नब्बे के दशक के प्रारम्भ में मौद्रिक नीति - Monetary policy in the early nineties

नब्बे के दशक के प्रारम्भ में मौद्रिक नीति - Monetary policy in the early nineties


आर्थिक सुधार प्रारम्भ किए जाने से पूर्व, नब्बे के दशक के प्रारम्भ तक, भारतीय वित्तीय बाजार विभिन्न खण्डों में बंटा हुआ था और इन खण्डों के बीच अति न्यून अन्तरसम्बन्ध (यदि कोई थे भी तो ) ही थे। मुद्रा बाजार था तो लेकिन उससे गहराई और तरलता की कमी थी। निक्षेपों, साख एवं सरकारी प्रतिभूतियों पर ब्याज दरें अजि विनियमित थी। ऊँचे तरलता अनुपात के माध्यम (नब्बे के दशक के प्रारम्भ तक 38.5 प्रतिशत) सरकार बाजार दरों से काफी नीची दर पर बैंकों की निक्षेप निधियों का बड़ा हिस्सा प्रयुक्त कर रही थी। बैंकिंग क्षेत्रक को उधार देय संसाधनों का एक अन्यमहत्वपूर्ण हिस्सा रियायती ब्याज दर पर प्राथमिक क्षेत्र को जा रहा था।


सरकारके राजकोषीय घाटे के वित्तीयन हेतु तदर्थ कोषागार बिलों का प्रयोग करने की प्रणाली का मौद्रिक नीति को संचालित करने पर घातक प्रभाव पड़ा।

मूलरूप से तदर्थ कोषागार बिलोंका अभिकल्पन सरकार द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक से अल्पकालीन साख प्राप्त करने के लिए किया गया था। धीरे-धीरे पुराने तदर्थ बिलों को चुकाने के लिए नए तदर्थ कोषागार बिल जारी किए जाने लगे तथा इस प्रकार बिना राजकोषीय प्रयासों से अधिक बिल प्राप्त किया जाने लगे। कोषागार बिल बाजार में न बेच कर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अपने पास ही रखे जाते थे। इससे इनको जारी करते ही बाजार में मुद्रा आपूर्ति बढ़ जाती थी। यदि भारतीय रिजर्व बैंक ने इन कोषागार बिलों को बाजार में बेच दिया होता तो इसका अर्थ बाजार की क्रय शक्ति सरकार को हस्तान्तरित हो जाने के रूप में होता और आर्थिक प्रणाली में अतिरिक्त क्रयशक्ति नहीं बढ़ पाती। इतना ही नहीं तात्कालिक परिस्थितियों में भले ही भारतीय रिजर्व बैंक तदर्थ कोषागार बिलों की पुनः बिक्री करने की स्थिति में न रहा हो,

यदि सरकार ही इन कोषागार बिलों का भुगतान समय से कर देती तो इतनी ही मात्रा में मुद्रा आपूर्ति में कमी हो जाती। लेकिन पुराने तदर्थ कोषागार बिलों के स्थान पर नए कोषागार बिलों तथा नई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अतिरिक्त तदर्थ कोषागार बिलों को जारी करते रहने से बाजर में मुद्रा आपूर्ति बढ़ती रही। इस प्रकार सरकार के राजकोषीय घाटे का वित्तीयन स्वचालित तरीके से मुद्रा के सृजन द्वारा होता रहा। इस प्रक्रिया में सरकारी घाटे के स्वतः मौद्रीकरण की संज्ञा दी जाती है। तदर्थ कोषागार बिलों के अतिरिक्त भारतीय रिजर्व बैंक ऐसी सभी दिनांकित सरकारी प्रतिभूतियां भी खरीद लेती थी जो बाजार में बिकने से रह जाती थी। इन दोनों घटकों (भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा तदर्थ कोषागार बिलों एवं दिनांकित सरकारी प्रतिभूतियों का क्रय) की कुल धनराशि केन्द्र सरकार को भारतीय रिजर्व बैंक की निबल साख थी और इस धनराशि में किसी समयावधि में कोई भी वृद्धि प्रारक्षित मुद्रा में वृद्धि के रूप में परिलक्षित होती थी।


सरकार के घाटे के स्वचालित मौद्रीकरण की प्रक्रिया ने कीमतों पर ऊर्ध्वकारी दबाव डाला। इससे साठ के दशक से लेकर नब्बे के दशक के प्रारम्भिक वर्षों तक (अस्सी के दशक के पहले पाँच वर्षों को छोड़कर) मुद्रा स्फीत की दर अविरत आधार पर ऊँची रही। यह और बात है कि इस ऊँची मुद्रा स्फीति दर में सन् 1973 के कच्चे तेल की कीमतों में हुई भारी वृद्धि का भी योगदान था। स्वचालित मौद्रिक प्रसार का कीमतों पर प्रतिकूल प्रभाव रोकने के लिए नकदी प्रारक्षित अनुपात को 1970 के दशक प्रारम्भ में मात्र 3 प्रतिशत से बढ़कर नब्बे के दशक के प्रारम्भ में 15 प्रतिशत के उच्चतम स्तरतक ले आया गया।


सरकारी घाटे के स्वतः मौद्रिकरण के अलावा,

साठ, सत्तर एवं अस्सी के दशक की सम्पूर्ण अवधियों में केन्द्र सरकार के बढ़ते घाटे की भरपायी बैंकिंग प्रणाली द्वारा सरकार के उधार लेने के कार्यक्रम को सहायता देकर की गयी। प्रारम्भ में उधारों की लागत को कम करने के नाम पर ब्याज दरों को काफी नीचे रखा गया। लेकिन बाद में, इनको अधिकाधिक आकर्षक बनाने के लिए ब्याज दरों को बढ़ाया गया। ब्याज दरों को बढ़ाने से भी जब बैंकिंग प्रणाली से सरकार को पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं मिल सकी तो धीरे-धीरे सांविधिक तरलता अनुपात को बढ़ाकर नब्बे के दशक के प्रारम्भ में 36.5 प्रतिशत के स्तर तक ले आया गया।


लगातार बढ़ती मुद्रा आपूर्ति की इन परिस्थितियों में मौद्रिक नीति के क्रियाशील होने के लिए स्थान सीमित ही था।

राजकोषीय घाटे के स्फीतिकारी प्रभावको निष्प्रभावी बनाने के लिए मौद्रिक नीति प्रत्यक्ष उपकरणों विशेष रूप से नकदी प्रारम्भिक अनुपात पर ही केन्द्रित रही। इस प्रकार राजकोषीय नीति के सापेक्ष मौद्रिक नीति को गौण स्थान ही प्राप्त रहा।


नब्बे के दशक के प्रारम्भ में नकदी प्रारक्षित अनुपात तथा सांविधिक तरलता अनुपात, दोनों ही अपनी उच्चतम सीमा के स्तर तक पहुँच गये और इस प्रकार लगातार मौद्रिक प्रसार के अभिलक्षणों वाले आर्थिक वातावरण में मौद्रिक नीति के उपकरणों के रूप में अपनी प्रभावकारिता खो बैठे। इस तरह नब्बे के दशक के आते-आते स्थिति अपोषणीय हो गयी और सुधार अपरिहार्य हो गए।