आर्थिक विकास में उद्यमी की भूमिका - role of entrepreneur in economic development
आर्थिक विकास में उद्यमी की भूमिका - role of entrepreneur in economic development
उद्यमी की भुमिका प्रत्येक देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण होती है। यह भूमिका प्रत्येक देश में भिन्न-भिन्न होती है । उद्यमी की अर्थव्यवस्था में भूमिका बहुत सी बातों पर निर्भर करती है, जैसे- देश का औद्योगिक वातावरण, राजनैतिक वातावरण, संसाधनों की उपलब्धता, उद्यमी का ज्ञान एवं कौशल आदि । परंतु यह एक स्वीकार्य तथ्य है कि उद्यमी अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। देश का आर्थिक एवं औद्योगिक विकास बहुत हद तक उद्यमियों के कार्यों पर निर्भर करता है। उद्यमी न केवल अर्थव्यवस्था में नई व्यावसायिक इकाइयां स्थापित करता है बल्कि संसाधनों के उचित उपयोग से देश में रोजगार के अवसर पैदा करता है। वह नए उत्पाद बाजार में लाता है, देश के लोगों का जीवन स्तर ऊँचा उठाता है, देश की प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी में योगदान देता है।
वह अवसरों को पहचानकर नई इकाइयाँ स्थापित करने का वातावरण तैयार करता है। उद्यमी की अर्थव्यवस्था में भूमिका का वर्णन विस्तारपूर्वक इस प्रकार से हैं:
(1) रोजगार का सृजन: उद्यमी रोजगार के सृजन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर पैदा करने में मदद करता है। वह स्वरोजगार करते हुए सम्मानपूर्वक जीवन बिताता है। वह सरकारी नौकरियों पर निर्भर नहीं रहता। वह देश में सूक्ष्म स्तर, लघु स्तर तथा मध्यम स्तर की व्यावसायिक इकाइयां स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान देता है। देश के पिछड़े इलाकों में भी उद्योग स्थापित करने का प्रयास करता है। इस प्रकार रोजगार के अनेक अवसर उत्पन्न होते हैं।
हम यह भी जानते हैं आजकल पढ़े-लिखे युवाओं के लिए रोजगार प्राप्त करना एक चुनौती बनता जा रहा है।
सरकारी नौकरियों की संख्या भी बहुत अधिक नहीं होती। प्रतिस्पर्धा के युग में कई युवक नौकरी प्राप्त कर लेते हैं तो वह भी एक निश्चित अवधि के लिए होती है। कर्मचारियों की रिटायरमेंट के पश्चात भी वे पुनः नौकरी करना चाहते हैं परंतु ऐसा कर पाना आसान नहीं है। इस क्षेत्र में भी उद्यमी ही हैं जो व्यावसायिक इकाइयां स्थापित करते हैं, उनका विकास करते हैं तथा उनमें रोजगार प्रदान करते हैं। इस प्रकार एक उद्यमी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के सृजन में एक मुख्य भूमिका निभाने वाला व्यक्ति होता है
(2) पूँजी निर्माण: उद्यमी देश में पूँजी निर्माण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सेदार माना जाता है। वह व्यावसायिक संस्थानों को इकट्ठा कर व्यावसायिक इकाइयाँ स्थापित करता है । तत्पश्चात उन्हें सफलतापूर्वक चलाने के लिए उसके लिए वित्त की व्यवस्था करता है। इसके लिए वह विभिन्न स्रोतों से पूँजी एकत्रित करता है।
पूँजी एकत्रित करने के लिए वह विनियोजकों के पास से उनकी बचतों को विनियोग में परिवर्तित करने के लिए उन्हें प्रेरित करता है । इस प्रकार अनुत्पादक कार्यों में लगा या पड़ा हुआ धन उत्पादक कार्यों में परिवर्तित हो जाता है। इसके फलस्वरूप देश के औद्योगिक विकास के द्वारा औद्योगिक संसाधनों का भी उचित प्रयोग होता है। इस प्रकार पूँजी निर्माण के द्वारा उद्यमी देश के विकास में योगदान करता है। राबर्ट रस्टैंड ने ठीक ही कहा था कि उद्यमी देश में धन के निर्माता होते हैं। इस तरह से वे पूँजी निर्माण के द्वारा औद्योगिक विकास की दर को भी बढ़ाने में सहायक होते हैं।
(3) संतुलित क्षेत्रीय विकास: उद्यमी देश में निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य करते हैं। वे देश के विभिन्न हिस्सों में परियोजनाएं लेकर आते हैं। उनका देश के पिछड़े हिस्सों पर विशेष ध्यान रहता है। इसका एक मुख्य कारण सरकार द्वारा इन क्षेत्रों में स्थापित की जाने वाली इकाइयों को दिए जाने वाले प्रोत्साहन एवं छूटें भी होता है।
