फैक्टरी / बिल्डिंग अथवा प्लांट का लेआऊट - Layout of factory/building or plan
फैक्टरी / बिल्डिंग अथवा प्लांट का लेआऊट - Layout of factory/building or plant
प्लांट लेआऊट का अर्थ मशीनों, संयंत्रों, प्रक्रियाओं इत्यादि को फैक्ट्ररी/व्यवसाय के अंदर इस प्रकार से स्थापना करने से है ताकि संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो सके तथा कम-से-कम नुकसान की संभावना हो। इन सभी की यही स्थापना संस्था की परिचालन लागत को कम-से-कम करने में सहायक होती हैं। इससे संस्था के यंत्रों और संयंत्रों की स्थापना तथा व्यवसाय के स्थान का उत्तम प्रयोग करने में भी सहायता मिलती हैं। प्लांट लेआऊट से कई अन्य लाभ भी प्राप्त होते हैं; जैसे कि सामग्री तथा उत्पाद संभालने से प्राप्त बचतें, उत्पादन लागत का कम होना, उत्पादन नियोजन में प्रभावशीलता एवं नियंत्रण, अनावश्यक परिवर्तनों से बचाव, कर्मचारियों का उच्च मनोबल, श्रम का सही उपयोग, संगठन की सफल संभावना आदि। इसके विपरीत यदि प्लांट लेआऊट सही ढंग से नहीं किया जाए तो उससे कई प्रकार की हानियों का भी सामना करना पड़ सकता है;
जैसे सामग्री प्रबंधन की अधिक लागत, अधिक स्थान की आवश्यकता, मशीनरी का बेकार पड़े रहना, श्रम की अधिक लागत, दुर्घटनाओं, की संभावना आदि अतः यह कहा जा सकता है कि व्यवसाय की संभावित सफलता के लिए व्यवसाय का स्थान तथा प्लांट एवं मशीनरी की उचित स्थापना किया जाना अति आवश्यक कार्य है।
6. पूँजी संरचना / वित्त योजना की संरचना वित्त उद्यम के जीवन के लिए रक्त के समान महत्त्वपूर्ण होता है। वित्त उत्पादन को बढ़ावा देनेके लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रत्येक प्रकार के व्यवसाय (छोटे अथवा बड़े) के लिए उचित वित्त का प्रबंधन उसकी सफलता को प्रभावित करता है | अतः इसके लिए उद्यमीको उन वित्तीय योजनाओं को तैयार करने की आवश्यकता होती है। उद्यमी को वित्तीय योजना तैयार करते समय तीन महत्त्वपूर्ण बातों पर ध्यान देना होता है :
1. कितने धन की आवश्यकता होगी ?
2. यह धन कहाँ से प्राप्तहोगा ?
3. यह धन किस समय चाहिए होगा ?
यह तीनों प्रश्न मूल रूप से वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता के पूर्वानुमान, वित्तीय साधन के स्रोतों तथा इन साधनों का उचित समय पर उपलब्ध होना जैसे महत्त्वपूर्ण निर्णयों से संबंधित होते हैं। एक उद्यमी भविष्य में कई वित्तीय साधनों पर निर्भर हो सकता है; जैसे कि
1. अपने साधन / अपनी पूँजी
2. कार्यशील पूँजी के लिए वाणिज्यक बैंकों से उधार/ऋण लेना
3. दोस्तों एवं रिश्तेदारों से सहायता
4. वित्तीय संस्थाओं तथा राज्य वित्तीय निगमों से लंबी अवधि के ऋण ।
पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋण की सुविधा व्यापक रूप से उपलब्ध है, परंतुयह सुविधा लघु उद्योगों के लिए बहुत अधिक प्रभावशाली ढंग से उपलब्ध नहीं हो पाती है।
वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दी जाने वाली सहायता भी कार्यशील पूँजी तक ही सीमि रह जाती है। यद्यपि, लघु उद्योगों की पूँजी संरचना के विभिन्न विश्लेषणों ने यह खुलासा किया है कि वित्तीय संस्थानों से प्राप्त ऋण की सहायता पर्याप्त नहीं है, अतः उन्हें अपनी प्रशासकीय मशीनरी को चुस्त करना चाहिए और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए। वित्तीय संसाधनों के प्रबंध से कई समस्याएँ भी जुड़ी होती हैं जैसे सीमित प्रबंध क्षमता, संगठनात्मक सीमाएँ, वित्तीय सीमाएँ, सीमित = बचत, सीमित प्रतिभूति की उपलब्धता आदि । इसलिए उद्यमी को अपनी वित्तीय योजना तैयार करते समय इसके रास्ते में आने वाली कठिनाइयों को ध्यान में अवश्य रखना चाहिए।
7. निर्माण की जानकारी प्राप्त करना उद्यम द्वारा शुरू किए जाने वाले व्यवसाय कई बार इस प्रकार के होते हैं कि उनके द्वारा तैयार किए जाने वाले उत्पाद के लिए निर्माण संबंधी ज्ञान की जानकारी प्राप्त करनी पड़ती है। सरकार द्वारा स्थापित कई संस्थाएँ, शोध लैबोरेटरी,
बड़ी कंपनियों के शोध विभाग, कुछ सलाहकार संस्थाएँ इस तरह की जानकारी उपलब्ध करवाने का कार्य करी है। कई बार सहायक व्यवसाय को उत्पादन की विधि की जानकारी उसके मुख्य व्यवसाय द्वारादी जाती है। कई बार प्लांट एवं मशीनरी की पूर्ति करने वाली कंपनी भी इस तरह की जानकारी उपलब्ध करवाती है। आजकल तो आवश्यकतानुसार विदेशी तकनीकी संस्थाएँ भी उत्पाद के निर्माण की जानकारी उपलब्ध करवाती हैं। उत्पादन प्रक्रिया से जुड़े सभी चरणों का अपना महत्त्व होता है अतः उद्यमी को उनका ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए। सरकार द्वारा इस उत्पादन से जुड़े पर्यावरण संबंधी नियम, नीतियों एवं प्रतिबंधों का भी अवश्य पालनकिया जाना होता है। अतः जलवायु, मिट्टी, पर्यावरण के प्रदूषण संबंधी नियमों एवं प्रतिबंधों को भी समझना चाहिए जो भविष्य में व्यवसाय पर लागू होंगे। प्रत्येक उत्पादन विधि में तकनीकी साधनों का प्रयोग करना पड़ता हैं। उद्यमी को इस संदर्भ में आवश्यकतानुसार ज्ञान प्राप्त करना चाहिए ताकि उसे निर्माण प्रक्रिया में लागू करते समय कोई समस्या उत्पन्न न हो पाए। उत्पादन क ज्ञान को प्राप्त करते समय वर्तमान समय में पहले से चल रही तकनीकों का अध्ययन अवश्य कर लिया जाना चाहिए।
8. परियोजनाकी रिपोर्ट तैयार करना परियोजना रिपोर्ट निर्दिष्ट संसाधनों के साथ एक निर्धारित अवधि के भीतर निर्दिष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए तैयार की गई कार्यवाही होती है। यह एक लिखित योजना होती है जिसमें उद्यमी यह योजना तैयार करता है कि भविष्य में व्यवसाय से क्या प्राप्त किया जाना है तथा कैसे प्राप्त किया जाना है। रिपोर्ट व्यवसाय में की गई विभिन्न प्रक्रियाओं को भी स्पष्ट करती है जो एक नए व्यवसाय की स्थापना के लिए आवश्यक है। यह रिपोर्ट उद्यमी को अनुशासित सोच तथा उन्नत योजना तैयार करने में भी सहायक होती है। यह केवल वित्तीय एवं आर्थिक साधनों की संक्षिप्त योजना ही नहीं अपितु कुछ मान्यताओं पर आधारित व्यवसाय की संभावित प्रगति की जानकारी भी होती है। यह व्यवसाय के आधारभूत सूक्ष्म तथ्यों से लेकर व्यवसाय शुरू हो जाने तक की जाने वाली जटिल कार्यवाहियों सहित सब तथ्यों का विश्लेषण प्रदान करती है। एक व्यवसाय की परियोजना में मुख्य रूप से निम्नलिखित मुद्दे शामिल होते हैं :
