नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध और उसके बाद की अवधि में मौद्रिक नीति - Monetary policy in the late nineties and onwards
नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध और उसके बाद की अवधि में मौद्रिक नीति - Monetary policy in the late nineties and onwards
वित्तीय क्षेत्रक में सुधारों के बाद मौद्रिक नीतिके व्यवहार में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है। परिचालनात्मक लक्ष्यों सहित मौद्रिक नीति के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों में परिवर्तन अलावा, प्रत्यक्ष उपकरणों के स्थान पर अप्रत्यक्ष उपकरणों को अपनाने पर अधिक बल दिया जाने लगा है। यह परिवर्तन वित्तीय बाजारों की संरचना में किए गए महत्त्वपूर्ण सुधारों के द्वारा ही सम्भव हो पाया गया है।
1997-98 तक, भारत में मौद्रिक नीति बृहत मुद्रा के प्रसार के साथ, मध्यवर्ती लक्ष्य के रूप में संचालित होती रही है। बृहत मुद्रा की वांछित संवृद्धि दर सकल घरेलू उत्पाद की अपेक्षित संवृद्धि दर तथा मुद्रा स्फीति की प्रक्षेपित दर को ध्यान में रखकर निर्धारित होती रही है। वित्तीय क्षेत्रक में सुधारों से मौद्रिक नीति की पारेषण यान्त्रिकी में जो परिवर्तन आया है
उसमें ब्याज दर को अधिक प्रमुखता प्राप्त हुई है। 1998 99 से इससे पहले के दृष्टिकोण को बहुसूचक आधारित दृष्टिकोण से प्रतिस्थापित कर दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि M, या बैंक प्रारक्षित निधियों की लक्षित संवृद्धि का निर्धारण सीधे-सीधे सकल घरेलू उत्पाद तथा मुद्रास्फीति की वांछित दर को ध्यान में रखकर ही नहीं किया जाता, वरन अर्थव्यवस्था के अन्य चरों विभिन्न प्रकार के बाजारों (मुद्रा बाजार, प्रतिभूतियाँ बाजार, सरकारी प्रतिभूतियाँ बाजार) में प्रतिफल की दरों, साख संवृद्धि, विनिमय दर, पूँजी प्रवाह आदि की हालिया प्रवृत्तियों के आलोक में किया जाता है। दूसरे शब्दों में, यद्यपि बैंक प्रारक्षित निधियाँ परिचालनात्मक लक्ष्य बने रहते हैं तथापि वित्तीय प्रणाली को सही ढंग से कार्य करते रहने देने के लिए अन्य दरों एवं प्रवाहों को भी लक्षित किया जाता है। प्रत्यक्ष उपकरणों के स्थान पर अप्रत्यक्ष उपकरणों को प्रयुक्त किया जाना सावधानीपूर्वक तैयार किए
गए तथा सही क्रमागत रूप से लागू किए गए निम्नलिखित सुधारों से सम्भव हो पाया है: (अ) आर्थिक प्रणाली में नकदी को प्रवाहित करने / अवशोषित करने के लिए बाजार आधारित यांत्रिकी को विकसित करने के लिए खुले बाजार की क्रियाओं (पुन: खरीद विकल्प सहित) को वर्ष 1992 93 से फिर से क्रियाशील कर दिया गया,
ब) तरलता (नकदी) समायोजन सुविधा अप्रैल 1999 एवं जून 2000 में दो चरणों में प्रारम्भ की गयी। तरलता समायोजन सुविधा के अन्तर्गत भारतीय रिजर्व बैंक अब आर्थिक प्रणाली में प्रति पुनर्खरीद विकल्पों के द्वारा दैनिक आधार पर तरलता को नियन्त्रित कर पाने की स्थिति में है। पूर्व की संरचना में यह असम्भव था जब नकदी प्रारक्षित अनुपात ही रतलता को नियन्त्रित करने का प्राथमिक उपकरण था।
