अत्याचार एवं कुप्रबंधन की रोकथाम - Prevention of tyranny and mismanagement
अत्याचार एवं कुप्रबंधन की रोकथाम - Prevention of tyranny and mismanagement
कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 241 से 245 तक के विशेष उपबंधों के अधीन टिब्यूनल को अत्याचार एवं कुप्रबंधन की रोकथाम के लिए कंपनी के मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया गया है।
धारा 241 के अनुसार धारा 244 में निर्दिष्ट संख्या में, कंपनी के सदस्य निम्नलिखित आधार पर उपयुक्त राहत के लिए ट्रिब्यूनल को आवेदन कर सकते हैं:
• अत्याचार - यदि कंपनी का कारोबार किसी ऐसे तरीके से चलाया गया था चलाया जा रहा हो जिससे उसपर या किसी अन्य सदस्य पर या सदस्यों के प्रति अत्याचार होता हो अथवा किसी ऐसे तरीके से चलाया जा रहा हो जो लोकहित के प्रतिकूल हो ।
अत्याचार का अर्थ किसी सदस्य अथवा सदस्यों के प्रति क्रूरतापूर्ण और अत्याचारपूर्ण व्यवहार करना है। इसके अंतर्गत केवल नीति और प्रशासन के संबंध में संचालकों तथा सदस्यों के बीच के आंतरिक विवाद,
संचालकों तथा सदस्यों के बीच निजी शत्रुता, अथवा बहुसंख्यक शेयरधारियों तथा अल्पसंख्यक शेयरधारियों के बीच परस्पर विश्वास की कमी के मामले नहीं आते। अत्याचार का आरोप लगाने वाले शेयरधारी को यह सिद्ध करना होगा कि उस पर एक ऐसा बोझ है जो कढोर अथवा अनुचित अथवा अत्याचारपूर्ण है। याचिक की तारीख तक बहुसंख्यकों द्वारा अनिवार्यत: ऐसे कार्य निरंतर किये गये होने चाहिए जो इस बात के द्योतक हों कि कंपनी का कारोबार ऐसे तरीके से चलाया जा रहा है जिससे कुछ सदस्यों के प्रति अत्याचार हो रहा है।
• कुप्रबंधन - यदि कंपनी के प्रबंधन अथवा नियंत्रण में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन हो गया हो, चाहे यह परिवर्तन संचालक मंडल अथवा प्रबंधक के परिवर्तन के कारण अथवा कंपनी के शेयरों के स्वामित्व परिवर्तन के कारण, अथवा यदि कंपनी की कोई शेयर पूंजी न हो तो इसके सदस्यों के परिवर्तन के कारण हुआ हो, और इस परिवर्तन के कारण यह संभावना हो कि कंपनी का कारोबार ऐसे तरीके से किया जायेगा जो लोकहित या कंपनी या सदस्यों के हितों के प्रतिकूल होगा।
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