कार्यशील पूँजी का पूर्वानुमान - Working Capital Forecast

कार्यशील पूँजी का पूर्वानुमान - Working Capital Forecast


उद्यम की कार्यशील पूँजी का अनुमान सही ढंग से लगाया जाना चाहिए। अपर्याप्त तथा अत्याधिक कार्यशील पूँजी दोनों ही उद्यम के लिए हानिकारक होती हैं। कार्यशील पूँजी का अत्यधिक अनुमान लग जाने से पूँजी बेकार सम्पत्तियों में फँस जाती है। इसके विपरीति, अपर्याप्त कार्यशील पूँजी होने पर लाभप्रद अवसरों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। कार्यशील पूँजी का पूर्वानुमान लगाने की अनेकों विधियाँ हैं। इसमें से मुख्य निम्न हैं:


(1) संचालन चक्र विधि:


(2) चालू संपत्तियों तथा चालू दायित्वों के पूर्वानुमान की विधि


(3) रोकड़ पूर्वानुमान विधि


(4) विक्रय का प्रतिशत विधि


(5) संभावित स्थित विवरण विधि


1. संचालन चक्र विधि विवरण: कार्यशील पूँजी की मात्रा संचालन चक्र की अवधि पर निर्भर करती है। मान लीजिए, उद्यम का संचालन चक्र तीन महीने है। इसका अर्थ यह है कि संचालन चक्र वर्ष में चार बार दोहराया जाता है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कार्यशील पूँजी की मात्रा गत वर्ष के कुल संचालन व्ययों का एक-चौथाई होगी।


इसके अतिरिक्त, यदि आने वाले वर्षों में कीमतों के बढ़ने की संभावना हो तो उपरोक्त अनुमानों में एक निश्चित प्रतिशत आकस्मिकताओं के लिए और जोड़ दिया जाता है। अतः इस विधि से कुल कार्यशील पूँजी का अनुमान मोटे तौर पर लगाया जा सकता है।


2. चालू संपत्तियों तथा चालू दायित्वों के पूर्वानुमान की विधि : इस विधि के अनुसार, साख नीति, स्टॉक नीति तथा भुगतान नीति से संबंधित पिछले अनुभव के आधार पर आगामी वर्ष की चालू सम्पत्तियों तथा चालू दायित्वों का अनुमान लगाया जाता है। अनुमानित चालू दायित्वों को चालू सम्पत्तियों से घटाकर कार्यशील पूँजी की आवश्यकताओं का अनुमान लगाया जाता है। इस अनुमानित राशि में आकस्मिकताओं के लिए एक निश्चित प्रतिशत भी जोड़ लिया जाता है।


3. रोकड़ पूर्वानुमान विधि: इस विधि के अंतर्गत आगामी अवधि के लिए नकद प्राप्तियों तथा भुगतानों का अनुमान लगाया जाता है। अनुमानित नकद प्राप्तियों को वर्ष के प्रारंभ में उपलब्ध कार्यशील पूँजी में जोड़ लिया जाता है तथा इस राशि में से अनुमानित नकद भुगतानों को घटा दिया जाता है। शेष बची राशि को कार्यशील पूँजी मान लिया जाता है।


4. विक्रम का प्रतिशत विधि: इस विधि के अनुसार, पिछले अनुभव के आधार पर कुछ महत्त्वपूर्ण अनुपातों का निर्धारण कर लिया जाता है: जैसे कि विक्रय का कच्चे माल के स्टॉक से अनुपात,

विक्रय का अर्द्ध-निर्मित माल के स्टॉक से अनुपात, विक्रय का निर्मित माल के स्टॉक से अनुपात, विक्रय का देनदारों से अनुपात, विक्रय का रोकड़ से अनुपात आदि। अगले वर्ष के विक्रय का अनुमान लगाने के पश्चात इन अनुपातों के आधार पर कार्यशील पूँजी की आवश्यकता का अनुमान लगाया जाता है।


5. संभावित स्थिति विवरण विधि: इस विधि में, संपत्तियों तथा दायित्वों का अनुमान लगाकर एक संभावित स्थिति विवरण बनाया जाता है। संभावित स्थिति विवरण में प्रदर्शित चालू संपत्तियों तथा चालू दायित्वों के अंतर को कार्यशील पूँजी मान लिया जाता है।