वित्त के साधन - means of finance

वित्त के साधन - means of finance


किसी उद्यम की परियोजना को प्रारंभ करने के लिए आवश्यकताओं में से वित्त का बहुत अधिक महत्त्व है। वास्तव में, वित्त ही उद्यमी को उत्पादन के अन्य तत्त्वों, जैसे-भूमि, श्रम मशीनरी कच्चे माल से मिलकर वस्तुओं का उत्पादनकरने में सहायता करता है। उद्यम वित्त प्रदान करने का कार्य व्यवसाय की सफलता के लिए एक महत्त्वपूर्ण कार्य होता है। प्रत्येक उद्यमी को आरंभ में ही वित्तीय आवश्यकताओं का अनुमान लगा लेना चाहिए। वित्तीय आवश्यकताओं को तीन भागों में बाँटा जा सकता है:


(1) दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ


(2) मध्यकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ


(3) अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ


(1) दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ: दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ वह होती हैं जो पाँच वर्ष से अधिक अवधि के लिए होती हैं। ऐसी आवश्यकताओं में स्थायी संपत्तियों, जैसे-भूमि, भवन, प्लांट एवं मशीनरी, फर्नीचर, पेटेन्ट, ख्याति आदि का क्रय सम्मिलित होता है। दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताओं को वित्त के दीर्घकालीन स्त्रोतों द्वारा पूरा किया जाता है, जैसे- अंश, ऋणपत्र, सामयिक ऋण (Term Loan) इत्यादि ।


(2) मध्यकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ: एक वर्ष से पाँच वर्ष की अवधि को मध्यकालीन कहा जाता है। मध्यकालीन वित्त की आवश्यकता स्थायी कार्यशील पूँजी, प्रतिस्थापनों,

संशोधनों आदि के लिए होती है। मध्यकालीन वित्तीय आवश्यकताओं को मध्यकालीन स्त्रोतों से ही पूरा किया जाना चाहिए बैंकों से मध्यकालीन ऋण, सार्वजनिक जमाएँ आदि।


(3) अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ: अल्पकालीन वित्त की आवश्यकता एक वर्ष से कम के लिए होती है। इन कोषों की आवश्यकता परिर्वनशीन, मौसमी अथवा अस्थायी कार्यशील पूँजी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए होती है। अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति अल्पकालीन स्त्रोतों से की जाती है, जैसे ग्राहकों से अग्रिम, (Advance), उधार क्रय, व्यापारिक प्रपत्र ( Commercial papers) इत्यादि ।


वित्त के साधन


विभिन्न स्त्रोत जिनसे उद्यमी वित्त प्राप्त कर सकता है उसे तीन भागों में बाँटा जा सकता है:


(1) वित्त के दीर्घकालीन साधनः इनको दो भागों में बाँटा जा सकता है:


(i) स्वामी पूँजी: इस स्त्रोत के अंतर्गत, उद्यम के आंतरिक स्त्रोतों से वित्त प्राप्त किया जाता है। इन आंतरिक स्त्रोतों में स्वामी पूँजी जिसे समता पूँजी भी कहते हैं, पूर्वाधिकार पूँजी, स्वामी या साझेदार या संचालक द्वारा ऋण आदि सम्मिलित हैं।


(ii) उधार पूँजी: ऐसा वित्त उद्यम के बाहरी स्त्रोतों तथा ऋणदाताओं से प्राप्त किया जाता है।

इसमें ऋणपत्र, वित्तीय संस्थाओं से ऋण, पट्टा (Lease) आदि शामिल होता है।


(2) वित्त के मध्यकालीन साधः इन साधनों में सार्वजनिक जमाएँ, बैंकों या वित्तीय संस्थानों से मध्यवर्ती


ऋण आदि सम्मिलित है।


(3) वित्त के अल्पकालीन साधनः इनमें बैंकों से अल्पकालीन ऋण, व्यापारिक साख, ग्राहकों से अग्रिम सम्मिलित हैं।


वित्त के साधनों की पूर्ति को भी दो भागों में बाँटा जा सकता है: समता पूँजी तथा ऋण पूँजी समता पूँजी से आशय अंशधारियों की पूँजी से है जिसमें समता अंश पूँजी, पूर्वाधिकार अंश पूँजी, आंतरिक उपचय, आदि। दूसरी तरफ, ऋण पूँजी में दीर्घकालीन बाह्य दायित्वों को शामिल किया जाता है, जैसे – सामयिक ऋण, ऋणपत्र, बैंक ऋण, सार्वजनिक जमाएँ इत्यादि ।


विभिन्न प्रकार की पूँजीका विभाजन निम्न चित्र द्वारा स्पष्ट किया गया है: