नए व्यापार का जीवन चक्र - new business life cycle
नए व्यापार का जीवन चक्र - new business life cycle
एक नए व्यवसाय के जीवन चक्र की विभिन्न अवस्थाएँ
एक व्यवसाय को अपने संपूर्ण जीवन में अनेक अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। प्रत्येक अवस्था की अपनी विशेषताएं, लाभ, सीमाएं एवं चुनौतियां होती हैं। प्रत्येक अवस्था का अपना एक जीवन काल भी होता है। प्रत्येक अवस्था का जीवन काल प्रत्येक व्यवसाय के अनुसार अलग-अलग होता है। प्रत्येक व्यवसाय या नए व्यवसाय के जीवन चक्र पर विभिन्न तत्वों का प्रभाव पड़ता है, जैसे- व्यवसाय की प्रकृति, आकार, स्थान, प्रतिस्पर्धा का स्तर, सरकारी नीतियां, व्यवसायी वातावरण आदि। जीवन काल की अवधारणा रूचिकर परंतु उलझाने वाली एवं चुनौतियां देने वाली अवधारणा है। इसको समझने के लिए इसका गहन अध्ययन किए जाने की आवश्यकता होती है। एक नए व्यवसाय के जीवन काल की विभिन्न अवस्थाओं को चित्र से आसानी से समझा जा सकता है। इन सभी अवस्थाओं का वर्णन भी यहां किया गया है।
(1) बीज की अवस्था : वह एक व्यवसाय की प्रारंभिक काल की पहली अवस्था होती है। इसे व्यवसाय का जन्म भी कहा जाता है। इसे प्रारंभिक अवस्था भी कहा जाता है। इसकी शुरूआत व्यवसायी/उद्यमी द्वारा व्यवसाय के विचार की कल्पना किए जाने से शुरू होती है अर्थात् जब एक उद्यमी विचारकी कल्पना करता है, उसके संबंध में अनुसंधान करता है, अपने दोस्तों, रिश्तेदारों तथा व्यवसाय के क्षेत्र के पेशेवर लोगों से इसके बारे में और जानकारियाँ इकट्ठी करता है। ये सभी इसी अवस्था का हिस्सा होते हैं। इस अवस्था में इस बात का विश्लेषण किया जाता है कि उद्यमी का व्यवसाय स्थापित करने का विचार वास्तविकता में लाने योग्य है या नहीं। यह किसी भी व्यवसाय की सबसे चुनौतीपूर्ण अवस्था होती है। उद्यमी को विभिन्न तत्वों का विश्लेषण करने की आवश्यकता होती है, जैसे- व्यावसायिक विचार से होने वाली संभावित लाभ की मात्रा, बाजार स्वीकार्यता, स्थापनाकी औपचारिकताएँ, सरकारी नीतियां, आवश्यक वित्तीय संसाधन एवं उनकी अपलब्धता आदि। यह अवस्था प्रारंभिक होती है अतः इस स्तर पर उद्यमी वित्तीय संसाधनों के लिए मुख्य रूप से स्वयं के संसाधन, दोस्तों, रिश्तेदारों से सहायता आदि पर निर्भर करता है। वह इस संदर्भ में सरकारी सहायता को भी प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।
इस अवस्था में उद्यमी की क्षमताओं तथा व्यवसाय के अवसर से प्राप्त होने वाले लाभों का मिलान करने का प्रयास किया जाता है। इस अवस्था में कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातों पर भी उद्यमी अपना ध्यान केंद्रित करता है, जैसे- व्यवसाय के आकार एवं प्रकृति का निर्णय, उत्पाद का निर्णय, उत्पाद का निर्णय, वित्तीय संसाधनों के स्त्रोत, व्यावसयिक योजना का भविष्य आदि ।
(2) शुरूआती अवस्था : यह एक अन्य महत्वपूर्ण अवस्था है। इस स्तर पर उद्यमी का विचार वास्तविकता का रूप ले लेता है तथा व्यवसाय जन्म ले लेता है। इस अवस्था में उद्यमी का व्यवसाय एक वैधानिक अस्तित्व ले लेता है। व्यवसायी अपना कार्य शुरू कर देता है। उद्यमी समाज की आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादन करता है या सेवाएँ प्रदान करता है। इस स्तर पर उम्पादन की मात्रा को एक मध्यम स्तर तक ही रखा जाता है।
