भारतीय सम्प्रेषण सिद्धांत - Indian communication theory

भारतीय सम्प्रेषण सिद्धांत - Indian communication theory


भारतीय ऋषि मुनियों ने कविताओं और भारतीय साहित्यों में लिखा है की सम्प्रेषण में साधारणीकरण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उनके अनुसार एक शुद्ध सम्प्रेषण दो सहृदयों के बीच होता है। सहृदय होने के लिए प्रेषक और प्राप्तकर्ता को एक जैसे परिपेक्ष्य, आम संस्कृति, सामान्य शिक्षा और एक-दूसरे के अनुकूल होना चाहिए। भारत मुनी के रस सिद्धांत (Bharat Muni's rasa theory) में कहा गया है। कि मानव मस्तिष्क में 9 स्थायी मनोदशा ( permanent moods) हैं और इन्हें नौ रस बनाने के लिए उत्तेजित किया जा सकता है यानी खुशी के प्रकारा रस में भयानक रस ( भयंकर मनोदशा or fierce mood), हास्य रस (जोकुलर मूड jocular mood), करुण रस ( दयालु मूड compassionate mood) इत्यादि शामिल हैं। संदेश, दर्शकों में वांछित मनोदशा (रस) का उत्पादन करके, साधारणीकरण (आत्मा की एकता) प्राप्त करता है।


यह सिद्धांत प्राप्तकर्ता की मानसिक व्यवस्था पर जोर देता है जिसके द्वारा वह संदेश के अनुरूप हो सकता है। साधारणीकरण का मतलब अन्य पार्टी को मनाने के लिए नहीं है, बल्कि साझा करने की खुशी पर जोर देता है। भारतीय परंपरा में, सम्प्रेषण का अर्थ एक मानसिक खोज है जिसका उद्देश्य आत्मज्ञान, स्वतंत्रता और सत्य तक पहुंचना है। जबकि भारतीय मॉडल रिसीवर द्वारा व्याख्या पर केंद्रित है, वही पश्चिमी मॉडल तनाव अभिव्यक्ति का रूप है। बौद्ध धर्म से प्राप्त सम्प्रेषण का एक सिद्धांत अस्थिरता, द्रव दुनिया में सम्प्रेषण की बदलती प्रकृति पर जोर देता है। रुप में, व्यावसायिक संचार एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विचार प्रेषक प्राप्तकर्ता, संवादमाध्यम तथा प्रतिपुषित निहित होती है।