परियोजना के उद्देश्य - Project Objectives

परियोजना के उद्देश्य - Project Objectives


उद्देश्य वे नींव हैं जिन पर परियोजना प्रारूप की इमारत का निर्माण किया जाता है। परियोजना के उद्देश्य संक्षिप्त रूप में यह परिभाषित करने से संबंधित है कि परियोजना क्या प्राप्त करने की अपेक्षा करती है और यह संपूर्ण रूप से परियोजना के निष्पादन के मापकों को प्रदान करने से संबंधित है।


परियोजना के उद्देश्य दो श्रेणियों में वर्गीकृत किए गए हैं धारण क्षम उद्देश्य और अर्जनशील उद्देश्य । धारण क्षम उद्देश्य संसाधनों; जैसे मुद्रा, समय, ऊर्जा, यंत्र और कुशला के धारण और संरक्षण से संबंधित हैं। । दूसरी ओर अर्जनशील उद्देश्य संसाधनों के संग्रहण या वह स्थिति प्राप्त करने, जो संगठनों या उसके प्रबंधकों की नहीं है, से जुड़े हैं।


परियोजना उद्देश्य आर्थिक और सामाजिक प्रकृति के भी हो सकते हैं। आर्थिक उद्देश्य प्राथमिक रूप से केवल प्राथामिक वित्तीय लागत और परियोजना के लाभों से संबंधित हैं। सामाजिक उद्देश्य व्यक्तिगत परियोजना के सामाजिक लागत लाभ पहलुओं के साथ समरूप होते हैं। इस प्रकार उद्देश्य, राष्ट्र की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले परियोजना के पूर्ण प्रभाव के दृष्टिकोण से परियोजना के विश्लेषण की प्रक्रिया है।


चूंकि परियोजना किसी निश्चित समयावधि के दौरान एक समुदाय के लिए वस्तु या सेवाओं के उत्पादन में वृद्धि हेतु कुछ सुविधाओं को निर्मित, विस्तृत और विकसित करने के लिए निवेश करने का प्रस्ताव है। इसलिए जब परियोजना के उद्देश्यों का निर्णय लेना हो, तो कुछ बिंदुध्यान में रखने चाहिए; जैसे -


1. उद्देश्य संगठनात्मक योजनाओं, नीतियों और प्रक्रियाओं के अनुकूल होने चाहिएं।


2. उद्देश्य समय के साथ-साथ परिमेय, वास्तविक और प्रमाणनीय होने चाहिएं।


3. उद्देश्य वर्तमान या पूर्वानुमानित संसाधनों के साथ सुसंगत होने चाहिएं।


एक नई इकाई की स्थापना के चरण एक लघु आकार के उद्यम की स्थापना के चरण नए व्यवसाय की स्थापना के विभिन्न चरण एक उद्यमी जो व्यवसाय स्थापित करने में गहन रुचि रखता है, उसे एक प्रभावपूर्ण व्यावसायिक योजना तैयार करनी चाहिए तथा व्यवसाय स्थापित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए जिससे कि उसका विचार वास्तविकता का रूप ले सके। इस संदर्भ में उठाए जाने वाले विभिन्न कदमों का वर्णन यहाँ किया गया है। यह विभिन्न चरण उसे क्रमानुसार पूरे करने होते हैं :


1. स्वरोजगार का निर्णय - एक उद्यमी आर्थिक विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है । आधारभूत रूप से वह ऐसा व्यक्ति होता है जो एक नए व्यवसाय या उद्यम की स्थापना की जिम्मेवारी उठाता है । जिसमें पहल करने, अन्वेषण का गुण तथा ऊँचे पद की प्राप्ति जैसे गुण विद्यमानह होते हैं। वह परिवर्तनका उत्प्रेरक एजेंट होता है तथा वह समाज के लोगों की भलाई के लिए कार्य करता है । वह नए व्यवसाय स्थापित करने का कार्य करता है, समाजके लिए धन निर्माण करता है, रोजगार के अवसर पैदा करता है तथा विभिन्न क्षेत्रों के विकास का कार्य करता है। शिक्षा पूरी हो जाने के पश्चात शिक्षित व्यक्ति के पास दो विकल्प होते हैं जिनमें से उसे एक को चुनना होता है। एक तो यह कि वह दूसरों के कर्मचारी के रूप में कार्य करें तथा इसके लिए गहन आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता होती है। यदि ऐसे व्यक्ति में सही कौशल, ज्ञान, योग्यता तथा  आत्मविश्वास है तो उसके लिए अपना व्यवसाय स्थापित करना सर्वोत्तम विकल्प माना जाता है। अतः उसे इस संदर्भ में आगे चलना चाहिए। इसके अतिरिक्त हमारे देश में बेरोजगारी की दर ऊँची होने के कारण भी गुणवान व्यक्ति उद्यमी अपना व्यवसाय शुरू करने के बारे में सोचना अधिक अच्छा विकल्प मानते हैं।

