वितरण प्रणालियाँ - Distribution System

वितरण प्रणालियाँ - Distribution System


 वस्तुओं को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने में तीन तरीके काम में लाये जाते हैं -


1. प्रत्यक्ष वितरण माध्यम – वितरण की यह वह प्रणाली है जिसमें निर्माता अपनी वस्तुओं को अपनी


ही दुकानों या डिपों या शाखाओं या प्रतिनिधियों आदि के माध्यम से सीधा उपभोक्ता तक पहुँचाता है। इस प्रणाली के माध्यम से वस्तुएँ पहुँचाने के पाँच साधन है. (i) स्वयं की दुकानें - इसमें निर्माता अपने स्वयं की फुटकर दुकानें भिन्न-भिन्न स्थानों पर खोलता है।


जहाँ उसकी वस्तुओं की बिक्री की जाती है। जैसे बाटा इण्डिया लिमिटेड, रेमण्ड्स, मफतलाल ग्रुप आदि अपने उत्पाद इन्ही कम्पनियों के फुटकर दुकानों द्वारा बेची जाती हैं। 


(ii) स्वयं के विक्रयकर्ता इस प्रणाली के अन्तर्गत वस्तु के निर्माता द्वारा विक्रयकर्ताओं की नियुक्ति की जाती है। ये विक्रयकर्ता समय-समय पर संभावित ग्राहकों से सम्पर्क स्थापित करके उनको ग्राहक बना लेते है। यदि वस्तु छोटी है या उपभोग योग्य है तो विक्रयकर्ता उसको गाड़ी में उचित प्रकार से रखकर संभावित ग्राहकों को बेचता है तथा तुरन्त भुगतान ले लेता है। इस प्रणाली को घर-घर में विक्रय भी कहते है। चाय एवं साबुन, घी, डालडा आदि बनाने वाली कम्पनियाँ इस प्रणाली के उदाहरण हैं।


(iii) डाक द्वारा आदेश – एक निर्माता अपनी वस्तुओं को डाक के द्वारा भी बेच सकता है। इसमें डाक से ही आदेश आते है तथा उन आदेशों की पूर्ति भी डाक के माध्यम से ही होती है।

वस्तु के मूल्य का भुगतान भी डाक द्वारा मिलता है। इस प्रकार की संस्थाओं को डाक आदेश गृह कहते है। इस पद्धति में विज्ञापन का काफी महत्व है। विक्रेता सूचना पत्रों, समाचार-पत्रों, विज्ञापन आदि के माध्यम से ग्राहक के उत्पाद के बारे में परिचय करवाता है। ग्राहक उस वस्तु के लिये डाक द्वारा आदेश देता है। विक्रेता को जब आदेश प्राप्त हो जाता है तो वह उत्पाद को अच्छी तरह से पैक करके डाक के माध्यम से ग्राहक के पास भेज देता है। ग्राहक वस्तु के मिलने के पश्चात उसका भुगतान डाकखाने के माध्यम से विक्रेता को कर देता है।


(iv) टेलीफोन द्वारा इस पद्धति के अन्तर्गत क्रेता माल प्राप्त करने के लिये विक्रेता को टेलीफोन पर आदेश देता है। विक्रेता उस माल की पूर्ति क्रेता के घर पर कर देता है।



(v) विक्रय मशीन द्वारा स्वचालित मशीनों के द्वारा भी बिक्री की जाती है। यह मशीनें जगह-जगह लगी रहती है जिनमें माल भरा होता है। इन मशीनों में आवश्यक सिक्के डालकर उस वस्तु को प्राप्त किया जा सकता हैं।


II. अप्रत्यक्ष वितरण माध्यम अप्रत्यक्ष वितरण प्रणाली से तात्पर्य वस्तुओं एवं सेवाओं को मध्यस्थों मके माध्यम से उपभोक्ता तक पहुँचाना हैं। जो संस्थाएँ इस अप्रत्यक्ष वितरण प्रणाली में मध्यस्थ के रूप में कार्य करती है उन्हें अप्रत्यक्ष विक्रय एजेन्सियाँ कहते हैं। यह एजेन्सियाँ तीन प्रकार की होती हैं : 1. प्रतिनिधि 2. थोक विक्रेता, 3. फुटकर विक्रेता। इन तीनों एजेन्सियों के माध्यम से वस्तु उपभोक्ता तक निम्न प्रकार पहुँचती है:


निर्माता


प्रतिनि


थोक


फुटकर


उपभो


अप्रत्यक्ष वितरण में यह अनिवार्य नही है कि सभी मध्यस्थों की सेवाएं ली जाय। 4. दोहरा वितरण-माध्यम जब एक निर्माता दोनों प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष वितरण प्रणालियों को अपनाता है। तो ऐसी प्रणाली दोहरी वितरण प्रणाली कहलाती है। वर्तमान समय में विपणन क्रियाओं के विस्तार के लिये यह प्रणाली बहुत ही उपयोगी है। इस प्रणाली को अपनाने का मुख्य उद्देश्य वितरण को व्यापक बनाना है। लेकिन इस प्रणाली को अपनाने में सबसे बड़ी समस्या बाजारों के विभाजन की हैं। यह तय करना कठिन हो जाता है कि किस स्थान पर प्रत्यक्ष प्रणाली अपनायी जाय तथा किय स्थान पर अप्रत्यक्ष प्रणाली।