शेयर प्रमाण-पत्र , निर्गमन , कानूनी प्रभाव - share certificate, issue, legal effect
शेयर प्रमाण-पत्र , निर्गमन , कानूनी प्रभाव - share certificate, issue, legal effect
कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 2015 द्वारा यथा संशोधित धारा 46 (1) के अनुसार, एक शेयर प्रमाण-पत्र सार्वमुद्रा, यदि कोई हो, के अधीन या दो संचालकों या एक संचालक एवं कंपनी सचिव, जहाँ कंपनी ने कंपनी सचिव की नियुक्ति कर रखी हो, द्वारा हस्ताक्षरित किसी व्यक्ति द्वारा लिए गये शेयरों को विनिर्दिष्ट करने वाला, ऐसे शेयरों पर व्यक्ति के स्वामित्व का प्रथम दृष्टया साक्ष्य होगा।"
शेयर प्रमाण-पत्र स्वत्व प्रलेख नहीं होता क्योंकि इसके अधीन प्राप्त अधिकार केवल प्रमाण-पत्र पृष्ठांकन तथा या सुपुर्दगी द्वारा अंतरणीय नहीं है।
निर्गमन
अधिनियम की धारा 179 (3) के अनुसार शेयर प्रमाण-पत्रों के निर्गमन का अधिकार केवल संचालकों को ही प्राप्त है। वे अपनी सभा में एक संकल्प पारित करके प्रमाण-पत्र जारी कर सकते हैं। अधिनियम की धारा 56 (4) के अनुसार प्रत्येक कंपनी को शेयरों के आबंटन के दो महीने के अंदर तथा शेयरों के अंतरण के पंजीयन के लिए आवेदन पत्र प्राप्त करने के एक महीने के अंदर शेयर प्रमाण-पत्र तैयार कर लेने चाहिए तथा आबंटितियों को भेज देना चाहिए।
कानूनी प्रभाव
शेयर प्रमाण-पत्र को जारी करने के मुख्यतः निम्नलिखित दो कानूनी प्रभाव होते हैं:
i. शेयरों के स्वामित्व संबंधी विबंधन कंपनी किसी को शेयर प्रमाण-पत्र जारी करने के बाद उसके शेयरों के स्वामित्व को अस्वीकार नहीं कर सकती बशर्तें की उसे सद्भावना के साथ, मूल्य देकर तथा प्रामाणिक अन्तरण-पत्र के अंतर्गत शेयर प्राप्त किए हों।
ii. भुगतान संबंधी विबन्धन यदि शेयर प्रमाण-पत्र में यह उल्लेख है कि शेयरों के मूल्य का पूर्ण भुगतान हो चुका है, जबकि वास्तव में ऐसी नहीं है, तो बाद में किसी ऐसे व्यक्ति के विरूद्ध जिसने सद्भावना के साथ यह विश्वास करके कि शेयर पूर्णदत्त हैं, शेयरों को खरीदा है, कंपनी शेयरों पर अदत्त राशि को प्राप्त करने का अधिकार नहीं रखती हैं।
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