इस प्रकार वे अपने उद्यम के स्वामी तो बनते ही हैं तथा वह अन्य लोगों को भी रोजगार प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त युवाओं की एक और श्रेणी अपना उद्यम स्थापित करने के लिए कार्य करती है। जो व्यक्ति अपने वर्तमान कार्य स्थल पर संतुष्ट नहीं हैं तथा उनमें उद्यमी बनने के संभावित गुण हैं तो वे भी अपना व्यवसाय शुरू करने का निर्णय लेते हैं। उनकी वर्तमान कार्यस्थल से संतुष्टि के अनेक कारण होते हैं जैसे अपर्याप्त वेतन, कार्य से संतुष्टि न मिलना, असुरक्षित भविष्य आदि। इसके लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न प्रोत्साहित करने वाले योजनाएँ भी संभावित उद्यमियों को नई परियोजना या व्यवसाय स्थापित करने के लिए प्रेरित करती हैं। सरकार विभिन्न योजनाएँ, भी संभावित उद्यमियों को नई परियोजना या व्यवसाय स्थापित करने के लिए प्रेरित करती हैं। सरकार विभिन्न योजनाएँ, सहायताएँ, सब्सिडी, कम ब्याज दर आदि जैसे प्रलोभनों द्वारा युवाओं को नई व्यावसायिक इकाइयाँ स्थापित करने के लिए अभिप्रेरित करती है।

इसके अतिरिक्त कुछ आंतरिक एवं व्यक्तिगत कारण भी कुछ व्यक्तियों को उद्यमी बनने के लिए प्रेरित करते हैं। ये कारण उनके गुणों के रूप में भी माने जा सकते हैं जैसे- शैक्षणिक पृष्ठभूमि, पारिवारिक व्यावसायिक पृष्ठभूमि, स्वतंत्र रूप से स्थापित होने की इच्छा, नेतृत्व का गुण, पहलपन का गुण आदि। समाज में विद्यमान कुछ बाहरी कारण भी उद्यमिता को उद्यम में बदलने का कार्य करते हैं । औद्योगिक वातावरण की सकारात्मक उपलब्धता, बाजार में नए उत्पादोंकी माँग, सरकार की विशेष प्रोत्साहन योजनाएँ आदि उद्यमियों को स्वरोजगार स्थापित करने के लिए निर्णय लेने में सहायता करते हैं। अत: यह कहा जा सकता है कि नया व्यवसाय या लघु इकाई स्थापित करने का निर्णय उन व्यक्तियों के लिए सही है जो प्रबंध तथा स्वामित्व दोनों ही क्षेत्रों में अपने आप को स्थापित करना चाहते हैं। इसलिए उद्यमी शब्द को सब तरह के व्यवसायों के साथ-साथ विशेष से छोटे व्यवसायों के साथ अधिक जोड़ा जाता है।


2. परियोजना / व्यवसाय की पहचान परियोजना की पहचान का अर्थ आर्थिक आँकड़ों को इकट्ठा करना, उसका संकलन करना तथा उनका विश्लेषण करना होता है। इस विश्लेषण से परियोजना से संबंधित मुख्य बातोंका पता लगाने का प्रयास किया है। संभावित परियोजना की जगह, उसमें निवेश, उसका भविष्य तथा उसमें विकास के अवसर जैसे तत्त्वों को इस स्तर पर जानने व समझने की कोशिश की जाती है। पीटर ड्रकर के अनुसार अवसर तीन प्रकार के हो सकते हैं: संयोजक, पूरक तथा पारवेधन ।