तरलता अतिरेक की स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक निश्चित पुनर्खरीद विकल्प दर वर्तमान में में 6.5 प्रतिशत) तरलता को अवशोषित कर लेता है तथा प्रति पुनर्खरीद विकल्प दर (पुनर्खरीद विकल्प दर से 100 आधार बिन्दु ऊपर) द्वारा तरलता की कमी के दौरान बाजार में नकदी प्रवाहित कर देता है। इस प्रकार, ये दोनों दरें एक ऐसा अनौपचारिक गलियारा उपलब्ध कराती हैं जिसके बीच माँग मुद्रा दरें एवं अन्य अल्पकालीन दरें उच्चावचित होती हैं। ऐसा इसलिए होता है. क्योंकि जब मांग मुद्रा दर रेपो दर (पुनर्खरीद विकल्प) से नीचे जाती है तो वाणिज्यिक बैंक माँग मुद्रा बाजार से निधियाँ उधार लेकर उसे निश्चित रेपो दर पर भारतीय रिजर्व बैंक के पास जमा करके कुछ लाभ अर्जित कर पाना सुनिश्चित कर लेते हैं। इसी प्रकार, यदि माँग मुद्रा दर रिवर्स रेपो दर (प्रति पुनर्खरीद विकल्प दर) से ऊँची रहती है तो बैंक भारतीय रिजर्व बैंकसे रिवर्स रेपो दर पद उधार लेकर उसे माँग मुद्रा बाजार में उधार लेकर कुछ न कुछ लाभ सुनिश्चित कर सकते है।
स) अप्रैल 1997 में बैंक दर को फिर से क्रियाशील किया गया। प्रारम्भ में, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विस्तारित सभी वित्तीय समायोजन इसी दर से सम्बद्ध थे। तरलता समायोजन सुविधा लागू किए जाने तथा रेपो / रिवर्स रेपो बाजार के शनै: शनै: विकसित होते जाने के साथ ही बैंक दर को भारतीय रिजर्व बैंक को दृष्टिकोण से बाजार की ब्याज दरों के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा ।
द) मौद्रिक नीत को राजकोषीय नीति चंगुल से मुक्त कराने के लिए, जून 1992 में बाजारी उधार लेने के केन्द्र सरकार के कार्यक्रम के लिए नीलामी प्रणाली प्रारम्भ की गयी। इसके बाद से राजकोषीय घाटे का बढ़ता हुआ भाग बाजार निर्धारित ब्याज दरों पर लिए गए बाजारी उधारों से पूर्ण किया जाता है।
तदर्थ कोषागार बिलों की प्रणाली वर्ष 1996-97 में समाप्त कर दी गयी तथा कोषागार बिलों द्वारा राजकोषीय घाटे का स्वचालित मौद्रिकरण अप्रैल 1997 से बन्द कर दिया गया।
य) उधार देने की दरोंको पहले तथा निक्षेप दरों को उसके बाद विनियमित करके ब्याज दरों को धीरे-धीरे विनियमित किया गया। सितम्बर 1991 में प्रारम्भ करके विभिन्न क्षेत्रकों को वितरित किए जाने वाले विभिन्न आकार के ऋणों पर बहुब्याज दरों की उपचारित प्रणाली धीरे-धीरे वापस ले ली गयी (कृषि, लघु उद्योगों एवं निर्यात साख को छोड़कर)। उधार देने की न्यूनतम ब्याज दर की व्यवस्था को वापस लेते हुए वाणिज्यिक बैंकों को 2 लाख रूपय से ऊपर के ऋणों पर ब्याज दर का निर्धारण स्वयं करने का अधिकार अक्टूबर 1994 से दे दिया गया।
इसी के साथ, बैंकों द्वारा अपनी मुख्य उधारी दर को घोषित करना भी अनिवार्य बना दिया गया। बाद में, अलग-अलग परिपक्वताओं वाले ऋणों के लिए अलग अलग मुख्य उधारी दरे निर्धारित करने की अनुमति बैंक को दी गयी। इतना ही नहीं बैंक अपने उच्च साख वाले ग्राहकों को मुख्य उधारी दर से नीची ब्याज दर पर भी ऋण दे सकते है।