वह इन क्षेत्रों में औद्योगिक इकाइयां स्थापित करके वहां का औद्योगिक विकास करता है। इसके परिणामस्वरूप उन क्षेत्रों में सड़कों, रेलवे, बैंक, बीमा, शिक्षा, मनोरंजन आदि से जुड़े हुए सभी क्षेत्रों का भी विकास होना शुरू हो जाता है। इस प्रकार क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करके उद्यमी देश में संतुलित क्षेत्रीय विकास में भी अपना योगदान देते हैं।
(4) प्रति व्यक्ति पूँजी में वृद्धिः राष्ट्रीय आय में देश में उत्पादित की जाने वाली वस्तुओं तथा सेवाओं से होने वाली आय और निर्यात से होने वाली आय को भी शामिल किया जाता है । उद्यमियों में विद्यमान विशेष गुणों के कारण वे अवसरों की पहचान कर सकते है तथा अवसर के अनुसार वे अपनी व्यावसायिक इकाई स्थापित करते हैं। इस प्रकार बेकर पड़े उत्पादन के साधनों को इकट्ठा करके उपयोगी रूप में लेकर आते हैं।
वे देश के औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि करते हैं जिससे देश की राष्ट्रीय आय में भी वृद्धि होती है। इस प्रकार से राष्ट्रीय उत्पाद तथा राष्ट्रीय आय में हुई वृद्धि के द्वारा प्रति व्यक्ति आय में भी वृद्धि होने की संभावनाएं उत्पन्न होती है।
(5) जीवन स्तर में सुधार: उद्योगों की स्थापना के द्वारा उद्यमी देश में वस्तुओं के उत्पादन की कमी की समस्या को दूर करता है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में मांग के अनुरूप वह नए-नए उत्पाद, बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद, देश के लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार बाजार में लेकर आता है। बड़े पैमाने पर उत्पादन होने के कारण वस्तुओं की कीमतों में काफी कमी आती है। इससे उपभोक्ताओं की क्रयशक्ति भी बढ़ती है जिसके कारण वे नए व • अच्छे उत्पाद कम कीमत पर खरीद सकते हैं। इससे उनका जीवन स्तर भी बढ़ता है।
(6) परियोजनाओं में नवप्रवर्तन: प्रत्येक व्यावसायिक इकाई को अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए नए-नए तरीकों की खोज करनी होती है। इससे वे बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं तथा अपना विकास भी कर सकते हैं। एक नया उद्यमी इस क्षेत्र में विशेष रूप में आक्रामक रवैया अपनाता है। उद्यमी नए उत्पाद, नए संयोजन, नए बाजार, नई सेवाओं के क्षेत्र की खोज करता है। इस सभी कारणें के परिणामस्वरूप आर्थिक विकास में तेजी, औद्योगिक विकास में वृद्धि, रोजगार के नए अवसर, व्यापार का विकास, लाभदायकता में वृद्धि जैसे लाभ अपने आप ही उसे प्राप्त होने लगते हैं। यह भी स्वीकृत तथ्य है कि छोटे स्तर की इकाइयों में अन्वेषक की संभावनाएँ ज्यादा विद्यमान होती हैं। देश में चलाए जा रहे विभिन्न उद्यमिता विकास से संबंधित कार्यक्रम की छोटे स्तर के उद्यमियों को नए विचारों की खोज के लिए प्रेरित करते हैं। इस प्रकार एक नए विचारों की खोज करने वाला उद्यमी अर्थव्यवस्था के लिए एक संपत्ति माना जा सकता है।
(7) आर्थिक शक्तियों का विकेंद्रीयकरण: आधुनिक युग में आर्थिक शक्तियों का प्रभुत्व है। आर्थिक शक्ति का सीधा संबंध व्यावसायिक एवं औद्योगिक गतिविधियों से होता है। औद्योगिक विकास के कारण देश में आर्थिक शक्तियों तथा आर्थिक साधनों पर गिने चुने लोगों का कब्जा मिलता है। इसे शक्तियों का केंद्रीयकरण भी कहा जाता है। इससे एकाधिकार की स्थिति को भी बढ़ावा मिलता है। इसके परिणामस्वरूप व्यावसायिक जगत में अनेक बुराइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं परंतु देश में उद्यमी के प्रयासों से व्यावसायिक इकाइयों की संख्या में वृद्धि होती है तथा संसाधनों एवं आर्थिक शक्तियों का उचित बंटवारा भी संभव हो पाता है। इस प्रकार उद्यमी इस क्षेत्र में भी अपना योगदान प्रदान करते है।
(8) संसाधनों का इष्टतम उपयोगः उद्यमी देश में उपलब्ध भूमि, श्रम पूँजी सहित उपलब्ध विभिन्न संसाधनों का इष्टतम उपयोग करने में सहायता करते हैं।
