वैयक्तिक विक्रय की विशेषताएँ - Features of Personal Selling

वैयक्तिक विक्रय की विशेषताएँ - Features of Personal Selling


वैयक्तिक विक्रय के प्रमुख लक्षण एवं विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।


1. वैयक्तिक सम्बन्ध - वैयक्तिक विक्रय क्रेता एवं विक्रेता के मध्य एक प्रत्यक्ष, सजीव एवं सामने सामने रहकर किया जाने वाला अन्तर्व्यवहार है। इसमें विक्रयकर्ता व्यक्तिगत रूप से विशिष्ट ग्राहक की क्रय आवश्यकताओं का अध्ययन करके उन्हें सन्तुष्ट करने का प्रयास करता है। यह व्यक्तिगत सेवा के सिद्धान्त पर आधारित है। इसमें प्रत्येक सम्भावित ग्राहक के विशिष्ट क्रय लक्ष्यों, आकांक्षाओं, हितों, माँगों व इच्छाओं को ध्यान में रखकर व्यवहार किया जाता है। निजी अनुरोध एवं वैयक्तिक भेंट इसका सार तत्त्व है। बर्नार्ड लेस्टर के अनुसार, यह एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क तक सम्पर्क है। इसमें समस्त विक्रय व्यवहार वैयक्तिक आधार पर सम्पादित होता है।


2. दीर्घकालीन सम्बन्ध वैयक्तिक विक्रय निजी सम्बन्धों पर आधारित होने के कारण दीर्घजीवी होता है। विक्रेता एवं ग्राहक के मध्य धीरे-धीरे मैत्रीपूर्ण, सामाजिक एवं अन्तवैयक्तिक सम्बन्ध विकसित हो जाते हैं। वैयक्तिक विक्रय के द्वारा विक्रेता एवं ग्राहक के विक्रय सम्बन्ध 'शीघ्र ही गहन मैत्री में परिवर्तित होने लगते हैं। फलतः विक्रेता अपने नियमित ग्राहकों के हितों एवं इच्छाओं पर ध्यान देने लगता है। एडमंड स्पेन्सर के अनुसार, 'चैयक्तिक विक्रय सामाजिक प्रवर्धन एवं विकास का साधन है। यह विक्रय के वास्तविक दर्शको परिलक्षित करता है। साइमन मजारो के अनुसार 'विक्रय का आशय ग्राहक के साथ जुड़ जाना है और वैयक्तिक विक्रय में सदा अपने ग्राहकों के साथ दीर्घकालीन सम्बन्ध बनाने पर जोर दिया जाता है।


3. द्वि-मार्गीय सम्प्रेषण वैयक्तिक विक्रय एक द्वि-मार्गीय सम्प्रेषण अन्तर्व्यवहार है। यह विक्रेता एवं क्रेता के मध्य उनकी भावनाओं, प्रतिक्रियाओं, इच्छाओं, सूचनाओं व विभिन्न तथ्यों का पारस्परिक विनियम है। विक्रेता ग्राहक की आवश्यकताओं, अभिवृत्तियों, आदतों, दृष्टिकोण, इच्छाओं को ध्यान में रखकर विक्रय व्यवहार करता है। वह ग्राहक की सन्तुष्टि के लिए विभिन्न प्रकार की वस्तुओं व उनके सम्बन्ध में अपने विचारों की अभिव्यक्ति करता है। किन्तु ग्राहक भी वस्तु एवं उसके विभिन्न पहलुओं के सम्बन्ध में अपनी आपत्तियाँ, शंकायें, सन्देह, प्रश्न आदि अभिव्यक्त कर सकता है जिनका समाधान विक्रेता द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।


4. सृजनात्मक कला वैयक्तिक विक्रय विक्रय लक्ष्यों की पूर्ति के लिए नये ग्राहकों, नयी माँग,

नये बाजारों व नये विक्रय-व्यवहारों के सृजन की कला है। विक्रेता नई-नई आवश्यकताओं व माँग को विकसित करता है। वह अपने विक्रय कौशल के द्वारा विक्रय क्षेत्र में नयी सम्भावनाओं का पता लगाता है तथा नई-नई वस्तुओं के उत्पादन के लिए तकनीकी विशेषज्ञों को परामर्श देता है। वैयक्तिक विक्रय के द्वारा माँग में वृद्धि करके रोजगार, आय, बचत आदि का सृजन किया जा सकता है।


5. प्रोत्साहनकारी नेतृत्व - वैयक्तिक विक्रय मूल रूप से एक नेतृत्व कार्य है। इसमें विक्रेता अपने विचारों, दृष्टिकोण व मत से ग्राहक के व्यवहार को प्रभावित करके क्रय निर्णय की ओर निर्देशित करता है। व्यक्तियों के व्यवहार को निर्देशित एवं प्रभावित करना ही नेतृत्व है।

" वैयक्तिक विक्रय ग्राहकों को क्रय निर्णय में सहायता एवं प्रोत्साहन प्रदान करना है। इसमें विक्रेता ग्राहक पर क्रय के लिए कोई दबाव नहीं डालता, वरन् उसे स्वतन्त्रतापूर्वक एवं प्रसन्नतापूर्वक क्रय निर्णय लेने के लिए उत्प्रेरित करता है। इसके लिए वह ग्राहक के मन में वस्तु खरीदने की इच्छा जाग्रत करता है तथा वस्तु की उपयोगिता को प्रकट करके क्रय के प्रति रुचि पैदा करता है।


