अंतरराष्ट्रीय विपणन में चुनौतियाँ एवं समस्याएँ - Challenges and Problems in International Marketing
अंतरराष्ट्रीय विपणन में चुनौतियाँ एवं समस्याएँ - Challenges and Problems in International Marketing
कि ‘अनेक बड़ी कम्पनियाँ विदेशी बाजार की बजाय घरेलू बाजार में ही विपणन कार्य ज्यादा पसन्द करती है अंतरराष्ट्रीय विपणन में अनेक प्रकार की समस्याएँ एवं चुनौतियाँ उत्पन्न होती है। कोटलर का मत है। यदि वह बाजार यथेष्ट रूप से विशाल है। ऐसी फर्मों के प्रबन्धकों को अन्य भाषाओं एवं कानूनों को सीखने, विभिन्न मुद्राओं में व्यवहार करने राजनैतिक तथा कानूनी अनिश्चितताओं का सामना करने तथा विभिन्न ग्राहक आवश्यकताओं के अनुरूप अपने उत्पाद को ढालने की आवश्यकता नहीं होती है। स्वदेशी विपणन ज्यादा सुरक्षित तथा आसान होता है।' अन्तराष्ट्रीय विपणन के बारे में अन्य तथ्य महत्वपूर्ण है जिनकी ओर कम्पनियो का ध्यान अकार्षित हो रहा है।
1. ग्लोबल फर्मों द्वारा प्रस्तुत बेहतर एवं कम कीमत वाला उत्पाद कम्पनी के घरेलू बाजार पर आक्रमण कर सकता है। कम्पनी अपने घरेलू बाजार में इन प्रतिस्पर्द्धियो का मुकाबला करने को सोच सकते है।
2. कम्पनी इस बात को खोज सकती है कि घरेलू बाजार की अपेक्षा कुछ विदेशी बाजारों में लाभ की
ज्यादा सम्भावना है या वे ज्यादा लाभ प्रस्तुत करते है।
3. बड़े पैमाने पर लाभो को प्राप्त करने के लिए कम्पनी को बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं की आवश्यकता होती है।
4. कम्पनी किसी भी एक बाजार पर अपनी निर्भरता को कम करने की सोच सकती है।
5. कम्पनी के उपभोक्ता विदेश में जा रहे है तथा उन्हें अंतरराष्ट्रीय सेवाओं की आवश्यकता है।
नेल्सन एवं नेल्सन ने अन्तराष्ट्रीय विपणन में असफलता के निम्नलिखित कारण बताये हैं। 1. बाजार के द्वारा उत्पादो को अपनाने में असफलता।
2. उचित अनुक्रम में बाजार विदोहन में असफलता।
3. सम्भावित लाभदायक बाजार में प्रवेश करने में असफलता 4. विदेशी बाजार में भाषाओं की भिन्नता को सही रूप मे समझने में असफलता।
5. विज्ञापन में भिन्नता के समझ के कारण असफलता।
6. कीमत एवं गुणवत्ता के संदर्भ में उपभोक्ताओ की प्रकृति जानने में असफलता।
7. प्रतिस्पद्ध अर्थव्यवस्था के सिद्धान्त को सही रूप में समझने को असफलता।
समस्या- अंतरराष्ट्रीय विपणन में अनेक समस्याएँ सम्मिलित है जो इस प्रकार है।
1. अंतरराष्ट्रीय विपणन में हुए एक ता विकास को विश्व के अधिकतर देश अपनाने हेतु तैयार नही है। 2. विकासशील देश तेजी से विकास की प्रक्रिया को अपना रहे हैं
तथा अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता एवं योग्यता सिद्ध करने हेतु तत्पर है। इन राष्ट्रो की 'स्व-स्फूर्त अर्थव्यवस्था' बनने की आकांक्षा अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं विपणन में बाधायें उपस्थित कर सकती है।
3. अनेक राष्ट्रो ने अपने आयात-निर्यात के नियमन एवं नियंत्रण हेतु निश्चित प्रक्रिया एवं नियम बनाये है जो स्वतन्त्र आयात-निर्यात में बाधाएँ उत्पन्न करते हैं।
इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय विपणन में भाषा, संस्कृति, विदेशी बाजार से पहचान का आभाव राजनैतिक एवं कानूनी बाधाएँ, विपणन शोध से सम्बद्ध सूचनाओं का आभाव अनुचित प्रतिस्पर्धा आदि प्रमुख समस्याएँ है।
