बीमा का कार्य - act of insurance

बीमा का कार्य - act of insurance


बीमा के कार्यों के दो भागो में विभक्त किया जा सकता है (1) प्राथमिक कार्य (2) द्वितीयक कार्य । - 1. प्राथमिक कार्य


1. निश्चितता प्रदान करना:- बीमा हानि की अनिश्चतता के हानि के पूर्ति की निश्चितता प्रदान करता है। व्यक्ति हानि के प्रति कुशल नियोजन करके निश्चिंत हो सकता है परन्तु इस कृत्य में बहुत से बाधायें उत्पन्न हो सकती है। बीमा हानि की कठिनाइयों को दूर करके हानि के प्रति निश्चितता प्रदान करता है। जोखिम हानि की अनिश्चिता है जिसमें हानि का कब होगी, कैसे होगी कितनी होगी इस सबका पता नही रहता यदि जोखिम हो गयी तो व्यक्ति को और उससे पूर्व वह व्यक्ति हानि के प्रति चिन्तित रहता हैं, लेकिन बीमा से इस प्रकार की चिंता समाप्त हो जाती है।

व्यक्ति निश्चिय हो जाता है इसके लिये व्यक्ति को बहुत थोडी प्रीमियम देनी होती है जो हानि का बहुत छोटा भाग होता है।


2. सुरक्षा प्रदान करना:- बीमा का मुख्य कार्य संभाव्य हानि से सुरक्षा प्रदान करना है क्योंकि मानव जीवन जोखिम पूर्ण है। विभिन्न जोखिमो के कारण या अनिश्चित रहता है कि भविष्य की आपदाओ से कब तथा कितना हानि भुगतनी पड़ेगी। इस प्रकार मनुष्य को असुरक्षा का अनुभव होता है वह सुरक्षा चाहता है। सुरक्षा तभी मिल सकती है जब जोखिमों के अनिश्तिता से मुक्ति मिले। बीमा इस अनिश्चितता से मुक्ति देकर सुरक्षा प्रदान करता है।


3. जोखिम (हानि) का वितरण :- बीमा का मुख्य कार्य जोखिमों से होने वाले हानि का विभाजन है।

आपदा या जोखिम को बाँटा नहीं जा सकता है परन्तु उन से होने वाली हानियों को उन व्यक्तियों में बाँटा जा सकता है जो हानियों से सुरक्षित होना चाहते हैं। प्राचीनकाल में हानियों का विभाजन जोखिमों के समय किया जाता था। परन्तु बीमा संविदा में उन हानियों का भुगतान बाद में किया जाता था। जिसके लिये सीमित व्यक्तियों से उनसे हानि का अंश प्रीमियम के रूप में पहले से लिया जाता था। प्रीमियम की गणना हानि की संभावना के अनुसार होगी।


2. द्वितीयक कार्य


सुरक्षा की व्यवस्था द्वारा बीमा व्यवसायिक कार्यकलाप में ऐसे अनेक सुविधायें अवसर एवं लाभ प्रदान करता है। जो इस प्रकार महत्वपूर्ण है ।


1. हानि के रोकना बीमा हानि को स्वयं नहीं रोकता है, बल्कि ऐसे व्यक्तियों एवं संस्थाओं को साथ देता है जो हानि को रोकने के लिये कार्य कर रहे है। यदि हानि में कमी हो जायेगी तो हानि रूक जायेगी। बीमाकर्ता कम भुगतान करेगा। इस प्रकार उसे हानि नही सहनी पड़ेगी। हानि की कमी से प्रीमियम दर में कमी की जा सकती है इस प्रकार बीमा के विकाश से सहायता मिल सकता है।


2. पूँजी की पूर्ति बीमा समाज को पूंजी की आपूर्ति करता है बीमा के पर्याप्त रकम प्रीमियम के रूप में आती है जिससे विनियोजित करके उत्पादन में वृद्धि की जाती है और समाज को पूँजी की कमी को किया जाता है।

भारत जैसे राष्ट्र में जहाँ पूँजीछे की अपर्याप्तता है बीमा के इस कार्य का विशेष महत्व है पूरा बीमा द्वारा पूजी का संचय दो प्रकार से किया जा सकता है- (1) बीमा के अभाव में प्रत्येक व्यक्ति, व्यवसायी या संस्था हानियों को पूरा करने के लिये कुछ संचय रखते है जिसका उपभोग नही करते। (2) बीमा पूंजी का संचय करता है।


3. वित्तीय स्थिरता प्रदान करना बीमा का महत्वपूर्ण योगदान यह है कि इसके कारण शुद्ध जोखिमों द्वारा अस्थिरता नही आने पाती। यदि बीमा की सुविधा उपलब्ध न हो तब अग्निकांड, दुर्घटना चोरी, दंगा, और इसी प्रकार अन्य उपद्रवो के कारण बड़े पैमाने पर चलने वाले कारबार या उद्योग का अपूरणीय हानि पहुँच सकती है। यदि बीमा है तो ऐसी हानि की पूर्ति की व्यवस्था हो जाती है, और व्यवसाय एवं उद्योग में तथा समाज में स्थिरता सुनिश्चितता की जा सकती है।