ऋण लेने का अधिकार - right to borrow

ऋण लेने का अधिकार - right to borrow


प्रत्येक व्यापारिक अथवा वाणिज्यिक कंपनी को अपने करोबार के लिए किसी भी सीमा तक ऋण लेने और उधार ली गई राशि के लिए जमानत के रूप में अपनी संपत्तियों को प्रभारित करने का अंतर्निहित अधिकार होता है। परंतु कंपनी के अंतर्नियमावली अथवा ज्ञापन पत्र द्वारा इस अधिकार को सीमित किया जाता सकता है। गैर-व्यपारिक कंपनियों जो धर्म, कला, वाणिज्य, विज्ञान आदि को प्रोत्साहित करने के लिए गठित की जाती है, जो किसी प्रकार के लाभांश का भुगतान नहीं करती, अंतर्नियमावली अथवा ज्ञापन-नत्र में जब तक अभिव्यक्ततः ऋण लेने के लिए प्रधिकृतन किया गया हो, तब तक उन्हें ऋण लने का कोई अधिकार नहीं होता।


कंपनी के अंतर्नियमावली अथवा ज्ञापन पत्र अथवा अधिनियम द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के अधीन, कंपनी के ऋण लेने के अधिकार का प्रयोग संचालकों द्वारा कियाजाता है जिन्हें किसी भी तरीके से और कैसी भी शर्तो पर इस अधिकार का प्रयोग करने की स्वतंत्रता होती है। धारा 180 के अनुसार, किसी कंपनी के संचालक, साधारण सभा में विशेष संकल्प पारित करके कंपनी की सहमति प्राप्त किए बगैर इतनीराशि उधार नहीं लेंगे जो पहले से प्राप्त किए गए ऋणों को सम्मिलित करके कंपनीकी प्रदल पूँजी और उसकी मुक्त आरक्षित विधि के योग से अधिक हो।