मौद्रिक नीति के विश्लेषक - monetary policy analyst
मौद्रिक नीति के विश्लेषक - monetary policy analyst
मुद्रा स्फीति पर संवृद्धि जैसे अन्तिम उद्देश्यों तक पहुँचने के लिए मौद्रिक हस्तक्षेप की प्रक्रिया को मौद्रिक पारेषण यान्त्रिकी कहा जाता है। पारेषण यान्त्रिकी या पारेषण चैनल के चार तरीके हैं (अ) परिमाणात्मक चैनल (जैसे कि मुद्रा आपूर्ति तथा साख से सम्बन्धित), (ब) ब्याज दर चैनल, (स) विनिमय दर चैनल, तथा (द) आस्ति कीमत चैनल। किसी अर्थव्यवस्था विशेष में इन चैनलों का सापेक्षिक महत्तव अर्थव्यवस्था विशेष में इन चैनलों का सापेक्षिक महत्त्व अर्थव्यवस्था के विकास के स्तरों एवं इसकी अन्तर्निहित वित्तीय ढाँचे पर निर्भर करता है। उदाहरणार्थ एक खुली अर्थव्यवस्था के लिए विनिमय दर चैनल के महत्त्वपूर्ण होने की अपेक्षा की जाती है,
वही परिमाणात्मक चैनल महत्वपूर्ण हो सकता है। जहाँ वाणिज्यिक बैंक वित्तक बड़े स्रोत हैं, इनमें से कोई भी चैनल अकेले ही स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करता, वरन इनके बीच महत्त्वपूर्ण ढंग से अन्तः क्रिया भी होती रहती है।
परिचालनात्मक प्रक्रिया उपकरण एवं लक्ष्य
मौद्रिक नीति का दिन-प्रतिदिन का कार्यान्वय मौद्रिक नीति परिचालनात्मक प्रक्रिया कहलाता है। मौद्रिक नीति कतिपय मध्यवर्ती लक्ष्यों के द्वारा अपने अन्तिम उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करती है (जैसेकि कीमत स्थिरता, वंवृद्धि आदि) विनिमय दर, मुद्रा आपूर्ति संवृद्धि तथा ब्याज दर का एक स्तर मध्यवर्ती लक्ष्य हो सकते हैं, भारतीय रिजर्व बैंक ने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है (विशेष रूप से नब्बे के दशक में) कि मुद्राफलन हेतु माँग भारत में लगभग स्थिर है और इसी को मानते हुए मुद्रा आपूर्ति संवृद्धि के एक वांछित स्तर (बृहत मुद्रा या ड) को मध्यवर्ती लक्ष्य के रूप में निर्धारित कर दिया गया ।
तदनुरूप, भारतीय रिजर्व बैंक ने आगे की अवधि के लिए मुद्रा आपूर्ति (बृहत मुद्रा) संवृद्धि के वांछित लक्ष्य निर्धारित किए तथा मौद्रिक एवं साख नीति पर गवर्नरके बयान के माध्यम से सार्वजनिक किया। मुद्रा आपूर्ति की यह संवृद्धि दर सकल घरेलू उत्पाद की अपेक्षित संवृद्धि दर तथा मुद्रा स्फीति के एक सहनीय स्तर को ध्यान में रखकर निर्धारित की गयी। बृहत मुद्रा में संवृद्धि के दिए हुए अपेक्षित स्तर पर प्रारक्षित मुद्रा में प्रसार का निर्धारण मुद्रागुणक द्वारा होता है। तथापि बृहत मुद्रा की लक्षित दर का निर्धारण करने में किसी वर्ष विशेष में राजकोषीय स्थिति तथा बाह्य क्षेत्रक की स्थिति को भी ध्यान में रखा जाता है। उदाहरणार्थ, यदि किसी वर्ष राजकोषीय घाटा बढ़ जाता है और इस बढ़े हुए राजाकोषीय घाटे का वित्तीयन सरकार द्वारा बाजारों से उधार लेकर किया जाता है तो प्रारक्षित मुद्रा प्रसार के लक्ष्य को संशोधित कर दिया जाता है ताकि सरकार की बढ़ी हुई बाजार उधारी को समायोजित करने के लिए तरलता में अधिक वृद्धि को अनुमन्य किया जा सके। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो आर्थिक प्रणाली में तरलता (नकदी की कमी होगी, जिसके परिणामस्वरूप ब्याज दरों में ऊपर की और दबाव बढ़ेगा।
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