बहसंख्यकों के सिद्धांत के अपवाद - exceptions to the principle of majority
बहसंख्यकों के सिद्धांत के अपवाद - exceptions to the principle of majority
निम्नलिखित परिस्थितियों में कोई अकेला शेयरधारी अथवा अल्पसंख्यक शेयरधारी अपने हितों सुरक्षा के लिए कंपनी के विरूद्ध कानूनी कार्यवाही कर सकता है: की
1) यदि कंपनी के अधिकारातीत अथवा गैर-कानूनी कार्य किया गया हो फॉस बनाम हारबोटल का सिद्धांत ऐसे कार्यों पर लागु नहीं होता है जो कंपनी के अधिकार क्षेत्र के बाहर अथवा गैर-कानूनी हो क्योंकि बहुसंख्यक शेयरधारी, चाहे वे कितनी भी अधिक संख्या में हों, ऐसे कार्यों का अनुसमर्थन नहीं कर सकते। इसलिए प्रत्येक शेयरधारी निषेधादेश के लिए मुकदमा दाखिल करके कंपनी को ऐसे कार्य करने से रोकने का अधिकार रखता है।.
2) जब किया गया कोई कार्य अपर्याप्त बहुमत से पारित किए गए संकल्प द्वारा समर्थित हो- कुछ संकल्पों को पारित करने के लिए विशेष संकल्प पारित करना अर्थात् तीन-चौथाई बहुमत होना आवश्यक होता है, जैसे- ज्ञापन पत्र के उद्देश्य-खंड में परिवर्तन करने के लिए। यदि कोई ऐसा संकल्प साधारण संकल्प के रूप में केवल साधारण बहुमत से पारित किया गया हो तो कोई भी शेयर धारी ऐसे संकल्प को क्रियान्वित करने से कंपनी को रोकने के लिए कार्यवाही आरंभ कर सकता है।
3) यदि शिकायताधीन कार्य में अल्पसंख्यकों के साथ कोई धोखाधड़ी की गई हो और कंपनी का नियंत्रण इस धोखधड़ी के उत्तरदायी व्यक्तियों के साथ में हो इस अपवाद के अंतर्गत किसी कपटपूर्ण उद्देश्य से पारित किए गए ऐसे संकल्प आते हैं, जिनके आधार पर अल्पसंख्यकों को अनुचित ढंग से किसी ऐसे लाभ से वंचित किया जा सके जिसके वे हकदार हों।
यदि बहुसंख्यक अल्पसंख्यकों को हानि पहुंचाकर अपने लाभ के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हैं तो यह अल्पसंख्यकों के साथ कपट होगा और कोई भी शेयरधारी कंपनी को ऐसा संकल्प क्रियान्वित करने से रोकने के लिए कार्यवाही आरंभ कर सकता है। उदाहरण के लिए, यदि बहुसंख्यक कोई ऐसा संकल्प पारित कर दें जिसमें कंपनी की संपत्ति कम मूल्य पर स्वयं उन्हीं को बेच देने की स्वीकृति दी गई हो, तो ऐसे मामलों में न्यायालय निश्चित रूप में हस्तक्षेप करेगा।
4) यदि किसी शेयरधारी के व्यक्तिगत सदस्यता अधिकारों का उल्लंघन किया गया हो कोई भी बहुमत किसी भी शेयरधारी को उसके उन व्यक्तिगत सदस्यता अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता जो उसे कंपनी अधिनियम अथवा अंतर्नियमावाली द्वारा प्रदान किए गए हों।
उदाहरण के लिए, यदि किसी शेयरधारी को अपना मताधिकार प्रयोग न करने दिया जाए अथवा गैरकानूनी रूप से उसका नाम सदस्य रजिस्टर से हटा दिया जाए तो वह व्यक्तिगत रूप से कंपनी पर मुकदमा कर सकता है। साथ ही, यदि किसी शेयरधारी की संचालक पद के लिए उम्मीदवारी सभापति द्वारा अस्वीकृत कर दी जाती है तो यह उसके व्यक्तिगत सदस्यता अधिकारों का उल्लंघन होगा और वह व्यक्तिगत रूप से कंपनी पर मुकदमा कर सकता है तथा संचालकों के चुनाव संबंधी सभा में की गई कार्यवाही को शून्य करार करा सकता है।
5) यदि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 241 से 245 तक के उपबंध लागू होते हों- कंपनी अधिनियम 2013 में भी ऐसे उपबंध विद्यमान हैं जो अत्याचार और कुप्रबंध के मामले में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करते हैं।
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