1. सामान्य जानकारी- इसमें व्यवसाय की आधारभूत जानकारी, उसके उद्देश्य, विशेषताएँ आदि शामिल होते हैं।
2. स्थान - इसमें व्यवसाय की स्थान संबंधी संपूर्ण जानकारी शामिल हैं।
3. भूमि तथा भवन इसमें परियोजना से संबंधित भूमि क्षेत्र, भवन की जानकारी, निर्माण योजना, निर्माण की लागत आदि शामिल होते हैं।
4. प्रवर्तक- इसमें प्रवर्तकों की संपूर्ण जानकारी का वर्णन होता है जैसे उनका नाम, पता, शैक्षणिक योग्य, अनुभव तथा अन्य योग्यताएँ शामिल होती है।
5. प्लांट एवं मशीनरी इसमें व्यवसाय में प्रयोग की जाने वाली मशीनरी से संबंधित जानकारी को इकट्ठा किया जाता है। इसमें तकनीकी उपकरण, प्रयोगशाला में प्रयोग किए जाने वाले संयंत्र, बिजली, पानी, विद्युत का लोड आदि का भी वर्णन यिका जाता है।
6. कच्चा माल इसमें व्यवसाय में प्रयोग होने वाले कच्चे माल, उसकी किस्म, उसकी कीमत, उपलब्धता, स्रोत आदि की भी जानकारी इकट्ठी की जाती है।
7. उत्पादन प्रक्रिया इसके अंतर्गत उत्पादन की प्रक्रिया, प्रक्रिया चार्ट, प्रोग्राम, तकनीकी ज्ञान इत्यादि की जानकारी का वर्णन किया जाता है।
8. मानवशक्ति मानवीय संसाधनों की संपूर्ण जानकारी इसके अंतर्गत इकट्ठा की जाती है। इसमें मानव संसाधनों के स्रोत, उनके प्रशिक्षण की आवश्यकताएँ तथा उसकी लागत आदि की जानकारी भी इकट्ठी की जाती है।
9. बाजार परियोजना रिपोर्ट की यह एक महत्त्वपूर्ण जानकारी होती है। इसमें बाजार की वर्तमान स्थिति, उत्पाद की अनुमानित माँग, निर्यात की संभावना, प्रतिस्पर्धा का स्तर कीमत संरचना आदि आदि सभी का वर्णन किया जाता है।
10. वित्तीय प्रभाव – इसमें वित्तीय साधनों से जुड़े तत्त्वों का आकलन किया जाता है। व्यवसाय के
लिए कार्यशील पूँजी तथा स्थायी पूँजी की आवश्यकता, संसाधनों के स्रोत, उपलब्धता, परियोजना की लागत, संभावित लाभ आदि की जानकारी इकट्ठी की जाती है।
व्यवसाय के लिए परियोजना रिपोर्ट का विशेष महत्त्व होता है। इस रिपोर्ट का उद्देश्य भी प्रत्येक व्यवसाय के लिए अलग-अलग हो सकता है। यह परियोजना रिपोर्ट कई बार वित्तीय संस्थाओं को भी जमा की जाती है जिससे कि सरकारी सहायता, मशीनरी एवं संयंत्र संबंधी सहायता आदि प्राप्त की जा सके। यह रिपोर्ट कई बार सरकारी वित्तीय संस्थानों द्वारा पूर्व निश्चित प्रारूप के अनुसार भी तैयार की जानी होती हैं। यह परियोजना रिपोर्ट उद्यमी स्वयं तैयार कर सकता है या इसके लिए वह विशेष सलाहकारों या पेशेवर लोगों की भी मदद ले सकता है। विभिन्न तकनीकी सलाहकार संस्थान भी संभावित उद्यमी की इस कार्य में अनावश्यक मदद करते हैं। इस प्रकार परियोजना रिपोर्ट अत्यंत सावधानीपूर्वक तैयार की जानी आवश्यक होती है। यह एक प्रकार से भविष्य में किए जाने वाले व्यवसाय की संपूर्ण विस्तृत योजना का प्रारूप माना जाता है। यह व्यवसाय को पूरी योजना की संक्षिप्त जानकारी' प्रदान करता है।