उत्पाद की मांग तथा बाजार की प्रतिक्रिया के अनुसार व्यवसाय की संभावित क्रियाएं की जाती हैं। इस स्तर परी उद्यमी का केंद्रीय बिंदु व्यवसाय के लिए उपभोक्ताओं के रूप में आधार तैयार करना होता है। वित्तीय संसाधनों पर भी ध्यान केंद्रित किया जाता है। इसके लिए वह अपने साधन, दोस्तों एवं रिश्तेदारों, पूर्तिकर्ताओं एवं वित्तीय संस्थाओं आदि से सहायता पर निर्भर करता है। यह अवस्था भी चुनौतियों से भरी हुई होती है, जैसे- रोकड़ का स्तर बनाए रखना, प्रतिस्पर्धा का सामना, ग्राहकों को आकर्षित करना, उत्पाद की बाजार स्वीकार्यता तैयार करना, मानवीय संसाधनों का प्रबंध करना आदि। इस स्तर पर उद्यमी को इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करना होता है तभी व्यवसाय के संपूर्ण लाभ उसे प्राप्त हो सकते हैं अन्यथा वह कठिनाईयों में भी फंस सकता है।
(3) विकास अवस्था : इस अवस्था में उद्यमी को अपने प्रयासों का लाभ उत्पाद की बिक्री के रूप में प्राप्त है। इस प्रकार यह लाभ की अवस्था होती है। इस आय की राशि से वह अपने व्यवसाय संचालन के सभी खर्चों को पूरा करता है। वह वर्तमान व्यवसाय से संबंधित क्षेत्रों में अन्य उपलब्धों की तलाश करता है
तथा नई शाखाएँ खोलने का भी निर्णय लेता है। यह व्यवसाय के जीवन की सबसे संतुष्टिदायक एवं लाभदायक अवस्था समझी जाती है। इस चरण में उद्यमी का पूरा ध्यान व्यवसाय के औपचारिक प्रबंधन, एवं नियंत्रण पर केंद्रित रहता है। वह प्रभावशाली ढंग एवं कुशलता से यह कार्य करता है तथा बिक्री को बनाए रखने तथा ग्राहकों को अपने व्यवसाय के साथजोड़े रखने का हर संभव प्रयास करता है। बेहतर व्यावसायिक प्रबंध की तकनीकों तथा उच्चतम लेखांकन विधियों का भी प्रयोग किया जाता है। व्यवसाय में और की नियुक्ति की जाती है। वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उद्यमी विभिन्न स्त्रोतों, जैसे- बैंक, वित्तीय कुशल कर्मचारियों संस्थाएँ, सरकारी एवं प्रोत्साहन, अपने संसाधन आदि पर निर्भर रहता है। यह अवस्था भी हमेशा चुनौतियों से भरी हुई होती है। जिनका सामना अत्यंत संतुलित व्यवहार व सावधानी से किया जाना होता है। इस पर मुख्य चुनौतियाँ होती हैं, जैसे- बिक्री का स्तर बनाए रखना, प्रतिस्पर्धा का सामना करना, ग्राहकोंको जोड़े रखना, नए उत्पाद व विचारों को लागू करना, प्रभावपूर्ण नियंत्रण नीतियाँ बनाना, मानव संसाधन पर नियंत्रण, संसाधनों पर अनुसंधान आदि।
(4) स्थापित अवस्था : यह ऐसी अवस्था है जिसमें व्यवसाय समय के साथ-साथ परिपक्वता प्राप्त करते हुए एक स्थापित उद्यम का रूप ले लेता है। इसे एक स्थापित इकाई के रूप में जाना जाता है। इस अवस्था में व्यवसाय के पास अपने संतुष्ट ग्राहकों की एक बड़ी संख्या होतीहै तथा उसका बाजार की बिक्री में एक अच्छा हिस्सा भी होता है। विकास की दर बहुत अधिक तो नहीं होती है परंतु सम्मानजनक होती है। इस पर व्यावसायिक क्रियाएँ उद्यमीके जीवन का एक अंग बन जाती है। यह प्रत्येक उद्यम के जीवन की विशेष अवस्था होती है। अत: उद्यमी बाजार से संबंधित सर्वश्रेष्ठ विपणन नीतियाँ एवं रणनीतियाँ तैयार करता है। व्यवसाय में इसी तरह से रहने के लिए वह बेहतर व्यसवसायिक प्रबंधन एवं आधुनिक तकनीकी साधन एवं संसाधनों का उत्तम प्रयोग करने पर भी अपना ध्यान केंद्रित करता है। उत्पादकता बढ़ानेके लिए भी अनुसंधान आदि पर भी खर्च करता है। इस स्तर पर व्यवसाय की वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए वह लाभ, बैंकों, वित्तीय संस्थानों, सरकारी प्रोत्साहनों, विनियोजकों आदि पर निर्भर करता है। इस अवस्था में भी चुनौतियाँ उद्यमी के साथ- साथ चलती हैं। इस स्तर पर मुख्य चुनौती प्रतिस्पर्धा का सामना, बिक्री का स्तर बनाए रखना, प्रभावशाली नीतियाँ एवं रणनीतियाँ तैयारकरनाहोती हैं। अत: उद्यमीको पूर्ण कौशल के साथ इनका सामना करने के लिए तैसाररहना चाहिए।
