प्रवर्तक की वैधानिक स्थिति, दायित्व - Legal Status, Liability of the Promoter

प्रवर्तक की वैधानिक स्थिति, दायित्व - Legal Status, Liability of the Promoter


प्रवर्तक कंपनी का न्यायी या एजेंट नहीं होता है क्योंकि जब वह अपने कार्यों को करता है उस समय किसी न्यास का नियोक्ता का अस्तित्व ही नहीं होता है। यद्यपि कंपनी अधिनियम के अधीन एक प्रवर्तक के, एक एजेन्ट के समान, कुछ विश्वासाश्रित कर्तव्य बलताए गए हैं। परिणाम स्वरूप प्रवर्तकका यह दायित्व है कि वह प्रवर्तन संबंधी सभी तथ्यों को पूर्णतया प्रकट करें। यह महत्वपूर्ण है कि कानून प्रवर्तक द्वारा लाभ प्राप्त करने को वर्जित नहीं करता है बल्कि उसके द्वारा प्राप्त लाभ को गुप्त रखने को वर्जित करता है। यदि किसी व्यवहार से उत्पन्न होनेवाले लाभ को प्रवर्तक, स्वतंत्र संचालक मंडल या शेयरधारियों की सभा के समक्ष पूर्णरूपेण प्रकट कर देता है तो ऐसे लाभ को अपने पास रखने का उसे अधिकार है।


प्रवर्तक के दायित्व


प्रवर्तक को अपने कार्य पूर्ण सदविश्वास एवं सतर्कता से करने चाहिए। यदि कंपनी की ओर से किये गये किसी भी व्यवहार में प्रवर्तक ने कोई लाभ वे लेकिन प्रकट न किया तो कंपनी निम्नलिखित में से कोई एक कार्यवाही कर सकती है -


I. कंपनी प्रवर्तक से किए गए संविदा को तोड़ सकती है अर्थात प्रवर्तक को उसकी संपत्ति लौटाकर उससे अपनी धनराशि वसूल कर सकती है। या


II. कंपनी प्रवर्तक लाभ का हिसाब मांग सकती है और उस राशि को व्याज सहित प्राप्त कर सकती है।


कंपनी अधिनियम 2013 के अंतर्गत प्रवर्तक के दायित्व की व्यवस्था है जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है :


i. कंपनी अधिनियम की धारा 35 के अनुसार, विवरण-पत्रिका में दिए मिथ्या वर्णन के लिए प्रवर्तक को मूल आबंटितियों के प्रति क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। इसके अतिरिक्त धारा 63 के अनुसार, विवरण पत्रिका में ऐसे असत्य कथन के लिए प्रवर्तक को 10 वर्ष तक की सजा एवं कपट की गई धनराशि के तीन गुने तक जुर्माना भी किया जा सकता है।


ii. कंपनी अधिनियम की धारा 340 के अनुसार, कंपनी के समापन के दौरान सरकारी समापक या कंपनी समापक द्वारा आवेदन दिये जाने पर ट्रिब्यूनल द्वारा प्रवर्तक को कर्तव्य भंग या विश्वास-भंग के लिए दायी ठहराया जा सकता है। इसके अतिरिक्त धारा 300 तथा 317 के अनुसार, यदि कंपनी समापक ने प्रवर्तक के विरूद्ध कपट का आरोप लगाया हो तो ट्रिब्यूनल द्वारा उसकी सार्वजनिक जाँच का आदेश दिया जा सकता है।