परियोजना रिपोर्ट को आमतौर पर विशेष हिस्सों में विभाजित करके तैयार किया जाता है ताकि विस्तृत जानकारी इकट्ठी हो सके। एक परियोजना रिपोर्ट के नमूने का प्रारूप यहाँ दिया जा रहा है।
1. कार्यकारी सारांश
1. परिचय
2. वित्तीय प्रदर्शन
3. व्यवसाय के चिट्ठे की जानकारी
4. प्रस्तावित व्यवसाय
5. प्रस्तावित लाभदायकता एवं उसका विश्लेषण
6. शक्तियों एवं कमियों का विश्लेषण
2. कंपनी / व्यवसाय की जानकारी
1. इतिहास
2. निर्माण की सुविधाएँ
3. प्रवर्तकों की जानकारी
4. अंशधारकों की जानकारी
5. संचालक मंडल
6. मुख्य कार्यकारी अधिकारी
7. मुख्य उत्पाद
8. मुख्य ग्राहक
9. इकाइयों का विभाजीकरण
10. समूह की इकाइयाँ
3. परिचालन संबंधी जानकारी
1. क्षमता एवं उसका प्रयोग
2. लाभ एवं हानि खाता
3. चिट्ठा
4. अल्पकालीन ऋण एवं देनदारियाँ
5. कार्यशील पूँजी एवं संबंधित ऋण
6. कंपनी की विपणन प्रणाली
7. निर्यात बिक्री
8. कीमत में प्रवृत्तियाँ
9. आऊटसोर्सिंग आदि की जानकारी
4. परियोजना संबंधी जानकारी
1. प्रस्तावित परियोजना
2. आदेश एवं पूछताछ
3. स्थान
4. निर्माण प्रक्रिया
5. तकनीकी व्यावहारिकता
6. तकनीकी जानकारी
7. उत्पादन के लिए संसाधन
8. मानवीय साधन
9. शक्ति
10. जल की उपलब्धता
11. विपणन
12. अन्य सेवाएँ
15. परियोजना की लागत
1. भूमि
2. इमारत एवं उसके कार्य
3. प्लांट तथा मशीनरी
4. प्रारंभिक खर्चे
6. वित्तीय साधन
1. समता अंश पूँजी
2. आंतरिक साधन
3. जमाएँ तथा ऋण
4. अन्य संबंधित जानकारी
7. परियोजना का स्तर
1. लागू किए जाने की योजना
2. वर्तमान स्थिति
3. सरकारी मंजूरियाँ
4. अन्य संबंधित जानकारी
8. लाभदायकता एवं जोखिम विश्लेषण
1. परियोजना की वित्तीय आवश्यकताएँ
2. कंपनी की वित्तीय योजनाएँ
3. मुख्य जोखिम वाले क्षेत्र
4. स्वोट विश्लेषण
9. कंपनी तथा उद्योग
1. सामान्य विश्लेषण
2. प्रतिस्पर्धात्मक इकाइयाँ
3. कंपनी के लाभ
10. रोजगार सृजन प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष
11. निष्कर्ष
12. संलग्न कागजात
1. प्रवर्तकों की संपूर्ण जानकारी
2. संगठन चार्ट
3. कंपनी की विभिन्न इकाइयों की जानकारी
4. सरकारी स्वीकृतियाँ
5. भूमि एवं भवन की जानकारी
6. भूमि एवं भवन की लागत एवं संयंत्रों की लागत
7. प्रक्रिया चार्ट
8. परियोजना की लागत एवं उनका विश्लेषण
9. कंपनी का वित्तीय विश्लेषण
10. अन्य आवश्यक जानकारी
परियोजन का यह एक सामान्य प्रारूप हैं। प्रस्तावित या संभावित व्यवसाय की परियोजना रिपोर्ट व्यवसाय के आकार, प्रकृति, स्थान आदि के अनुसार परिवर्तित होती जाती है। परियोजना नए व्यवसाय या स्थापित व्यवसाय के विस्तार, आदि के संबंध में भी तैयार की जा सकती है। प्रत्येक परियोजना रिपोर्ट की विषय सामग्री अलग-अलग होती है तथा आवश्यकतानुसार इसमें परिवर्तन भी किए जाते हैं।
