औद्योगिक संचार प्रणाली - industrial communication system
औद्योगिक संचार प्रणाली - industrial communication system
भारतीय उद्योगों में ऊध्र्वगामी व अधोगामी दोनों प्रकार की संचार प्रणाली कार्य करती है। साथ ही, समान स्तर के अधिकारियों व कर्मचारियों में क्षैतिज संप्रेषण भी होता रहता है। यह सूचना सम्प्रेषण औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों प्रकार के चैनलों के माध्यम से चलता है। स्वस्थ संचार व्यवस्था के लिए आवश्यक है कि सारा सम्प्रेषण द्विमार्गी हो, किन्तु दुर्भाग्यवश, भारतीय उद्योगों में अधोगामी संचार पर अधिक जोर है तथा ऊध्र्वगामी संचार, अधिकांशतया समुचित ढंग से सम्पन्न नहीं हो पाता, क्योंकि भारतीय संगठनों, चाहे वे सार्वजनिक प्रतिष्ठान हों या निजी में बहुधा नीचे के स्तरों से आने वाली सूचनाओं, फीड बैक, तथा आवेदनों को उचित महत्व नहीं दिया जाता।
प्रबन्धकों व अधिकारियों द्वारा इस तरह की प्रवृत्ति के चलते ही कर्मचारियों में असंतोष बढ़ता है। इससे अनौपचारिक संचार प्रणाली जैसे अंगूरलता (Grapevine) सम्प्रेषण व क्लस्टर नेटवर्कों तथा गपशप को बढ़ावा मिलता है। इसीलिए भारतीय संस्थानों में अक्सर अफवाहों का बाजार गर्म रहता है। सामान्यतया, भारतीय प्रतिष्ठानों में संचार व्यवस्था में निम्नलिखित दिक्कतें पायी जाती हैं :
1. अधिकांश प्रतिष्ठानों में सहभागी निर्णय प्रक्रिया का अभाव पाया जाता है। अधिकांश उद्यमी तथा प्रबन्धक सत्तावादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। अतः वे आदेश देने व उनका पालन करवाने पर अधिक ध्यान देते हैं व नीचे से आने वाली सूचनाओं, आवाजों व फीडबैक को अनसुना करने की प्रवृति रखते हैं।
इससे दोतरफा संचार प्रणाली भंग हो जाती है और यह संस्थानों के लिए घातक बन जाती है।
2. निजी एवं सार्वजनिक दोनों प्रकार के उद्यमों में शिखर स्तर पर सारे प्राधिकार संकेन्द्रित कर लेने की प्रवृत्ति पायी जाती है। निजी क्षेत्र में मालिक तथा सार्वजनिक क्षेत्र में संबंधित मंत्री या राजनीतिक नेतृत्व बहुधा अधिकारों के हस्तांतरण में विश्वास नहीं करते व सभी निर्णय स्वयं लेने की प्रवृत्ति रखते हैं। यही प्रकृति बाद में नीचे के प्रबन्धकों, सचिवों, नौकरशाहों व अधिकारियों में भी घर कर जाती है। धीरे-धीरे केन्द्रीयकरण की यह व्यवस्था सर्वमान्य हो जाती है और औपचारिक सूचनातंत्र वह भी अधोगामी सम्प्रेषण का बोलबाला हो जाता हैं। इससे संस्थान की सूचना प्रणाली पंगु हो जाती है औरै सम्प्रेषण की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ता है।
3. भारतीय संगठनों में अवैयक्तिक व दफ्तरशाही होने की प्रवृत्ति पायी जाती है। ऐसे संगठनों में प्रस्थिति एवं वर्ग की भिन्नताओं पर अधिक जोर रहने से प्रबन्धकों व कर्मचारियों के सम्बन्ध अवैयक्तिक तथा औपचारिक ही रहते हैं। संचार एक अंतरवैयक्तिक प्रक्रिया है । अत्यधिक औपचारिकता के माहौल में सूचनाओं के निर्बाध प्रवाह पर बुरा असर पड़ता है क्योंकि निकटवर्ती अंतरवैयक्तिक सम्बन्धों के अभाव में लोग अपने मन की बात कह ही नहीं पाते। ऐसे में सम्प्रेषण प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है।
4. ऊपर से जो निर्देश नीचे की ओर आते हैं, वे भी अंतिम छोर तक निर्बाध नहीं पहुँच पाते,
क्योंकि ऐसे संगठनों में मालिकों की नीतियों का अधिक महत्व होता है। इसमें अधीनस्थ अपने ऊपर के अधिकारियों पर अत्यधिक निर्भर हो जाते हैं। यह निर्भरता उन्हें अपनी बात ऊपर पहुँचाने से रोकती है। इससे ऐसी सूचनाएँ जो अरूचिकर हों, उनका ऊध्र्व सम्प्रेषण होने की सम्भावना न्यूनतम हो जाती है। किन्तु सकारात्मक बात यह है कि नई औद्योगिक नीति व वैश्वीकरण की व्यवस्था आने के बाद भारतीय उद्योग में प्रणालीगत सुधारों का दौर चल पड़ा है व सूचना के आधुनिक तन्त्र का प्रयोग किया जा रहा है, ताकि सूचनाओं का निर्बाध प्रवाह हो सके व संगठन को अधिक उत्पादकता मूलक व स्पर्धी बनाया जा सके।
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