तरलता समायोजन सुविधा - Liquidity Adjustment Facility
तरलता समायोजन सुविधा - Liquidity Adjustment Facility
मुद्रा बाजार दरों को प्रभावी तरीके से नियन्त्रित करने के लिए तथा मौद्रिक नीति के प्रत्यक्ष उपकरणों से अप्रत्यक्ष उपकरणों की ओर बढ़ते हुए बैकिंग क्षेत्रक सुधारों पर नरसिंहम समिति द्वितीय (1998) ने सभी प्रकार की सामान्य एवं क्षेत्रक विशिष्ट पुनर्वित्तीयन सुविधाओं को वापस लेने तथा रेपो और रिवर्स रेपो परिचालनों के द्वारा संचालित होने वाली तरलता समायोजन सुविधा की ओर बढ़नेका सुझाव दिया था। तदनुसार 21 अप्रैल 1999 से प्रभावी अन्तरिम तरलता समायोजन सुविधा प्रारम्भकी गयी जिसके अनुसार रूपया निर्यात पुनर्वित्तीयन सुविधाको यथावत रखते हुए सामान्य पुनर्वित्तीयन सुविधा को संपार्श्विक सुधार देने की सुविधा द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया।
इस सुविधा के अन्तर्गत वाणिज्यिक बैंक अपने पाक्षिक औसत कुल बकाया निक्षेपों के 0.25 प्रतिशत तक बैंक दर पर दो सप्ताह तक की अवधि के लिए उधार ले सकतेहैं। अतिरिक्त संपार्श्विक तरलता सुविधा बैंकों को 1997-98 में औसत बकाया पाक्षिक सकल निक्षेपों का 0.25 प्रतिशत तक उधार लेने की अनुमान्यता प्रदान करती थी। यह सुविधा बैंक दर के ऊपर 2 प्रतिशत अधिक दर पर दो सप्ताह की अतिरिक्त अवधि के लिए थी। संपार्श्विक तरलता सुविधा के अन्तर्गत ब्याज दर बैंकदर +2 प्रतिशत था अतिरिक्त संपार्श्वि तरलता सुविधा के अन्तर्गत बैंक दर + 4 प्रतिशत थी। इसके साथ साथ प्राथमिक डीलरों को संपार्श्वि सरकार प्रतिभूतियों के प्रति बैंक दर पर 90 दिन की अवधि के लिए उधार लेने की सुविधा अनुमन्य थी।
जून 2000 में अन्तरिम तरलता समायोजन सुविधा को पूवर्णरूपेण तरलता समायोजन सुविधा से प्रतिस्थापित कर दिया गया।
तरलता समायोजन सुविधा प्रारम्भ हो जाने के साथ ही संपार्श्विक तरलता सुविधा तथा अतिरिक्त संपार्श्विक तरलता सुविधा को वापस ले लिया गया तथा मौद्रिक प्रणाली में तरलता प्रबन्धन हेतु भारतीय रिजर्व बैंक रेपो एवं रिवर्स रेपो नीलामी का सहारा लेने लगा। प्रारम्भ में भारतीय रिजर्व बैंक परिवर्तनीय दर रेपो की नीलामी 1 से 14 दिन की अवधि के लिए करता था, लेकिन बाद में स्थिर दर पर रेपो की नीलामी केवल एक दिन की अवधि (शुक्रवार को तीन दिन की अवधि) के लिए की जाने लगी। तथापि, 14 दिन तक की लम्बी अवधि तक के लिए परिवर्तनशील रेपो दरो को लागू करने का अधिकार भारतीय रिजर्व बैंक के पास है।
पहले की प्रणाली में भारतीय रिजर्व बैंक नकदी प्रारक्षित अनुपात तथा खुले बाजार की क्रियाओं के द्वारा मौद्रिक प्रणाली में तरलता को नियन्त्रित करता था। इसके तहत भारतीय रिजर्व बैंक या तो नकदी प्रारक्षित अनुपात में परविर्तन लाकर तरलता की मात्रा को प्रभावित करता था, या खुले बाजार क्रियाओं के द्वारा ब्याज दरों के माध्यम से साख की लागत को प्रभावित करता था। लेकिन तरलता समायोजन सुविधा लागू कर दिए जाने के बाद, ब्याज दरों पर भारतीय रिजर्व बैंक का नियन्त्रण रेपो दर / रिवर्स रेपो दर के बीच एक ऐसा अनौपचारिक गलियारा उपलब्ध कराता है जिसके बीच मुद्रा बाजार ऊपर-नीचे होता रहता है। इस दृष्टि से रेपो दर मुद्रा बाजारकी ब्याज दर की न्यूनतम सीमा तथा इससे 100 बिन्दु ऊपर की रिवर्स दर उच्चतम सीमा कही जा सकती है।
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