अन्तराष्ट्रीय विपणन हेतु प्रबन्धक को विदेशी बाजारों से बेहतर रूप से परिचित होना चाहिए तथा उसकी सीमाओं एवं मान्यताओं का ज्ञान होना चाहिए। कोटलर ने अंतरराष्ट्रीय विपणन में निम्न प्रमुख चुनौतियां बतायी हैं
1. विशाल विदेशी ऋणग्रस्तता विश्व के अनेक विकासशील तथा छोटि देश विशाल विदेशी ऋण से ग्रस्त है जिनके कारण कुछ राष्ट्रो के लिए ब्याज का भुगतान करना भी कठिन हो रहा है। इन देशों में इण्डोनेशिया, मैक्सिको तथा रुस प्रभुत्व है।
2. अस्थायी सरकारें विश्व के अनेक देश उच्च ऋणग्रस्त उच्च मुद्रा स्फीति तथा व्यापक बेरोजगारी से ग्रस्त है
जिसका परिणाम अस्थायी सरकारे है। यह प्रवृत्ति विदेशी फर्मो को राष्ट्रीयकरण, सीमित लाभ तथा स्वत्वहरण जेसी जोखिमो में डालती हैं तथा अंतरराष्ट्रीय विपणन में व्यापक बाधायें उत्पन्न होती है।
3. विदेशी विनिमय समस्या उच्च ऋणग्रस्तता तथा आर्थिक एवं राजनैतिक अस्थिरता एक देश की मुद्रा के मूल्य में कमी लाती है। विदेशी फर्म लाभ स्वत्वहरण अधिकार के साध सख्त मुद्रा में भुगतान चाहती है लेकिन अनेक बाजारों में यह विकल्प उपलब्ध नही होता।
4. तटकर तथा अन्य व्यापार बाधायें प्राय: सरकारें अपने उद्योगों के संरक्षण हेतु उच्च तटकर लगाती है।
वे अदृश्य व्यापार बाधाओं का भी सहारा लेती है, जैसे महत्वपूर्ण अनुमतियों एवं निरीक्षणों में धीरे-धीरे कमी लाना तथा महगें उत्पाद समायोजन की मागें करना।
5. भ्रष्टाचार विश्व के सभी राष्ट्रो में सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार का प्रमुख स्थान ग्रहण कर चुका है। विशेषतः आर्थिक क्षेत्र में इसका व्यापक बोलबाला देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए विदेशी भ्रष्टाचार व्यवहार अधिनियम 1977 के तहत अमेरिकी प्रबन्धको पर रिश्वत लेने या देने पर प्रतिबन्ध है, लेकिन अन्य देशों के प्रतिस्पर्द्धियों पर इस प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं है।
6. टेक्नोलोजिकल चोरी एक कम्पनी जिसके संयंत्र विदेशों में स्थापित है,
सदैव इस बात से विदेशी प्रबन्धको से चिंतित रहती है कि उसके उत्पाद को किस प्रकार बनाया जाना है तथा प्रतिस्पर्धा का किस प्रकार मुकाबला किया जाना है। मशीनरी, दवा, इलेक्ट्रानिक्स तथा रसायन उद्योगों में व्यापक रूप से ऐसा देखा जा सकता है।
7. उच्च उत्पाद लागत एवं सम्प्रेषण अनुकूलन एक कम्पनी, जो विदेशी बाजारों में प्रवेश करने जा रही है के लिए प्रत्येक विदेशी बाजार का बारीकी से अध्ययन आवश्यक है
जो उसके आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक वातावरण से निकटतम रूप से संबंधित है तथा उसके उत्पाद के अपनाने से सम्बन्धित है। साथ ही प्रत्येक बाजार की रुचियों से परिचित होना भी आवश्यक है।
8. सीमा परिवर्तन विपणन में राष्ट्रीय सीमायें भी अहम् होती हैं, क्योंकि ये देश की सीमा के भीतर रहने वाले व्यक्तियों के आर्थिक व्यवहार को निरूपित करती है तथा क्रयण व्यवहार में अहम् भूमिका निभाती है। सीमाओं में परिवर्तन का आशय है कि विपणनकर्ताओं के लिए लक्ष्य गतिशील हो रहें है।
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