समस्याओं से निपटने के लिए सुझाव - Tips for dealing with problems
समस्याओं से निपटने के लिए सुझाव - Tips for dealing with problems
एक नये व्यवसाय की असफलता से निपटने या उससे बचने के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए:
1.गहन अध्ययन एक उद्यमी को अपने वर्तमान व्यवसाय या स्थापित किए जाने वाले व्यवसाय के बारे में गहन अध्ययन करना चाहिए। उसे व्यवसाय के लिए बजट तैयार करने, परियोजना रिपोर्ट तैयार करने, वस्तु उत्पादन की लागत का अनुमान लगाने, बाजार संबंधी सूचना इकट्ठी करने, प्रतिद्वंद्वी इकाइयों की रणनीति संबंधी सूचना इकट्ठी करने आदि जैसे घटकों पर गहनता से तथा पेशेवर सोच के साथ अध्ययन करना चाहिए। ये सभी घटक उसके व्यवसाय के महत्वपूर्ण निर्णयों पर प्रभाव डालते हैं तथा व्यवसाय इन्हीं निर्णयों के आधार पर सफल या असफल होते हैं। अतः एक व्यवसायी को पूर्ण रूप से सजग होकर व्यावसायिक घटकों का अध्ययन करते रहना चाहिए।
2. रूढ़िवादी विचारधारा - एक व्यवसायी को उदारवादी तथा रूढवादी विचारों में संतुलन स्थापित करते हुए व्यवसाय का संचालन करना चाहिए। वित्त से जुड़े मामलों में उसे रूढ़िवादी दृष्टिकोण अपाना चाहिए; जैसे - आय के अनुमान के संबंध में उसे रूढ़िवादी तथा आवश्यक खर्ची के बारे में उदारवादी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उसे व्यवसाय करते समय सुरक्षा की व्यवस्था प्रत्येक क्षेत्र में करते हुए व्यावसायिक गतिविधियाँ चलानी चाहिए।
3. सेवाओं का प्रयोग - एक व्यवसायी (पुराने व नये) को सुझावों का हमेशा स्वागत करना चाहिए। उसे बैंकों, वित्तीय संस्थाओं, प्रबंधकीय कर्मचारियों, कर सलाहकारों आदि द्वारा दिए गए सुझावों तथा उनकी सेवाओं का पूरा प्रयोग करना चाहिए। व्यवसाय के लिए दिए गए अच्छे सुझावों तथा दी जाने वाली सेवाओं का उसे सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ समुचित उपयोग करना चाहिए।
4. प्रभावशाली लेखांकन प्रणाली- लेखांकन प्रणाली व्यवस्था व्यवसाय की संपत्ति भी समझा जाता है । लेखांकन प्रणाली में पारदर्शिता रखने के लिए सभी संभव प्रयास किए जाने चाहिए । पेशेवर लोगों तथा वर्तमान तकनीकों के द्वारा यह कार्य आसानी से किया जा सकता है। इससे व्यवसाय की छवि बाजार में अच्छी होती है तथा व्यवसाय की स्वीकार्यता भी बढ़ती है।
5. कर लेखांकन / शुद्धता - प्रत्येक व्यवसायी कर क्षेत्रको समस्याओं से जुड़ा हुआ मानता है। प्रत्येक व्यवसाय का विभिन्न प्रकार के करों का भुगतान करना होता है। इन करों की दरें ऊंची होती. हैं। एक आम सोच के कारण वह इस भार को कम करने का ही उपाय अपनाता है। इसके लिए कई बार करों संबंधी प्रावधानों को भी सही ढंग से पालन नहीं करता तथा कई चोरी जैसे तरीकों का प्रयोग भी करता है। परंतु इस दिशा में यह सुझाव दिया जाता है
कि व्यवसायी कर संबंधी प्रावधानों दूर को स्वयं भी ठीक से समझें तथा आवश्यकता पड़ने पर पेशेवर व्यक्तियों का भी मदद ले। करों के संबंध में उसे पूर्ण शुद्धता से खाते तैयार करने चाहिए तथा संबंधित कर विभागों को रिटर्न आदि जमा करवानी चाहिए। इस क्षेत्र में किसी तरह का भी समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
समाज में छोटे व्यवसायियों की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे देश के विकास में अत्यंत सहायक होते हैं। कुछ छोटे व्यवसायी साधारण विधि से तथा कुछ आधुनिक तकनीकी विधि से अपना व्यापार करते हैं। आजकल आर्थिक एवं औद्योगिक विकास के लिए छाटे तथा बड़े व्यवसाय दो पैरो के रूप में कार्यरत हैं। छोटे व्यवसाय हर अर्थव्यवस्था में विद्यमान होते है। वे बड़े व्यवसायों के सहायक तथा पूरक के रूप में कार्य करते हैं।
वे बड़े व्यवसाय और बाजार की मांग की कमी की पूर्ति को पूरा करते हैं। बहुत से छोटे व्यवसाय बड़े व्यवसायों के लिए प्रयोग किए जाने वाले सहायक उत्पादों, आदि का उत्पादन करते हैं। बड़े व्यवसायों की उपस्थिति के बिना छोटे व्यवसायों के अस्तित्व की कल्पना करना लगभग असंभव है। इसी प्रकार बड़े व्यवसायों की सफलता की कल्पना छोटे व्यवसयों के बिनाहो पाना भी आसान नहीं हो सकता है। अतः दोनों प्रकारके व्यावसायों को एक-दूसरे के साथ समन्वय स्थापित करते हुए व्यावसायिक गतिविधियाँ करनी चाहिए।
व्यावसायिक वातावरण से अभिप्राय व्यवसाय के आस-पास उन सभी परिस्थितियों से है जिसमें रहकर व्यवसाय किया जाता है तथा जिनका व्यवसाय की कार्यप्रणाली पर भी प्रभाव होता है। एक व्यवसाय तभी सफल हो सकता हो सकता है जब वह इस वातावरण में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार व्यवसाय में आवश्यक परिवर्तन करता रहता है। हम एक गतिशील वातावरण में रहते हैं, जिसमें निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं।
ये परिवर्तन आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा अन्य घटकों के कारण हो सकते हैं। इनका व्यवसाय पर भी प्रभाव पड़ता है। इन घटकों के आंतरिक एवं बाहरी वातावरण के प्रभावित करने वाले घटकों की श्रेणी में विभाजित किया जा सकता है। एक व्यवसाय का अस्तित्व इन सभी घटकों के साथ जुड़ा होता है आंतरिक घटकों से तात्पर्य उन घटकों से है जो व्यवसायी के नियंत्रण में होते हैं तथा बाहरी घटक वे होते हैं जिन पर व्यवसायी का अपना नियंत्रण नहीं होता है। व्यवसाय की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यवसायी इन परिवर्तनों को किस तरह से समझना तथा अपने व्यवसाय में लागू करता है। आंतरिक घटकों में वित्तीय संसाधन, मानवीय संसाधन, व्यवसाय का उद्देश्य, व्यवसाय की नीतियाँ कार्य संबंधी वातावरण, श्रम प्रबंध, उत्पाद की छवि, व्यवसाय की छवि आदि शामिल होते हैं। बाहरी वातावरण संबंधी घटकों को व्यष्टि एवं समष्टि वातावरण में विभाजित किया जा सकता है। व्यष्टि वातावरण में पूर्तिकर्ताओं, ग्राहकों, मध्यस्थों, प्रतिस्पर्धात्मक इकाइयों तथा जनता को शामिल किया जाता है।
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