प्रभावी बिक्री कर्मचारी - effective sales staff
प्रभावी बिक्री कर्मचारी - effective sales staff
एक अच्छा विक्रेता कमजोर संस्था के लिए माल बेच सकता है किन्तु एक अच्छी संस्था के लिए कमजोर विक्रेता को माल बेचते नही सुना है। इससे स्पष्ट होता है कि अपने व्यक्तित्व के प्रभाव से विक्रेता हल्की किस्म की वस्तुओं को बेचने में सफल हो जाता है।
एक समय था जब विक्रेता को लुटेरा, धोखेबाज, झूठ बोलने वाला समझा जाता था। विक्रेता की सफलता का ध्येय भी क्रेता का अधिक से अधिक शोषण करना था। लेकिन विक्रेता ने समय के साथ अपने सामाजिक दायित्वों को समझा तथा व्यवसाय में सफलता प्राप्त करने के लिए अच्छे व्यक्तिगत गुणों का सहारा लिया जिससे उसे आज अनेक सम्मानजनक शब्दों से जाना जाता है; जैसे क्षेत्र प्रतिनिधि, व्यापारिक परामर्शदाता, बाजार विशेषज्ञ,
सेवा प्रतिनिधि आदि। अतः विक्रेता वह व्यक्ति होता है जो उस कला का सृजन करता है जिसकी जड़े प्राकृतिक प्रवृत्ति और विक्रय कला की अद्भुत शक्ति में पायी जाती है। क्या सफल विक्रयकर्ता पैदा होते हैं, बनाये नही जाते इस संबंध में दोनों प्रकार के मत विद्यमान हैं।
1. विक्रयकर्त्ता पैदा होते हैं जिनका मत है कि विक्रयकर्त्ता पैदा होते हैं उनकी यह मान्यता होती है कि विक्रय कार्य के लिए कुछ जन्मजात गुणों की आवश्यकता होती है। उनके अनुसार सफल विक्रयकर्त्ताओं के लिए आकर्षक व्यक्तित्व, आक्रामक प्रवृत्ति, मित्रवत् व्यवहार, वाकपटुता,
धैर्य एवं सहिष्णुता, प्रखर बुद्धि तीव्र स्मरण शक्ति, आत्मविश्वास आदि गुणों का होना जरुरी है जो किसी व्यक्ति में जन्म से ही होता है इसके अतिरिक्त कुछ लोगों में जन्म से ही विक्रय कार्य में रुचि होती है। जन्म से मिले गुण विक्रेता के सफलता का कारण बनते है तथा बिना प्रशिक्षण के ही ये व्यक्ति एक संगीतकार, कलाकार की भाँति विक्रय कार्य में दक्ष होते है। अतः विक्रेताओं को शिक्षा-प्रशिक्षण के द्वारा बनाया नही जाता है वे जन्म जात प्रतिभा सम्पन्न होते है।
2. विक्रयकर्त्ता बनाये जा सकते हैं दूसरी विचारधारा यह है कि व्यक्तियों को उचित शिक्षा, प्रशिक्षण व ज्ञान प्रदान कर अच्छा विक्रयकर्त्ता बनाया जा सकता है। एक सामान्य व्यक्ति को जिसमें जन्म से कोई योग्यता नही होती तथा विक्रयकला के कोई गुण नही होते उनकों निरन्तर प्रशिक्षण,
अभ्यास और सही वातावरण देकर सफल विक्रयकर्त्ता बनाया जा सकता है। कई व्यक्तियों की सीखने की लगन, रुचि, परिश्रम, अभ्यास की क्षमता इतनी अधिक होती है कि वे कठिन बात को भी सरलतापूर्वक समझ लेते हैं। इस विचारधारा के समर्थको का मत है कि व्यक्ति एक कच्चे मिट्टी के समान है जिसे कोई भी शक्ल दी जा सकती है। व्यक्ति में सीखने की क्षमता अनन्त होती है। वह अपने भीतर प्रयास करके किसी भी क्षमता को विकसित कर सकता है। यही बात पूर्णतः विक्रेताओं पर भी लागू होती है। उचित वातावरण प्रदान करके व्यक्ति में परिवर्तन एवं सुधा की क्षमता विकसित की जा सकती है।
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