वित्तीय प्रणाली के घटक - components of the financial system
वित्तीय प्रणाली के घटक - components of the financial system
वित्तीय प्रणाली के चार मुख्य घटक होते हैं, जो निम्नलिखित हैं:
1. वित्तीय संस्थाएँ
2. वित्तीय बाजार
3. वित्तीय प्रपत्र
4. वित्तीय सेवाएँ
1. वित्तीय संस्थाएँ यह वित्तीय प्रणाली का प्रथम घटक है। ये संस्थाएँ उद्योगों को संस्थानीय वित्त प्रदान करती है। ये बचतकर्ता तथा निवेशकर्ता के बीच मध्यस्थ का काम करती है तथा व्यक्तिगत बचतों के संस्थानीकरण में सहयोग देती है।
वित्तीय संस्थाओं तथा मध्यस्थों का मुख्य कार्य निगमों द्वारा निर्गमित प्रत्यक्ष संपत्तियों या प्रपत्रों या प्रतिभूतियों को अप्रत्यक्ष प्रतिभूतियों में बदलना है। ये अप्रत्यक्ष प्रतिभूतियां प्रत्यक्ष अथवा प्राथमिक प्रतिभूतियों की अपेक्षा व्यक्तिगत निवेशकर्ताओं को अधिक अच्छे निवेश उपलब्ध कराती है। उदाहरण के लिए, संयुक्त कोषों की इकाइयाँ, UTI तथा बीमा पालिसी तथा बैंक जमा आदि।
वित्तीय संस्थाएँ वे व्यावसायिक संगठन हैं जो वित्तीय लेन-देन करती हैं। वे निवेशकर्ताओं तथा ऋणियों को मिलने की सुविधाएँ प्रदान करती हैं। वित्तीय संस्थाएँ निवेशकों तथा ऋणियों को विभिन्न सेवाएँ प्रदान करती हैं;
जैसे निवेश अवसर, गृह वित्त, जोखिम पूँजी, दलाली, पुनर्गठन, विव्धिकरण आदि । वे वित्तीय प्रपत्रों का क्रय तथा विक्रय करती है। दलाल तथा वित्तीय संस्थाएँ भिन्न हैं। दलाल एक एजेंट है जो प्रतिभूतियों के क्रेताओं तथा विक्रेताओं के बीच लेन-देन की सुविधा प्रदान करता है । परन्तु वह स्वयं धन उधार नहीं लेता जबकि वित्तीय संस्थाएँ स्वयं उधार लेती है तथा इसके बाद उच्च ब्याज दरों पर ऋण देती हैं।
वित्तीय संस्थाओं को विभिन्न रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है जिनमें से दो महत्वपूर्ण वर्गीकरण निम्नलिखित हैं
i. बैंकिंग संस्थाएँ और गैर-बैंकिंग संस्थाएँ बैंकिंग संस्थाएँ साख का सृजन करती हैं
जबकि गैर-बैंकिंग संस्थाएँ साख की प्रबंधक होती हैं। बैंकिंग संस्थाओं का विशिष्ट लक्षण इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि यह अन्य संस्थाओं के विपरीत अर्थव्यवस्था की भुगतान तंत्र प्रक्रिया में भाग लेती हैं यानी की वे लेन-देन की सेवाएँ प्रदान करती हैं तथा उनकी जमा देयताएं राष्ट्रीय मुद्रा आपूर्ति का मुख्य भाग होती है।
ii. मध्यस्थ और गैर-मध्यस्थ संस्थाएँ - बचतकर्ताओं और निवेशकों के बीच में मध्यस्थता करने वाली संस्थाएँ मध्यस्थ संस्थाएँ है। वे मुद्रा उधार देती हैं तथा बचतों को गतिशील करती हैं; उनकी देयताएं अंतिम तौर पर बचतकर्ताओं के प्रति होती है, जबकि उनकी परिसम्पत्तियाँ निवेशकों या कर्जदारों से आती हैं।
गैर-मध्यस्थ संस्थाएँ ऋण का व्यापार करती हैं, परन्तु उन्हें सीधे बचतकर्ताओं से संसाधन प्राप्त नहीं होते हैं। सभी बैंकिंग संस्थाएँ मध्यस्थ हैं। बहुत-सी गैर-बैंकिंग संस्थाएँ भी मध्यस्थ के रूप में कार्य करती हैं तथा ऐसा करने पर उन्हें गैर-बैंकिंग वित्तीय मध्यस्थ संस्थाएँ कहा जाता है।
2. वित्तीय बाजार वित्तीय बाजार वित्तीय प्रणाली के संगठन का महत्वपूर्ण घटक है। व्यावसायिक वित्त का संबंध व्यावसायिक इकाइयों में निवेश के लिए कोषों का प्रबंधन करने से है। निवेशकर्ताओं को अवश्य ही कोष उपलब्ध करवाने चाहिए और इसका अर्थ यह है
कि निवेशकर्ताओं को उपभोग कम करके बचत को बढ़ाना चाहिए जिससे कोषों में वृद्धि होगी कोषों के बचतकर्ता तथा T उपभोगकर्ता एक बाजार में एकत्रित होते हैं जिसे वित्तीय बाजार कहा जा सकता है। अतः वित्तीय बाजारों की गतिविधियों में मुद्रा और मौद्रिक संपत्तियों में व्यापार कर्ण सम्मिलित है तथा वित्तीय बाजारों की प्रक्रियाओं को वित्तीय प्रणाली कहा जा सकता है। वित्तीय बाजार बचत निवेश प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वित्तीय बाजार वित्त के स्रोत नहीं हैं।
ऐसे संस्थागत प्रबंधों के रूप में वित्तीय बाजारों को निर्दिष्ट किया जा सकता है जहाँ पर वित्तीय संपत्तियों तथा साख प्रपत्रों का लेन-देन किया जाता है।