प्राप्त लाभ, बचत आदि। इसलिए एक उत्पाद का चयन अनेक तत्त्वों के विश्लेषण के पश्चात किया जाना होता है। कुछ मुख्य महत्त्वपूर्ण तत्त्व जिनको ध्यान में रखा जाना चाहिए, निम्न हो सकते हैं:


1. उद्यमी की पृष्ठभूमि तथा अनुभव


2. परियोजना के लिए उपलब्ध तकनीकी जानकारी तथा उसकी उपलब्धता


3. उत्पादन या सेवा की विक्रय संभावनाएँ


4. निवेश की क्षमता


5. प्लाट एवं मशीनरी की उपलब्धता


6. कच्चे माल की उपलब्धता


7. आधारभूत ढाँचागत सुविधाओं (भूमि, रोड, पानी, परिवहन आदि) की उपलब्धता


8. सरकारी नियम, नीतियाँ एवं नियंत्रण


9. सरकार द्वारा दी जाने वाली छूटें, सब्सिडी आदि


10. वातावरण संबंधी तत्त्व


11. क्षेत्रीय एवं स्थानीय लाभ


12. सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक, आर्थिक परिस्थितियाँ


13. संबंधिता क्षेत्र की जनसंख्या


14. उद्यमी की व्यक्तिगत रुचि तथा क्षेत्र


इन संबंधी तत्त्वों / पहलुओं की जानकारी विभिन्न तकनीकी संस्थानों पर किए जा रहे प्रकाशनों, राज्य की विकास एजेंसियों, औद्योगिक घरानों,

उभरते हुई सहायक व्यावसायिक इकाइयों, विकासशील बड़े स्तर की व्यावसायिक इकाइयों आदि), बैंको, वित्तीय संस्थाओं, जिला औद्योगिक सेंटर, विभिन्न सरकारी वित्तीय एवं गैर-वित्तीय संस्थाओं, उद्यमिता विकास के कार्यक्रमों में शामिल विभिन्न संस्थाओं आदि से प्राप्त की जा सकती है। कुछ विशेष परियोजनाओं में इस निर्णय को लेने के लिए पेशेवर व्यक्तियों की सलाह भी ली जा सकती है। उद्यमी बाजार से इस संबंध में और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए सलाहकारों एवं पेशेवर व्यक्तियों या स्वयं भी बाजार का सर्वेक्षण करवा सकता है।


हमारे देश में लघु स्तर के उद्यमी अपने व्यवसाय से जुड़कर हजारों की संख्या में उत्पाद बना रहे हैं जिसमें साधारण उत्पाद से लेकर महंगे से महंगे उत्पाद शामिल हैं। इस श्रेणी में विभिन्न उत्पाद जैसे साबुन तथा डिटरजेंट, कृषि उपकरण, रेडीमेड वस्त्र, जैम,

प्लास्टिक उत्पाद, खाद्य पदार्थ, रसायन उत्पाद, उर्वरक, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद आदि अनेकों उत्पाद शामिल हैं। इसलिए एक उत्पाद का चयन सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए तथा संभावित उद्यमी को यह विश्लेषण का कार्य भी पूर्ण रूप से सजग होकर करना चाहिए। उसका यह निर्णय ही उसकी सफलता का आधार बनना होता है। उद्यमी को यह निर्णय लेते समय भविष्य से इससे जुड़ी हुई विभिन्न समस्याओं जैसे प्रतिस्पर्धा का स्तर, तकनीकी परिवर्तन, बदलता व्यावसायिक वातावरण, सरकार की नीतियाँ एवं प्रतिबंध आदि को भी पहले से ध्यान में रखना चाहिए।


4. व्यावसायिक स्वामित्व के प्रारूप का चयन - व्यवसाय / उद्यम / लघु व्यवसाय के स्वामित्व के विभिन्न प्रारूप होते हैं; जैसे एकाकी व्यापार, साझेदारी, कंपनी (निजी या सार्वजनिक) आदि । सामान्य - तथा एकाकी व्यापार या पारिवारिक व्यवसाय उद्यमी द्वारा ज्यादा पसंद किए जाते हैं।