इससे देश में उत्पादन तथा उत्पादकता में वृद्धि होती है। इसका दूसरा प्रभाव देश में विकास की दर भी सकारात्मक रूप से देखने को मिलता है।
(9) आर्थिक स्वतंत्रता: उद्यमी देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक आवश्यक कड़ी है। इसका अर्थ यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर आत्मनिर्भरता के लिए अधिक से अधिक संख्या में उद्यमियों की आवश्यकता होती है। उद्यमी विदेशी देशों पर निर्भरता को कम करते हैं। वे आयातित वस्तुओं के लिए स्वदेशी विकल्प का निर्माण करने में मदद करते हैं। वे देश में वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात में वृद्धि करने में योगदान देते हैं जिससे विदेशी मुद्रा कमाने की मदद मिलती है। इस प्रकार आयात प्रतिस्थापन तथा निर्यात प्रोत्साहन का कार्य करके उद्यमी देश की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
(10) युवाओं की उत्पादक कार्यों में संलिप्तता: समाज में युवा वर्ग से संबंधित अंशांति तथा सामाजिक तनाव मुख्यत: इस कारण से उत्पन्न होते हैं कि युवाओं की ऊर्जा का प्रयोग उत्पादन तथा सकारात्मक कार्यों के लिए नहीं किया जा रहा है। प्रत्येक देश की ऐसे युवाओं को स्वरोजगार में लाने का प्रयास करना चाहिए जिनमें उद्यमिता के गुण विद्यमान हों । सरकार ये कार्य विभिन्न उद्यमिता विकास कार्यक्रम आयोजित करके करती है तथा विभिन्न प्रकार के प्रोत्साहन देकर युवाओं को प्रेरित करती रहती है। इस प्रकार से समाज में अनावश्यक तनाव तथा अंशांति को दूर किया जाता है।
(11) सामाजिक स्थिरता: उद्यमी समाजिक स्थिरता लाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक अर्थव्यवस्था में उद्यमी को एक मूल्यवान मानवीय संसाधन माना जाता है। इस पर समाज में स्थिरता लाने की जिम्मेदारी भी होती है।
वह यह कार्य विभिन्न तरीकों से करता है, जैसे उद्योगों में कार्य शक्ति का अवशोषण करके, समाज में जागरूकता पैदा करके, लोगों का आत्मविश्वास बढ़ाकर, नारी उद्यमीकरण को बढ़ावा देकर आदि। इस प्रकार वह सामाजिक कार्यों तथा नैतिक जिम्मेदारी का वहन करते हुए समाज को फायदा पहुँचाता है।
(12) स्थानीय मांग: उद्यमी का एक मुख्य कार्य समाज में उत्पादों की मांग पैदा करना भी होता है । आजकल नए उद्यमी इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि स्थानीय स्तर पर किन उत्पादों की मांग है तथा किस प्रकार से स्थानीय संसाधनों का प्रयोग करते हुए उत्पाद को तैयार किया जा सकता है। वह उत्पादन के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कौशल, स्वेदेशी प्रौद्योगिकी, स्थानीय अनुभव आदि का पूरा लाभ उठाने की कोशिश करते हैं।
देश में सरकार बड़े पैमाने की इकाइयों के अलावा लघु स्तर की इकाइयों को प्रोत्साहित करने पर अधिक ध्यान दे रही है। इस प्रकार सरकार उद्यमियों की मदद से स्थानीय मांग को भी प्रोत्साहित करती है।
(13) समृद्ध जीवन शैली: पिछले कुछ वर्षों के दौरान, व्यवसाय के कुछ नए क्षेत्र उभर कर सामने आए हैं तथा विभिन्न उद्यमी उन क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। वे इन क्षेत्रों में कार्य करते हुए अर्थव्यवस्था के विकास को भी बढ़ावा दे रहे हैं। कुछ इस प्रकार के नए क्षेत्र हैं: मिडिया, मनोरंजन, पर्यटन, खानपान, कोरियर, परिवहन, संचार, तकनीकी क्षेत्र, स्वास्थ्य का क्षेत्र इत्यादि ये सभी क्षेत्र उत्पाद या सेवाओं की श्रेणी से हैं तथा इनके द्वारा समाज में लोगों की जीवन शैली में भी परिवर्तन आ रहा है। उद्यमी इन क्षेत्रों में अपनी अभूतपूर्व सेवाएं देकर लोगों की जीवन शैली को समृद्ध बनाने का कार्य कर रहे हैं।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि उद्यमी नए प्रतिष्ठानों की स्थापना करके अथव्यवस्था का विकास करते हैं तथा स्थापित व्यवसायों के विकास द्वारा अर्थव्यवस्था में विकास का वातावरण बनाए रखते हैं। अतः अर्थव्यवस्था के विकास में केंद्रिय बिंदु के रूप में उद्यमियों की भूमिका को देखा जाता है।
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