(5) विस्तार / तेज विकास की अवस्थाः प्रत्येक उद्यमी इस अवस्था का सपना देखता है। यह वह अवस्था होती है जब उद्यमी का व्यवसाय एक पूर्ण रूप से स्थापित व्यावसायिक इकाई का रूप ले लेता है तथा औद्योगिक जगत में अपनी एक अलग पहचान बना लेता है। व्यवसाय अपनी जड़ें स्थापित करने के पश्चात नए-नए बाजार तथा नए-नए क्षेत्रों में भी विस्तार का कार्य करता है। इस अवस्था में व्यवसाय अपनी सफल बिक्री प्रयासों की योजनाओं, विपणन नीतियों, संचालन नीतियों, आदि के कारण अधिकतम लाभ तथा बिक्री के रूप में प्रतिफल प्राप्त करता है। इस अवस्था में उद्यमी और अधिक विकास के बारे में भी कार्य करता है तथा व्यवसाय के विस्तार के लिए नए-नए उत्पाद तथा नए-नए बाजारों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए प्रयासरत रहता है। इस अवस्था में वित्तीय आवश्यकताओं के लिए वह बैंको, वित्तीय संस्थाओं, संयुक्त परियोजनाओं, लाभ की राशि, नए विनियोजक, नए साझेदार आदि पर निर्भर करता है। यह अवस्था सफलता के साथ-साथ विभिन्न चुनौतियाँ भी लेकर आती है। इस अवस्था में विभिन्न चुनौतियाँ होती है, जैसे प्रतिस्पर्धा का सामना करना, नए बाजार तलाशना नए-नए उत्पाद तैयार करना, बिक्री का स्तर बनाए रखना आदि । अत: एक उद्यमी को इन सभी चुनौतियों का सामना अपनी योग्यता, कौशल, अनुभव आदि के साथ साथ पेशेवर विशेषज्ञों की भी सहायता लेकर करना चाहिए।
(6) परिपक्वता स्थित यह व्यवसाय की ऐसी स्थिति है जिसमें व्यवसाय संबंधित उद्योग में उच्च स्तर पर स्थापित हैं तथा परिपक्व हो चुका है। व्यवसाय की बाजार में उपस्थिति प्रशंसनीय स्तर पर होती है। परंतु उसमें भी समस्याएँ सामानान्तर रूप से साथ-साथ उत्पन्न होती है। इस पर व्यवसाय के विकास की दर पहले की तरह बहुत अधिक नहीं होती। यह दर विस्तार की स्थिति से थोड़ा कम ही होती है। अत: वयवसायी उद्यमी को आलोचनात्मक विश्लेषण के तरीके अपनाते हुए परिस्थितियों का गहन विश्लेषण करना चाहिए। उसे अत्यंत महत्वपूर्ण विश्लेषण करना होता है कि वह कैसे तेज विस्तार की स्थिति में जाए, अन्यथा उसे बाहर का रस्ता भी देखना पड़ सकता है। इस अवस्था में उद्यमी नए व्यावसायिक अवसरों की सम्भावनाओं या संयुक्त परियोजनाओं, लागतों को कम करना, रोकड़ के प्रवाह को बनाए रखने जैसे क्षेत्रों पर भी अपना ध्यान केंद्रित करता है। इस स्तर पर व्यवसाय की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उद्यमी बैंकों, वित्तीय संस्थाओं, लाभों, विनियोजकों, पूर्तिकर्ताओं आदि पर निर्भर रहता है। यह अवस्था व्यवसाय के भविष्य की दिशा को भी निर्धारित करती है। इस स्तर पर व्यवसायी को कई बार बिक्री में कमी, लाभ की दर में कमी, रोकड़ो प्रवाह में गिरावट जैसे समस्याओं का भी सामना करना पड़ सकता है। अतः उद्यमीके लिए यह 'करो या मरो' जैसे स्थिति मानी जाती है। इसलिए उसे अपना संपूर्ण विशेषज्ञता कौशल प्रयोग करके, इसे अनुकूल परिस्थितियाँ बनाने का प्रयास करना चाहिए।