6. वस्तु के बारे में ज्ञान – वैयक्तिक विक्रय केवल वस्तु बेचने का लक्ष्य ही नहीं रखता है, वरन्


इसमें ग्राहक को वस्तुओं के विभिन्न पहलुओं, इसकी उपयोग विधि आदि की भी जानकारी प्रदान की जाती है। औद्योगिक क्षेत्र में विक्रेता एक तकनीकी विशेषज्ञ होता है। वह ग्राहकों को वस्तु के तकनीकी पहलुओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है।


7. विचार, दृष्टिकोण अथवा उपयोगिता का विक्रय, वस्तु का नहीं – गहनता से देखा जाये तो वैयक्तिक विक्रय में वस्तुओं का नहीं, उपयोगिता का विक्रय किया जाता है। विक्रेता वस्तु की उपयोगिता के बारे में अपने दृष्टिकोण एवं विचारों से ग्राहक के मस्तिष्क को प्रभावित करता है। ताकि वह विक्रेता द्वारा बेची जा रही वस्तु को खरीद सके। हेनरी फोर्ड के अनुसार, 'चैयक्तिक विक्रय एक मानवीय मस्तिष्क से दूसरे मानवीय मस्तिष्क को प्रभावित करने में अन्तर्निहित है। " वैयक्तिक विक्रय में विक्रेता वार्तालाप के दौरान पहले भावी ग्राहक के दृष्टिकोण से सोचना प्रारम्भ करता है, धीरे-धीरे ग्राहक के मन में अपने विचारों का हस्तान्तरण कर देता है।


8. सम्भावी ग्राहक – वैयक्तिक विक्रय में स्थायी एवं नियमित ग्राहकों के अतिरिक्त नये सम्भाव्य ग्राहकों की खोज भी सम्मिलित है।

विक्रेता अपने व्यवसाय में सदैव नये ग्राहकों को जोड़ता है। इसके लिए वह नये नये ग्राहकों की खोज करता है, उनके सम्बन्ध में विभिन्न सूचनायें एकत्रित करता है, उनकी ग्राहक-योग्यता' की जाँच करता है, उनकी सम्बन्ध में विभिन्न सूचनायें एकत्रित करता है, उनकी आवश्यकता का निर्धारण करता है तथा संस्था के उत्पादों के साथ सम्भावी ग्राहक की आवश्यकताओं को सम्बद्ध करता है।


9. सामाजिक चरित्र वैयक्तिक विक्रय विक्रेता एवं ग्राहक के मध्य होने वाले सामाजिक व्यवहार का प्रारूप है। यह दोनों वर्गों की क्रियाओं, व्यवहारों, भावनाओं, प्रेरणाओं का अन्तर्योग है। फलस्वरूप, वैयक्तिक विक्रय सामाजिक प्रकृति की क्रिया एवं व्यवहार है।


10. विपणन कार्यक्रम का एक अंग विपणन एक व्यापक क्षेत्र एवं क्रिया है। विपणन कार्यक्रम के कई तत्व हैं, जैसे - कीमत निर्धारण, विज्ञापन, उत्पाद विकास एवं अनुसन्धान, विपणन वितरण श्रृंखलायें आदि। वैयक्तिक विक्रय भी विपणन का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जो विपणन कार्यक्रम के क्रियान्वयन में सहयोग प्रदान करता है।


11. सार्वभौमिकता व्यापक अर्थ में वैयक्तिक विक्रय एक सार्वभौमिक क्रिया है। इसका प्रयोग जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है। एक अर्थ में हम सभी विक्रेता हैं और जाने-अनजाने अपने व्यवहार में हम वैयक्तिक विक्रय का प्रयोग करते रहते हैं।

समाज में चाहे राजनेता हो या वकील, निर्माता हो या श्रमिक, अध्यापक हो या धर्म गुरु, डॉक्टर हो या प्रशासक, सभी अपने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दूसरों के विचारों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। वैयक्तिक विक्रय व्यापक अर्थ में एक स्वाभाविक मानवीय गुण है जो सर्वत्र पाया जाता है।। 12. अन्य विशेषताएँ – वैयक्तिक विक्रय के कुछ अन्य लक्षण इस प्रकार हैं :


यह एक व्यक्तिगत सेवा एवं सहायता की प्रक्रिया है।


यह ग्राहक को आकर्षित करने तथा उसकी इच्छा को प्रभावी माँग में परिवर्तित करने की कला है।


• यह ग्राहकों को उनकी क्रय समस्याओं का हल प्रदान करती है।


यह क्रेता एवं विक्रेता के परस्पर लाभ एवं सन्तोष पर निर्भर होती है।


वैयक्तिक विक्रय विज्ञापन से भिन्न है।


यह ग्राहक प्रधान 'विपणन दृष्टिकोण है।


• वैयक्तिक विक्रय का अधिकांश निष्पादन विक्रयकला के माध्यम से किया जाता है।