श्रवण में बाधाएँ - hearing impairment
श्रवण में बाधाएँ - hearing impairment
श्रवण कभी भी आसान नहीं होता है क्योंकि यह आस पास के वातावरण पर अत्यधिक निर्भर होता है। एक साधारण व्यक्ति अपने जगे हुए काल के 70 प्रतिशत समय में सम्प्रेषण करता है तथा उसमें से 45 प्रतिशत केवल श्रवण करता है। एक 10 मिनट के प्रस्तुतीकरण में केवल 50 प्रतिशत ही रह जाता है तथा दो दिनों में यह 25 प्रतिशत रह जाता है। यदि आपको अपनी श्रवण कुशलताएं बढ़ानी है तो आपके लिए यह आवश्यक है कि आप श्रवण के वातावरण के कारकों जैसे कि विषय सार, वक्ता, प्रलोभन, मस्तिष्क की अवस्था, भाषा, श्रवण गति आदि को समझें। इस प्रकार श्रवण में निम्न प्रकार की बाधाएं हो सकती हैं।
(क) विषय सार यदि श्रोता को विषय सार के बारे में अधिक ज्ञान है तो उसकी श्रवण में रूचि कम हो जाती हैं।
यदि श्रोता को विषय के बारे में बहुत कम पता है तो भी वह उसको समझने के लिए अधिक प्रयास नहीं करता है और इस प्रकार से श्रवण अप्रभावी रह जाता है।
इससे छुटकारा पाने के लिए एक श्रोता को मूर्ति रूप में नहीं बैठना चाहिए तथा वक्ता एवं वक्तव्य के प्रति आस्थावान रहना चाहिए ताकि कुछ नये विषय या नये आयाम उस वक्ता के द्वारा सीखने को मिल सके। यदि आपको किसी विषय में बहुत अधिक ज्ञान भी हो तो भी आप ध्यान से श्रवण करने पर कुछ न कुछ नया विषय या उसके बारे में नये आयाम सीख सकते हैं।
(ख) माध्यम - श्रवण प्रक्रिया में माध्यम अति आवश्यक होता है।
यदि वक्ता की दूरी बहुत अधिक हो तथा वह श्रोता को नजर नहीं आये तो भी श्रवण में रूचि कम हो जाती है। यदि वक्ता एवं श्रोता में सीधे तौर पर नजरों के मिलने का अवसर होता है तो श्रवण अधिक प्रभावी होता है। इसके अतिरिक्त माध्यम के रूप में जिस भी भाषा का तथा अन्य साधनों का प्रयोग किया जाता है वह भी श्रवण प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाते हैं।
(ग) अन्य प्रलोभन यदि वक्तव्य के स्थान पर अत्यधिक साज सज्जा, इधर उधर घूमने वाली वस्तुएं, - आवाज में परिवर्तन आदि हों तो श्रोता का ध्यान इससे भंग होता है तथा यह श्रव्ण को अप्रभावी बनाता है। श्रोता के लिए यह आवश्यक है कि इस प्रकार के प्रलोभन होने की स्थिति में वह इन प्रलोभनों पर ध्यान न दे, अपने ध्यान को श्रवण में स्थापित करे।
(घ) मस्तिष्क अवस्था किसी व्यक्ति की मस्तिष्क अवस्था श्रवण में सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। यदि व्यक्ति का मस्तिष्क शान्त नहीं है, पूर्व से ही श्रवण के लिए तैयार नहीं है या किसी अन्य व्यक्तिगत समस्या से परेशान है तो ऐसी अवस्था में श्रवण का प्रभावी होना अत्यन्त मुश्किल हो पाता है। ऐसे में श्रोता को चाहिए कि वह अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को श्रवण प्रक्रिया से अलग रखें, दूसरे व्यक्ति के मूल्यों एवं विश्वास को आदर दें यदि दूसरे के दृष्टिकोण से सहमत न हो तो उसे समझने का प्रयास करें।
(ङ) भाषा - जब भी कोई व्यक्ति किसी भी स्थान पर बोलने जाता है तो उस प्रान्त या क्षेत्र की भाषा का अत्यधिक ध्यान रखना चाहिए क्योंकि उस क्षेत्र के लोग अपनी भाषा को ही अच्छी तरह समझ सकते हैं
तथा भाषा के सरल एवं सुगम होने पर श्रवणपूर्ण प्रभावी हो सकता है तथा कम से कम बाधाओं को उत्पन्न करता है। श्रोता के लिए भी यह आवश्यक है कि वह बोले जाने वाले शब्दों के अर्थ तथा परिस्थितियों के अनुसार शब्दों के अर्थ को समझे तथा उसके अनुसार ही विश्लेषण करें।
(च) श्रवण गति साधारणतया किसी व्यक्ति की बोलने की गति 125-150 शब्द प्रति मिनट होती है तथा श्रवण गति 500 शब्द प्रति मिनट होती है जिसमें से सोचने के समय को सम्मिलित नहीं किया गया है।
जब कभी श्रोता, श्रवण करते समय अन्यत्र कहीं सोचने लगता है तो श्रवण प्रक्रिया प्रभावी होती है तथा श्रोता को समानान्तर रूप में तो सोचना आवश्यक है परन्तु उसे इतना नियन्त्रण रखना होगा कि वह विषय वस्तु से बहुत अधिक दूर न हो जाए।
(छ) प्रत्युत्तर / पुनर्भरण - यदि वक्ता बोले गये वक्तव्य को प्रत्युत्तर या पुनर्भरण के द्वारा स्पष्ट न करे तो श्रवण में भ्रांतियाँ पैदा हो सकती हैं। इसी प्रकार श्रोता का भी यह कर्तव्य है कि यदि कोई विषय उसे समझ में नहीं आ रहा हो तो वह वक्ता से पूछ कर अपनी समस्या या संशय को स्पष्ट कर लो इस प्रकार सम्प्रेषण हेतु श्रवण में भी प्रत्युत्तर या पुर्नभरण की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
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