वैयक्तिक विक्रय के दोष या सीमाएं - Defects or Limitations of Personal Selling
वैयक्तिक विक्रय के दोष या सीमाएं - Defects or Limitations of Personal Selling
वैयक्तिक विक्रय के दोष वास्तव में दोष नही है। ये तो सापेक्षिक है। इसका अर्थ यह है कि कुछ दशाओ में दोष हो सकते है जबकि अन्य दशाओं में नही। इन्दी दोषो को वैयक्तिक विक्रय की सीमाएं भी कहते हैं।
1. लागतें – वैयक्तिक विक्रय का सबसे बड़ा दोष लागत का है। वैयक्तिक विक्रय में विक्रयकर्ता को पारिश्रमिक यात्रा, व्यय, भत्ते व अन्य सुविधाएं देनी होती है जिसका कुल योग काफी होता है जो वस्तु की विक्रय लागत को बढ़ा देता है, लेकिन यदि व्यक्तिगत सम्पर्क टेलीफोन व पत्रव्यवहार से किया जाता है तो लागत बहुत कम पड़ती है।
वैयक्तिक विक्रय की अधिक लागत निर्माता के लिए लाभप्रद ही रहती है। इसका कारण यह है कि इसमें क्रेता से व्यक्तिगत सम्पर्क होता है जो धीरे-धीरे सामाजिक प्रेरणा में परिवर्तित हो जाता है जिससे आदेश अपने आप या थोड़े प्रयास से मिलते रहते हैं। साथ ही उसकी आपत्तियाँ, व बाजारु स्थिति तथा स्थान की प्रतियोगिता का भी पता लगता रहता है।
2. सही समय में उपस्थित होने में कठिनाई वैयक्तिक विक्रय की दूसरी कठिनाई यह है कि इसमें विक्रयकर्ता ग्राहक के पास उस समय नहीं पहुँच पाता जबकि ग्राहक क्रय सम्बन्धी निर्णय लेने की स्थिति में हो। साथ ही क्रय आदेश लेने के लिए विक्रयकर्ता को कई बार सम्भावित ग्राहक से मुलाकात करनी पड़ती है।
वास्तव में इस दोष में कुछ सत्यता दिखाई देती है, लेकिन इसके लिए यह सुझाव दिया जाता है कि निर्माता को विभिन्न साधनों से विज्ञापन इस प्रकार करना चाहिए कि उसका विज्ञापन सदा ही उसके सामने रहे और आदेश देते समय उसकी याद बनी रहें।
3. अच्छे विक्रयकर्ता का अभाव- वैयक्तिक विक्रय का एक दोष यह भी है कि अच्छे विक्रेताओं का प्रत्येक देश में अभाव है, इस बात में सत्यता दिखायी नही देती है। वास्तव में अच्छे विक्रेता जन्मजात पैदा नही होते बल्कि उचित प्रशिक्षण देकर उन्हें तैयार किया जाता है।
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