शक्तिबाध्य ऋण - Forced debt
शक्तिबाध्य ऋण - Forced debt
कभी-कभी कंपनी शक्तिबाध्य ऋण अर्थात, अनाधिकृत ऋण ले सकती है। ऐसे ऋण:
1) कंपनी के शक्तिबाध्य ऋण : कंपनी के ज्ञापन पत्र तथा इसकी अंतर्नियमावली द्वारा दिए गए प्राधिकारी से बढ़कर प्राप्तिकए गए ऋण हो सकते हैं, अथवा
2) संचालकों के शक्तिबाध्य ऋण: संचालाकों के प्राधिकार से बढ़कर प्राप्त किए गए ऋण हो सकते हैं।
1) कंपनी के रिक्तबाध्य ऋण: कंपनी कानून का यह एक आधारभूत सिद्धांत है
कि कंपनी के शक्तिबाध्य अथवा अिधकारातीत सभी कार्य शून्य होते हैं। कानून की दृष्टि में कंपनी के शक्तिबाध्य ऋण कंपनी के विरूद्ध किसी वैद्य ऋण का निर्माण नहीं करते और ऐसे ऋणों के भुगतान करने में चूक करने की स्थिति में ऋणदाता कंपनी पर न तो अभियोग चला कसता है और न ही वह इस प्रकार के ऋण के लिए दी गई प्रतिभूति को पवर्तित करा सकताहै । परन्तु ऐस ऋणदाताओं को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त होते है।
(i) कंपनी ने यदि इस प्रकार लिए गए ऋण की धनराशि अभी तक किसी कार्य पर खर्च नकी हो तो ऋणदाता कंपनी के विरूद्ध विषेधादेश प्राप्त करके ऐस उक्त राशि खर्च करने से रोक सकता है तथा अप्रयुक्त राशि वसूल कर सकता है।
ii) यदि इस प्रकार उधारली गई राशि का उपयोग कंपनी के वैद्य ऋणों का भुगतान करने के लिए किया गया है तो ऋणदाता कंपनी का लेनदेन होगा क्योंकि अनुस्थापन के सिद्धांत के अनुसार वह कंपनी के उन ऋणदाताओं का स्थान ले लेता है, जिनका भुगतान कर दिया गया है,
iv) ऋणदाता अधिकार का निहित आश्वासन भंग करने के आधार पर संचालकों पर व्यक्तिगत रूप क्षतिपूर्ति का दावा कर सकता है बशर्ते कि ऋण देते समय उसने सद्भावनापूर्वक कार्य किया हो।
यदि उल्लेखनीय है कि यदि ऋण लेना ज्ञापन पत्र के अधिकारातीत हो तो प्रत्येक शेयरधारी की सहमति से भी कंपनीइसका अनुसतर्थन नहीं कर सकती,
किन्तु यदि ऋण लेना केवल अंतर्नियमावली के अधिकारातीत हो तो साधारण सभा में सदस्य अंतर्नियमावली में संशोधन करके इसका अनुसमर्थन कर सकते हैं।
2) संचालकों के शक्तिबाध्य ऋण : ऐसे ऋण जो संचालाके के अधिकारातीत हो परन्तु कंपनी के अधिकारी के अंतर्गत हों, कानूनी स्थिति स्पष्ट है। कंपनी यदि चाहे तो वह साधारण सभा में संचालकों द्वारा लिए गए एसे ऋण का अनुसमर्थन कर सकती है और बत ऋण पूर्णतया वैद्य हो जाएगा और कंपनी उसके लिए आबद्ध होगी। कंपनी चाहे इसके विपरीत भी निर्णय ले परन्तु आंतरिक का सिद्धांत और एजेंसी के सामान्य सिद्धांत एक ऐस ऋणदाता के हितों की रक्षा करेंगे जो यह सिद्ध कर दे कि उसके धनराशि सद्भावनापूर्वक उधार दे धी और उसे सीमा का उल्लंघन किए जाने की कोई जानकारी नहीं थी। परन्तु कंपनी संचालकों से क्षतिपूर्ति का दावा कर सकती है। यदि ऋणदाता चाहे तो वह अधिकार का निहित आश्वासन भंग करने के आधार पर संचालकों पर व्यक्तिगत रूप से क्षतिपूर्ति का दावा कर सकता है।
वार्तालाप में शामिल हों