फॉस बनाम हारबोटल के वाद में प्रतिपादित सिद्धांत - Principles Propounded in the Case of Foss vs. Harbottle
फॉस बनाम हारबोटल के वाद में प्रतिपादित सिद्धांत - Principles Propounded in the Case of Foss vs. Harbottle
बहुसंख्यकों की सर्वोपारित का सिद्धांत, सर्वप्रथम 1843 में फॉस बनाम हारबोटल के प्रसिद्ध वाद में न्यायिक स्तर पर स्वीकार किया गया था।
वाद के तथ्य - दि विक्टोरिया पार्क कंपनी के दो शेयरधारियों फॉस तथा टरटन ने अपनी और से तथा अन्य शेयरधारियों की और से कंपनी के 5 संचालकों, प्रतिवस्ता और वास्तुक के विरूद्ध वाद चलाया और उनपर यह आरोप लगाया कि उन्होंने इकट्ठे होकर अनेक कपटपूर्ण तथा अवैध लेन-देन किए, जिसके कारण कंपनी की संपत्ति का दुरूपयोग तथा अपव्यय हुआ है। वादियों ने यह प्रार्थना की कि न्यायालय द्वारा प्रतिवादियों को याचिका में बताए गए उनके गलत कार्यों के कारण कंपनी को हुई हानि की क्षतिपूर्ति करने के आदेश दिए जाएँ।
न्यायालय ने इस मुकदमे को इस तर्क के साथ रद्द कर दिया कि जिस प्रकार के आचरण के प्रतिवादियों पर आरोप लगाए गए है; उससे केवल वादियों को ही हानि नहीं हुई अपितु इससे पूरे कार्पोरेशन को क्षति पहुँची है और इसलिए वादी नहीं, बल्कि केवल कार्पोरेशन ही अपने नाम से कानूनी कार्यवाही कर सकती है, अन्यथा न्यायालय द्वारा कार्यवाही किया जाना व्यर्थ होगा, क्योंकि कथित कर्तव्य-भंग का साधारण सभा में कंपनी द्वारा अनुसमर्थन किया जा सकता है।
फॉस बना हारबोटल के वाद में दिए गए अधिनिर्णय से यह सिद्ध हो गया कि अल्पसंख्यक शेयरधारियों द्वारा वाद प्रस्तुत किये जाने पर अपने अधिकारों के अंतर्गत कार्य करनेवाली कंपनियों के आंतरिक प्रबंधन में न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा, भले ही प्रबंधक वर्ग की लापरवाही तथा अदक्षता सिद्ध भी हो जाये, क्योंकि जिन विषयों का साधारण सभा में अनुसमर्थन किया जा सकता है, उन विषयों पर कानूनी कार्यवाही करने में कोई तर्क नहीं है।
फॉस बनाम हारबोटल के वाद में प्रतिपादित सिद्धांत तब से अनेक वादों में भी अपनाया गया है।
वार्तालाप में शामिल हों