(7) बाहर निकलने की अवस्था: यह व्यवसाय के लिए एकखतरनाक एवं अवांछनीय अवस्था मानी जाती है। कोई भी उद्यमी अपने व्यवसाय को इस अवस्था में नहीं देखना चाहता है। इस स्तर पर व्यवसाय को हर क्षेत्र में नकारात्मकता ही देखनी पड़ती है। व्यवसाय की बिक्री, लाभ, बाजार हिस्सा आदि सब कम होना शुरू कर देते है तथा गिरावटकी प्रवृत्ति दिखाई पड़ता है। अत: उद्यमी को अपने सभीप्रयास व्यवसाय की इस समस्या से निपटने के लिए करने चाहिए अन्यथा उसका व्यवसाय बंद करने की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। संपूर्ण • प्रयासों के पश्चात भी अगर उद्यमी इस स्थिति का सामना करने में असमर्थ रहता है तो उसे व्यवसाय को बंद करने का भी निर्णय लेना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो इसे व्यवसाय का उचित मूल्यांकन करवाना चाहिए। उचित मूल्यांकन करवाते समय बाजार में स्थिति आदि को अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। व्यवसाय का उचित मूल्यांकन व्यवसाय को पुनः किसी को बेच दिए जाने के निर्णय में सहायक सिद्ध होता है।
अंत में यह कहा जा सकता है कि एक व्यवसाय चाहे वह नया हो अथवा स्थापित, के जीवन काल में विभिन्न अवस्थाएँ आती है। प्रत्येक अवस्था की अपनी- अपनी विशेषताएँ, लाभ, सीमाएँ, आयु या अवधि एवं चुनौतियाँ होती है। हर अवस्था की समस्या से निपटने के लिए नीतियाँ एवं रणनीतियाँ भी परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं। अत: उद्यमी को व्यवसाय के जीवन काल की प्रत्येक अवस्था का महत्व समझना चाहिए तथा आश्ययकतानुसार अपनी योग्यता, कौशल, ज्ञान एवं अनुभव का प्रयोग करना चाहिए।
बड़े उद्यम के छोटे उद्यम के साथ संबंध
लघु उद्योग हर देश में विद्यमान होते हैं। एक विकासशील देश में लघु उद्योगों का एक महत्वपूर्ण स्थान होता है। हमारे देश भारत में मानवीय संसाधनतो प्रचुर मात्रा में है लेकिन पूँजी की कमी हमेशा बनी रहती है। लघु उद्योग मुख्य रूप से श्रम पर आधारित होते हैं। इसलिए हमारे जैसे देश जहाँ मानवीय शक्ति की अधिकता है, लघु उद्योगों का महत्व और अधिक बड़ जाता है तथा यह हमारी अर्थव्यवस्था के साथ सर्वोचित भी है।
लघु उद्योगों की महत्ता एवं सम्भावनाओं को सरकार द्वारा भी समझा गया है इसीलिए सरकार भी लघु उद्योगों को प्रोत्साहित करती रहती है।
लघु व्यवसाय
लघु व्यवसायों की अवधारणा को प्रत्येक देश के द्वारा अलग-अलग प्रकार से परिभाषित किया जाता है। ये परिभाषाएँ समय के साथ परिवर्तित भी होती रहती हैं। लघु/छोटे आकार के व्यवसाय को परिभाषित करने के लिए मुख्यत: दो आधार लिए जाते है।
(1) व्यवसाय का आकार: आकार से अभिप्राय व्यवसाय के संचालन के पैमाने से है। व्यवसाय के आकार को निम्न आधारों पर मापा जा सकता है:
(i) कुल पूँजी निवेश
(ii) कुल संपत्तियों या स्थायी संपत्तियों का मूल्य
123(iii) प्लांट एवं मशीनरी में कुल निवेश
(iv) कार्यरत कर्मचारियों की कुल संख्या
(v) उत्पादन का मूल्य / संख्या
(vi) बिक्री की राशि
(vii) उपरोक्त सभी का संयोजन
(2) गुणात्मक मापदंड : व्यवसाय का आकार उद्यम की सही प्रवृत्ति प्रस्तुत नहीं करता है। अतः इसके लिए उसके गुणों / विशेषताओं को आकार के साथ में प्रयोग किया जाता है। ये विशेषताएँ निम्न होती है:
(i) स्वामित्व
(ii) प्रबंध की प्रकृति
(iii) तकनीक
(iv) संचालन का भौगोलिक क्षेत्र
अतः दोनों आधारों को छोटे व्यवसायों को परिभाषित करने के लिए संयुक्त के लिए संयुक्त रूप से प्रयोग किया जाता है।
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