिवर्तनों के कारण नये नये उत्पादों की माँग बढ़ रही है तथा कई पुराने उत्पाद बाजार से बाहर हो रहे हैं।
उद्यमी के लिए आवश्यक है कि वह इन परिवर्तनों के अनुरूप अपने व्यवसाय व उत्पादों में आवश्यक परिवर्तन करे, तभी वह सफल रह सकता है । सामाजिक वातावरण में तीन मुख्य बातें होती हैं जिनका यहाँ उल्लेख किया जा रहा है।
1. हमारे जीने के ढंग तथा सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन इसका हिस्सा है। उदाहरण के लिए महिलाओं की समाज में बदलती हुई भूमिका के कारण कई नये उत्पादों को बाजार में देखा जा सकता है।
2. समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता के कारण व्यवसायों को इस संदर्भ में प्रदूषण नियंत्रण को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
3. उपभोक्तावाद की वजह से समाज में उपभोक्ताओं की माँगों व अपेक्षाओं में भारी वृद्धि हुई है तथा व्यवसाय उन्हें संतुष्ट करने के लिए उनके अनुरूप कार्य कर रहे हैं। अत: उद्यमी से यह आशा की जाती है कि वह सामाजिक एवं सांस्कृतिक घटकों के व्यवसाय पर पड़ने वाले प्रभाव के अनुरूप व्यवसायमें आवश्यक परिवर्तन करे।
ऐसा करने से व्यवसाय को सफल बनाया जा सकता है।
4. तकनीकी वातावरण तकनीकी परिवर्तन का एक मुख्य कारण विज्ञान है। इसके अंतर्गत व्यवहारिक कार्य सुव्यस्थित ढंग से किए जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में तकनीक के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं तथा इसकी वजह से नये-नये व्यावसायिक अवसर भी पैदा हुए हैं। इस क्षेत्र में यह भी माना जा रहा है कि अगली सदी ज्ञान एवं तकनीक पर आधारित हो जाएगी तथा व्यवसायों में तकनीक का प्रयोग उच्चतम स्तर पर किया जाएगा। बहुत से व्यवसाय प्रौद्योगिक पर आधारित हो जाएँगे तथा कंप्यूटर, मोबाइल, टी.वी. इलेक्ट्रॉनिक गैजट्स के क्षेत्र में चमत्कारी परिवर्तन देखने को मिलेंगे । तकनीकी परिवर्तन क्रांतिकारी होगा, यह कहना सही है परन्तु साथ ही साथ यह विभिन्न व्यवसायों के लिए समस्याएँ भी पैदा करता है। जो इकाइयाँ तकनीकी परिवर्तन के साथ अपने आप को नहीं ढाल पाती हैं,
वे व्यवसाय में ज्यादा समय तक नहीं टिक सकेगी। तेजी से बदलती तकनीक के कारण इनकी मशीनें व संयंत्र अप्रचलित हो जाते हैं। उनके उत्पाद भी बाजार से बाहर हो जाते हैं। आज के युग में उत्पादों की जीवनकाल बहुत छोटा होता जा रहा है । अतः तकनीकी वातावरण का व्यवसाय की सफलता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इस संबंध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि वही व्यवसायी अपने व्यापार में सफलता प्राप्त कर सकता है जो लगातार, नवाचार और अनुसंधान पर ध्यान दे।
5. प्राकृतिक वातावरण- इसमें भौगोलिक तत्वों को शामिल किया जाता है; जैसे- - प्राकृतिक संसाधन, मौसम और जलवायु संबंधी स्थितियाँ, तापमान, वर्षा की मात्रा, समुद्र से दूरी, पर्यावरण प्रदूषण आदि । इसके प्रत्येक या कुछ घटक मिलकर विभिन्न प्रकार के व्यवसायों पर अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। कुछ उद्योगों के लिए यह घटक प्रेरणा स्रोत बनते हैं। जबकि कुछ के लिए नकारात्मक घटक । जलवायु और मौसम की स्थितियाँ कुछ उद्योगों के स्थानको निर्धारित करने के लिए आधार बनती हैं; जैसे – वस्त्र उद्योग महाराष्ट्र और गुजरात में वहाँ की भौगोलिक स्थिति,
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जलवायु और मौसम के कारण ही स्थापित हैं। स्टील व इस्पात उद्योग बिहार व ओडिशा में कच्चे माल की उपलब्धता के कारण केन्द्रित हैं। चीनी उद्योग की स्थापना उन क्षेत्रों के आस-पास होती है जहाँ गन्ने का उत्पादन अधिक होता है। मछली उद्योग समुद्री तटोंपर ही विकसित होता है। निर्यात आधारित उद्योग बंदरगाहों के नजदीक स्थापित किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त मौसम तथा जलवायु कई उत्पादों की माँग को भी प्रभावित करते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों पर वातानुकूलित यंत्रों की माँग कम होती है जबकि मैदानी क्षेत्रों में