उद्यमिता विकास कार्यक्रमों की समस्याएँ - Problems of Entrepreneurship Development Programs

उद्यमिता विकास कार्यक्रमों की समस्याएँ - Problems of Entrepreneurship Development Programs


उद्यमिता विकास कार्यक्रम के मार्ग में आने वाली मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं :


(1) राष्ट्रीय स्तर की नीति का अभाव : यद्यपि भारत सरकार को उद्यमिता विकास के महत्त्व के बारे में पूरी तरह से पता है, फिर भी देश में इनके बारे में राष्ट्रीय स्तर की नीति विद्यमान नहीं है। सरकार द्वारा इन कार्यों में लगी हुई विभिन्न संस्थाओं के लिए अलग-अलग नीतियाँ अवश्य बनाई गई हैं, परंतु राष्ट्रीय नीति के अभाव में अक्सर इनमें समन्वय स्थापित नहीं हो पाता। अतः विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन में कई तरह की समस्याएँ उत्पन्न होती है।


(2) प्रशिक्षुओं के बारे में गलत अनुमान विभिन्न उद्यमिता विकास कार्यक्रमों के संचालन के समय यह मान लिया जाता है कि इसमें भाग लेने व्यक्तियों/ संभावित उद्यमियों के पास स्वरोजगार स्थापित करने की आवश्यक योग्यता है

तथा प्रशिक्षण के पश्चात वे अपना व्यवास स्थापित कर सकेंगे तथा इसे सुलतापूर्वक चला सकेंगे। सामान्य तौर यह देखने में आता है कि विभिन्न संगठन अपने प्रतिभागियों की योग्यता व क्षमता के बारे में गलत अनुमान लगाते है और उसके कारण उन्हें आवश्यक परिणाम प्राप्त नहीं हो पाते हैं।


(3) प्रशिक्षण से पूर्व की अवस्था में समस्याएँ: प्रशिक्षण आयोजन की अवस्था में कई तरह की समस्याएँ आती हैं जैसे- व्यावसायिक अवसरों की पहचान करना, प्रतिभागियों को पहचानना, उनका सफलतापूर्वक चयन करना, प्रशिक्षण का स्थान, अनुभवी प्रशिक्षकों की व्यवस्था करना आदि। इस समस्याओं का उचित समाधान न किए जाने से कार्यक्रमों की प्रभावशीलता में कमी आ जाती है।


(4) उद्यमिता विकास कार्यक्रमों की अवधि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों की अवधि 4 से 6 सप्ताह तक की होती है, जो किसी व्यक्ति में प्रबंधकीय क्षमताओं को समझाने व विकसित किए जाने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जाती। अतः इस कार्यक्रम के आधारभूत उद्देश्य, संभावित उद्यमियों में उद्यमिता के गुणों का विकास करना तथा उसे व्यवसाय स्थापित करने के लिए प्रेरित करना, को भी प्राप्त करना संभव नहीं हो पाता है।


(5) ढाँचागत सुविधाओं की अनुपलब्धता : इस तरह के कार्यक्रम आमतौर पर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में अधिक किए जाते हैं। इन क्षेत्रों में आधारभूत ढाँचागत सुविधाओं की भी कमी होती है। अच्छी क्लास, तकनीकी संयंत्र तथा अच्छे प्रशिक्षक आदि ऐसे क्षेत्रों में नहीं मिलने के कारण कार्यक्रम प्रभावी ढंग से नहीं हो पाती है।


(6) चयन का गलत तरीका आपस में प्रतिस्पर्धा तथा राष्ट्रीय नीति के अभाव के कारण संभावित उद्यमियों की पहचान के लिए कोई एक समान नीति नहीं अपनाई जाती है। कई बार ऐसे कार्यक्रकों में उन व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है जिनके पास अपनी व्यावसायिक परियोजना पहले से विद्यमान होती है। इस प्रकार नए लोगों या रुचिकर लोगों को इसमें स्थान मिल पाना संभव नहीं हो पाता ।


(7) योग्य प्रशिक्षकों का अभाव : विभिन्न शोध कार्यों से यह पता चलता है कि ऐसे कार्यक्रमों की असफलता का मुख्य कारण योग्य प्रशिक्षकों/संकाय का उपलब्ध न होना है। कई बार यदि वे उपलब्ध भी होते हैं तो सिर्फ शहरी क्षेत्रों के लिए। वे ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों मेंप्रशिक्षण देने के लिए इच्छुक नहीं होते हैं।


(8) वित्तीय संस्थाओं की ख़राब प्रक्रिया: प्रशिक्षण के पश्चात व्यवसाय स्थापित करने के लिए वित्त एक आवश्यक हिस्सा होता है। आमतौर पर वित्तीय संस्थाएं वित्त उपलब्ध करवाने के लिए किसी न किसी रूप में प्रतिभूति / जमानत / गारंटी की मांग करती है। इस प्रकार की गारंटी न दे पाने के कारण उन्हें यह ऋण उपलब्ध नहीं होता। विभिन्न प्रकार की कानूनी औपचारिकता से भी संभावित उद्यमी हतोत्साहित होते हैं। इस प्रकार वे अपने विचार को वास्तविकता का रूप नहीं दे पते।


(9) साधनों की अनुपलब्धता: व्यवसाय स्थापित करने के लिए आवश्यक साधनों; जैसे - कच्चा माल, बिजली, पानी, मशीनों आदि की अनुपलब्धता भी इस तरह के कार्यक्रमों से अपेक्षित परिणामों के मार्ग में बाधा उत्पन्न करते हैं।


(10) मानकीकरण का अभाव : उद्यमिता विकास कार्यक्रमों के पाठ्यक्रमों का मानकीकरण किसी भी स्तर पर स्थापित या निर्धारित नहीं किया गया है। इसी कारण से इस कार्य में शामिल विभिन्न संस्थाओं और संगठनों के पास कोई भी व्यापक रूप से स्वीकार किये जाने वाले कार्यक्रमों की उपलब्धता नहीं होती है।