10. लाइसेंस प्राप्त करना / पंजीकरण- छोटे अथवा सहायक उद्योग जिनकी प्लांट एवं मशीनरी में विनियोग की राशि एक करोड़ रुपये से कम है, उन्हें अपना व्यवसाय प्रारंभ करने से पहले संबंधित राज्य के उद्योग निर्देशक के पास पंजीकरण करवाना होता है। प्रारंभिक चरण में उन्हें एक अस्थायी पंजीकरण प्रमाण पत्र प्राप्त करना होता है। उत्पादन प्रारंभ कर दिए जाने के पश्चात उन्हें स्थायी पंजीकरण प्रमाण पत्र प्राप्त करना होता है। अस्थायी पंजीकरण का एक आवश्यक प्रमाण पत्र होता है जिसके आधार पर उद्यमी विभिन्न सरकारी सहायताओं, औपचारिकताओं आदि के लिए इसका प्रयोग कर सकता है। तत्पश्चात यही अस्थायी पंजीकरण ही स्थायी पंजीकरण प्रमाण पत्र में परिवर्तित कर दिया जाता है। इसके पश्चात नगर निगम से भी लाइसेंस प्राप्त या जाना होता है। कुछ व्यवसायों के लिए एक्साइज एवं बिक्री विभाग से भी स्वीकृति की आवश्यकता होती है। आवश्यकतानुसार वहाँ से भी अनुमति प्राप्त कर ली जानी चाहिए। एक उद्यमी को विभिन्न संबंधित विभागों में समय-समय पर कई रिपोर्ट जमा करवानी होती हैं। उसे इस बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए तथा नियमानुसार रिपोर्ट जमा कराते रहना चाहिए।
यदि वह व्यवसाय / उद्यम फैक्टरी अधिनियम के क्षेत्र में आता है जैसे कि यदि उद्यम विद्युत की सहायता के है तथा 10 कर्मचारियों के साथ काम करता है या बिना विद्युत सहायता के साथ 20 कर्मचारियों के साथ काम करता है, तो ऐसी अवस्था में संबंधित फैक्टरी इंस्पेक्टर से भी अनुमति प्राप्त की जानी होती है । अन्यथा नए व्यवसाय का पंजीकरण शॉप तथा ऐसटैबलिशमेंट अधिनियम के अंतर्गत करवाया जाता है। अतः विभिन्न कानूनी औपचारिकताएँ व्यवसाय की प्रकृति, स्थान, आकार, उत्पादित वस्तु, उत्पादन की मात्रा आदि के अनुसार परिवर्तित भी होती रहती हैं तथा पूरी भी की जानी होती है। उद्यमी का कर्तव्य बनता है कि सभी नियमों का पालन करते हुए सभी औपचारिकताएँ पूरी करें तथा कानूनी दायरे में ही कार्य करें।
11. बिजली कनेक्शन- व्यवसाय या फैक्टरी के कार्य को वास्तविकता से लागू करके, उत्पादन शुरू करने के लिए या व्यवसाय शुरू करने के लिए विद्युत कनेक्शन की आवश्यकता होती है। यह दो तरह का होता है. कम तनाव तथा उच्च तनाव एक साधारण उपभोक्ता बिजली के लिए केवल 75 HP के कम लोड तक के लिए लाभ ले सकता है। साधारण एवं व्यावसायिक विद्युत कनेक्शन की अलग-अलग दरें एवं औपचारिकताएँ होती हैं । यदि व्यवसाय का लोड 75 HP से ज्यादा परंतु 130 HP से कम है तो उद्यमी कम या उच्च तनाव में से किसी के लिए आवेदन दे सकता है। सामान्यतया नए एवं छोटे व्यवसाय कम तनाव वाली श्रेणी में ही आते हैं तथा उसी के लिए उन्हें आवेदन करना होता है। इस संबंध में उसे संबंधित क्षेत्र के विद्युत कार्यालय में आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं तथा आवश्यक फीस भी जमा करवानी पड़ती है।