अधिक। पहाड़ी क्षेत्रों में ऊनी वस्त्रों की माँग अधिक होती है तथा मैदानी क्षेत्रों में मौसम पर आधारित होती है। इसके अतिरिक्त पर्यावरण प्रदूषण भी व्यवसाय पर प्रभाव डालता है। पर्यावरण प्रदूषण, जल, वायु तथा हवा से संबंधित हो सकता है। सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए विभिन्न प्रावधान तथा अधिनियम बनाए हैं, जिनका पालन करना व्यवसायियों के लिए जरूरी किया गया है। उद्यमियों को इन सभी नियमों, उपनियमों व अधिनियमों का अध्ययन करके आवश्यकतानुसार उन्हें व्यवसाय में लागू करना चाहिए। उद्यमियों को मुख्य रूप से निम्न तत्वों को ध्यान में रखना चाहिए
1. जलवायु और मौसम की स्थितियाँ
2. प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता 3. भूमण्डलीय तत्व बंदरगाह संबंधी सुविधाएँ आदि
4. प्रदूषण नियंत्रण
5. किसी भी व्यवसाय की सफलता पर इन सबका सामूहिक प्रभाव पड़ता है। इन घटकों के महत्व को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
6. जनांकिकीय वातावरण जनांकिकीय वातावरण का अभिप्राय जनसंख्या की विभिन्न विशेषताओं के अध्ययन से है; जैसे जनसंख्या का आकार, वृद्धि दर आयु संरचना, आय स्तर, शिक्षा स्तर, परिवार आकार, परिवार संरचना आदि। यह सभी घटक मिलकर व्यवसाय के विभिन्न निर्णयों पर प्रभाव डालते हैं। व्यवसाय के उत्पाद की माँग, उत्पाद की उपलब्धता, उत्पादन की संरचना आदि पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
ये तत्व प्रत्येक क्षेत्र, राज्य या देश में अलग-अलग होते हैं तथा उसी के अनुसार इनका प्रभाव भी अलग-अलग होता है। एक व्यवसाय की स्थापना करते समय इन सभी घटकों को पर्याप्त महत्व दिया जाता है तथा ये उसकी सफलता के लिए आधार बनते हैं। अतः प्रत्येक नये उद्यमी तथा स्थापित उद्यमीको इन सभी घटकों के अनुसार व्यावसायिक गतिविधियाँ चलानी चाहिए तथा उनमें समय-समय पर आवश्यकतानुसार परिवर्तन भी करना चाहिए।
7. अंतर्राष्ट्रीय वातावरण- अंतर्राष्ट्रीय वातावरण विभिन्न प्रकार के व्यवसायों को प्रभावित करता है तथा विशेषतौरपर ऐसे व्यवसायों को जो विदेशी व्यापार में सम्मिलित होते हैं, आज का युग वैश्वीकरण का युग है। कंपनियों के स्तर पर वैश्वीकरण के अंतर्गत दो बातें प्रमुख होती हैं, एक तो कंपनी पूरे विश्व में अपने व्यापार के विस्तार के लिए समर्पित तथा विभिन्न स्थानों पर अपनी उत्पादन इकाइयाँ स्थापित करती हैं। दूसरा यह देशी बाजार में विदेशी उत्पादों से प्रतिस्पर्धा की योग्यता रखती है। यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि अंतर्राष्ट्रीय विकास के कारण देशी व्यापार पर प्रभाव पड़ता है।
विदेशी बाजार की मंदी, उन व्यापारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है जो निर्यातों पर निर्भर होते हैं। आयातों में उदारीकरण का कुछ उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है; जैसे इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में LG, Sony, Samsung के आने से घरेलू क्षेत्र की व्यावसायिक इकाइयों के बाजार हिस्से में काफी कमी आई है। इसी प्रकार कुछ अन्य अंतर्राष्ट्रीय तत्व; जैसे- विश्व व्यापार संघ के समझौते, अंतर्राष्ट्रीय घोषणाएँ, आर्थिक एवं व्यापारिक स्थितियाँ, अन्य देशों में तेजी या मंदी, विभिन्न देशों के आपसी संबंध आदि व्यावसायिक वातावरण पर प्रभाव डालते हैं। यदि एक उद्यमी आज के वैश्वीकरण के युग में सफलता प्राप्त करना चाहता है तो उसे वैश्विक स्तर के उत्पाद तैयार करने चाहिए। इसके अतिरिक्त वर्तमान संचार की सुविधाओं, वर्तमान यातायात के साधनों, वर्तमान तकनीकी विधियों, विदेशी भाषा, वैधानिक नियमों आदि के बारे में उसे सजग रहनाचाहिए तथा आवश्यकतानुसार व्यवसाय में इन्हें लागू करना चाहिए।
यदि एक व्यवसाय स्वयं को अंतर्राष्ट्रीय परिवर्तनों के साथ परिवर्तित करता रहता है तो उसकी सफलता की संभावना बनी रहती है तथा वह अधिक लाभ कमा सकता है। अतः उद्यमियों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
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