इसका मुख्य कारण इनका स्वामित्व तथा प्रबंधन पर आसान नियंत्रण होता है। व्यवसाय के कुछ प्रारूप जैसे साझेदारी या निजी कंपनियों के लिए विशेष कौशल, ज्ञान, आत्मविश्वास, तकनीकी जानकारी, अधिक पूँजी आदि की आवश्यकता होती है। इसलिए उद्यमी इनका निर्णय अपनी योग्यता एवं कौशल एवं सीमाओं को ध्यान में रखकर ही लेता है। व्यावसायिक व्यवसायों के विभिन्न प्रारूपों के अपने अपेन लाभ तथा सीमाएँ हैं। प्रत्येक रूप की अपनी अलग विशेषताएँ होती हैं। हर प्रारूप के भविष्य की भी अलग-अलग संभावनाएँ होती हैं। अतः उद्यमी को व्यवसाय के प्रारूप का निर्णय लेते समय इन सभी बातों को ध्यान में रखना चाहिए तथा उसके पश्चात ही अंतिम निर्णय लेना चाहिए।


5. स्थान का निर्णय उद्यमी की सबसे महत्त्वपूर्ण प्रारंभिक समस्या व्यवसाय के लिए स्थान का चयन करने की होती है। व्यवसाय के स्थान का निर्णय चुनौतीपूर्ण होता है। इस चरण में भी अनेक तत्त्वों का विश्लेषण किया जाना होता है। इस निर्णय के दौरान उद्यमी को सामान्यतः निम्नलिखित तत्त्वों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए:


1. कच्चे माल की उपलब्धता


2. बिजली (विद्युत) की उपलब्धता


3. बाजार की निकटता


4. यातायात एवं संदेशवाहन के साधनों की उपलब्धता


5. जलवायु संबंधी परिस्थितियाँ


6. श्रम की उपलब्धता


7. सहायक औद्योगिक इकाइयों का अस्तित्व


8. क्षेत्र में उपलब्ध सरकारी सहायता एवं योजनाएँ


9. आर्थिक सामाजिक एवं राजनैतिक तत्त्व


10. क्षेत्र के लोगों की सोच


11. बैंकिंग तथा अन्य सुविधाएँ


इस चरण को एक ओर तरह से विश्लेषित और वर्णित किया जा सकता है। एक उद्यमी के पास इस चरण में विभिन्न विकल्प उपलब्ध होते हैं तथा वह उनमें से सर्वोत्तम का चुनाव कर सकता है।

वह औद्योगिक क्षेत्र के लिए जगह भूमि का चुनाव उन औद्योगिक क्षेत्रों में से कर सकता है जिन्हें संबंधित राज्य सरकार द्वारा विसित किया गया हो या विभिन्न संस्थागत प्रोत्साहन एजेंसियों सा संस्थाओं जैसे SIDO, SIPCOT, MMDA, TNHB आदि द्वारा उपलब्ध एवं विकसित करवाया जाता है। एक अन्य विकल्प यह भी होता है कि राज्य औद्योगिक विकास एजेंसी द्वारा विकसित किए औद्योगिक क्षेत्र में से भूखंड अथवा शेड चुन सकता है। इसके अतिरिक्त एक उद्यमी निजी कंपनियों द्वारा विकसित किए गए औद्योगिक क्षेत्र में निजी जमीन खरीद कर उस पर उद्यम स्थापित कर सकता है। निजी क्षेत्र के औद्योगिक क्षेत्रों में आसानी से रियलएस्टेट एजेंटों से जानकारी प्राप्त की जा सकती है। निजी जमीन खरीद कर उस पर वाणिज्यिक गतिविधि करने के लिए कुछ आवश्यक कानूनी औपचारिकताएँ पूरी करनी होती हैं। इसके लिए जिला कलेक्टर की अनुमति की भी स्वीकृति ली जानी होती है। एक अन्य विकल्प उद्यमी के पास यह भी होता है कि वह स्थान का चयन मुक्त व्यापार क्षेत्र में भी कर सकता है। इस प्रकार उद्यमियों को सभी विकल्पों की तुलना करने के पश्चात उनमें सबसे उत्तम विकल्प का चुनाव करना चाहिए। ऐसा करते समय उपरोक्त वर्णित सभी तत्त्वों का सावधानी से विश्लेषण अवश्य करना चाहिए।