अतः यह भी कहा जा सकता है कि वित्तीय बाजार ऐसे बाजार हैं जहाँ विभिन्न व्यक्तियों, फर्मों तथा संस्थाओं की साख की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है।
वित्तीय बाजारों को दो प्रमुख बाजारों में वर्गीकृत किया जाता है, जो निम्नलिखित हैं: i. प्राथमिक एवं द्वितीयक बाजार नए वित्तीय दावों या नई प्रतिभूतियों में लेन-देन का कार्य प्राथमिक बाजार द्वारा किया जाता है और इस कारण, वे नव निर्गमन बाजार' कहलाते हैं। द्वितीयक बाजार पहले से ही जारी या मौजूद या बकाया प्रतिभूतियों में लेन-देन करते हैं। प्राथमिक बाजार बचतों को गतिशीलता प्रदान करते हैं
तथा व्यापारिक इकाइयों को नई या अतिरिक्त पूँजी की आपूर्ति करते हैं। द्वितीयक बाजार अतिरिक्त पूँजी की आपूर्ति में सीधे योगदान नहीं करते हैं, बल्कि वे अप्रत्यक्ष रूप से प्राथमिक बाजार में जारी की गयी प्रतिभूतियों को तरल बनाकर पूँजी की आपूर्ति करते हैं।
ii. मुद्रा बाजार एवं पूँजी बाजार मुद्रा बाजार ऐसा बाजार है जहाँ पर अल्पकालिक मौद्रिक संपत्तियों अथवा मुद्रा के दावों में व्यवहार किया जाता है, जो कि प्रायः एक वर्ष से कम के होते हैं। इसमें अंतः बैंक कॉल पूँजी के व्यवहार शामिल हैं जिसे कॉल पूँजी बाजार कहा जाता है तथा इसमें सरकारी कोषागार बिल तथा निजी क्षेत्र के वाणिज्यिक बिल भी शामिल हैं, जिन्हें बिल बाजार के नाम से जाना जाता है।
यह वित्तीय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण अंग है जो कि नकद की अस्थायी कमियों को पूरा करने के लिए अल्पकालीन कोष उपलब्ध कराने में सहायक होते हैं। ये आय प्राप्ति के उद्देश्य से अतिरिक्त कोषों के पुनः प्रयोग की सुविधा उपलब्ध कराते हैं। रिज़र्व बैंक तथा वाणिज्यिक बैंक मुद्रा बाजार के मुख्य सहभागी हैं। इसके अलावा LIC, GIC, UTI, IDBI, NABARD, म्यूच्यूअल फंड तथा अन्य वित्तीय संस्थाएँ भी मुद्रा बाजार में कार्य कर रही हैं।
वे संस्थागत प्रबंध जो दीर्घकाल कोषों के उधार एवं ऋण की सुविधा प्रदान करते हैं वे पूँजी बाजार कहलाते हैं।
वे सरकारी एवं अर्द्ध-सरकारी संस्थाओं द्वारा प्रारंभ किये गए सार्वजानिक ऋणों तथा नए पूँजी निर्गमनों द्वारा निजी बचतों को औद्योगिक तथा वाणिज्यिक निवेशों में परिवर्तित करते हैं।
पूँजी / प्रतिभूति बाजार अब SEBI (Securities Exchange Board of India) द्वारा नियंत्रित किये जाते हैं । संयुक्त कोष (Mutual Fund), LIC, GIC, FII, विकास एवं सार्वजानिक वित्त संस्थाएँ, निगम तथा व्यक्ति विशेष इस बाजार के मुख्य सहभागी हैं।
3. वित्तीय प्रपत्र – व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध, भावी तिथि हेतु धनराशि के भुगतान और / या ब्याज या लाभांश के रूप में सावधिक भुगतान के लिए वित्तीय प्रपत्र एक दावा या अधिकार है।
यहाँ शब्द ‘और/या' का तात्पर्य है कि इनमें से कोई एक भुगतान पर्याप्त होगा परन्तु दोनों के लिए वचन दिया जा सकता है।
प्राथमिक प्रतिभूतियाँ एवं द्वितीयक प्रतिभूतियाँ - वित्तीय प्रतिभूतियाँ प्राथमिक या द्वितीयक प्रतिभूतियाँ हो सकती हैं। प्राथमिक प्रतिभूतियों को प्रत्यक्ष प्रतिभूतियाँ भी कहा जाता है क्योंकि वे कोष के अंतिम तौर पर खरीददारों द्वारा मूलभूत उपभोक्ताओं को प्रत्यक्ष रूप से (या सीधे) जारी की जाती है।
वित्तीय संस्था में विपणन, तरलता, प्रतिवत्यर्ता विकल्पों के प्रकार, प्रतिफल, जोखिम और लेन-देन की लागतों के संबंध में अंतर पाया जाता है।
4. वित्तीय सेवाएँ प्रमुख वित्तीय सेवाएँ, जैसे- वाणिज्यिक बैंकिंग पट्टे पर देना या लेना, किराये पर क्रय, साख रेटिंग इत्यादि वित्त मध्यस्थों द्वारा प्रदान की जाती है। वित्तीय मध्यस्थों द्वारा प्रदान की जाने वाली वित्तीय सेवाएँ, निवेशकों के पास उपलब्ध जानकारी के अभाव और वित्तीय प्रपत्रों और बाजारों के ज्यादा से ज्यादा परिष्कृत होने के बीच पाए जाने वाले अन्तराल को पूरा करती है।
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