12. वित्त का प्रबंध वित्त व्यवसाय के जीवन के लिए रक्त के समान महत्त्वपूर्ण होता है तथा कोई भी व्यवसाय बिना वित्त के करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। व्यवसाय या परियोजना के लिए वित्त की आवश्यकता अल्पकाल एवं दीर्घकाल दोनों के लिए ही करनी पड़ती है। अल्पकाल वित्त की आवश्यकता कार्यशील पूँजी तथा रोजमर्रा के कार्यों के लिए तथा दीर्घकालीन वित्त की आवश्यकता प्लांट मशीनरी तथा अन्य स्थायी संपत्तियों के आवश्यकता पूरी करने के लिए होती है। सरकार द्वारा स्थापित विभिन्न वित्तीय संस्थाएँ, वाणिज्यिक बैंक, निजी क्षेत्र के बैंक आदि इस बारे में उद्यमी को सहायता प्रदान करते हैं। उद्यमी इसके लिए अपनी पूँजी का प्रयोग भी कर सकता है, दोस्तो व रिश्तेदारों से भी मदद ले सकता है। एक व्यवसायी को व्यवसाय शुरू करने के लिए आवश्यक वित्त प्रबंध अपनी आवश्यकतानुसार कर लेना पड़ता है।
13. कर्मचारियों को लगाना तथा प्रशिक्षण व्यवसाय की सफलता का आधार सुयोग्य कर्मचारियों की उपलब्धता एवं कार्यशैली पर निर्भर करता है। कर्मचारियों की संख्या व्यवसाय के आकार उत्पाद की प्रकृति, क्षेत्र तथा अन्य बहुत से तत्त्वों पर निर्भर होती है। उद्यमी को अपनी आवश्यकता का अनुमान लगाने के पश्चात कर्मचारियों की नियुक्ति की कार्यवाही पूरी करनी चाहिए। कर्मचारियों की भर्ती, चयन,
प्रशिक्षण एवं विकास एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य है, यह व्यवसाय की सफलता का आधार भी बनता है । उद्यमी को यह कार्य पूर्ण रूप से सजग होकर करना चाहिए। व्यवसाय की प्रगति के साथ कर्मचारियों की आवश्यकता में भी परिवर्तन आता रहता है, इसे भी नियमानुसार पूरा किया जाना चाहिए जहाँ उद्यमी को लगता है कि कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिए जाने की आवश्यकता है तो उसके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाने चाहिए। मानवशक्ति ही व्यवसाय की प्रगति का आधार है, उद्यमी को इस बात को हमेशा ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ना चाहिए।
14. वातावरण नियंत्रण बोर्ड से मंजूरी लेना उद्यमी द्वारा विभिन्न चरणों की कार्यवाही पूरी कर लिए जाने के पश्चात जैसे लाइसेंस, पंजीकरण, सरकारी औपचारिकताएँ आदि, व्यवसाय को मूर्त रूप में शुरू करना होता है। आजकल के संदर्भ में वातावरण के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व को समझते हुए उसे संबंधित क्षेत्र के वातावरण नियंत्रण बोर्ड से भी अनुमति लेनी होती है। इसका उद्देश्य यह होता है कि व्यवसाय के उत्पादन की प्रक्रिया से किसी तरह का कोई प्रदूषण उत्पन्न होगा तथा प्रदूषण से निपटने के लिए विभिन्न आवश्यक संयंत्र भी स्थापित कर लिए गए हैं। इस संबंध में जो भी औपचारिकताएँ विभाग द्वारा निर्धारित की गई हैं, वह सभी उसे पूरी करनी होती हैं। इसके पश्चात वह अपना व्यवसाय प्रारंभ कर सकता है।
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