२) विभिन्न परिपक्वताओं के निक्षेपों पर बहु ब्याज दरें भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित किए जाने की व्यवस्था को एकल सीमा दर से प्रतिस्थापित करके अप्रैल 1992 में प्रारम्भ करके निक्षेप ब्याज दरों भी विनिर्विनियमित कर दिया गया। इसके बाद अक्टूबर 1995 में दो वर्षसे अधिक की परिपक्वता वाले निक्षेपों,
जुलाई 1996 में एक लाख रूपए से अधिक की परिपक्वता वाले निक्षेपों तथा अक्टूबर 1997 से सभी अवधियों के निक्षेपों के लिए ब्याज दरों की सीमा को धीरे-धीरे हटाया गया। वर्तमान में केवल बचत बैंक दर (मार्च 2003 से 3.5 प्रतिशत) का निर्धारण ही भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किया जाता है। अन्य सभी प्रकार के निक्षेपों पर ब्याज दरों का निर्धारण वाणिज्यिक बैंकों द्वारा स्वयं अपने स्तर से किया जाता है।
ल) बाजार आधारित अप्रत्यक्ष उपकरणों वाली मौद्रिक नीति की प्रभावकारिता हेतु ब्याज दरों की विनिर्विनियमन ही पर्याप्त नहीं है। इसकी सहायतार्थ अल्पकालीन निधियों के लिए अति सक्रिय बाजार जैसे वित्तीय बाजार के विलुप्त प्रखण्ड के विकसित होने की भी आवश्यकता है।
मौद्रिक नीति के सफल संचालन हेतु वित्तीय बाजार (जैसे कि मुद्रा बाजार ) के अल्पकालीन प्रखण्ड का आकार एवं दक्षता भी महत्त्वपूर्ण है। इस बाजार की चौड़ाई एवं गहराई जितनी करने के लक्ष्य को प्राप्त करना उतना ही अधिक आसान होगा। मुद्रा बाजार जितना ही अधिक दक्ष होता है, परिचालनात्मक लक्ष्यों को प्रभावित कर पाने वाले मौद्रिक नीति उपकरणों को सक्रिय होने में उतना ही कम समय लगता है अर्थात् समायोजन गति उतनी ही अधिक होती है।
नब्बे के दशक के प्रारम्भ तक वित्तीय बाजारों के अल्प विकास की व्याख्या दो घटकों से की जा सकती है- वाणिज्यिक बैंक द्वारा अपने ग्राहकों को प्रदत्त नकदी साख सुविधा तथा कोषागार बिलों पर 4.6 प्रतिशत प्रतिफल की सुविधा।
नकदी साख सुविधा के अन्तर्गत उधार लेने वाले ग्राहकों को उनके अपने स्वयं के विवेकानुसार एक सीमा तक उधार लेने की स्वीकृति दी गयी।
इस तरह, जब कभी भी उन्हें आवश्यकता हुई, उन्होंने साख सीमा के भीतर बैंकों से धन आहरित कर लिया और अपने पास अतिरेक होने पर उसे ब्याज सहित वापस जमा कर दिया। इस प्रणाली का सीधा सा अर्थ यह रहा कि निगमों को अपने स्तर से नकदी प्रबन्ध में अनुशासन लागू करने की जरूरत नहीं थी. यह दायित्व वाणिज्यिक बैंकों पर था। इसके परिणामस्वरूप अल्पकालीन निधियों के बाजार में गैर-बैंक निकायों, विशेष रूप से निगमित निकायों, की रूचि की कमी थी। कोषागार बिलों पर 4.6 प्रतिशत का सुरक्षित प्रतिफल अल्पकालीन निधि बाजार के विकसित न हो पाने का एक अन्य प्रमुख कारण था। अप्रैल 1995 से नकदी साख प्रणाली के स्थान पर धीरे-धीरे ऋण प्रणाली लागू किए जाने के साथ ही, नकदी प्रबन्धन का दायित्व फिर से निगमित निकार्यो पर विवर्तित हो गया। अप्रैल 1997 से कोषागारबिलों पर सुरक्षित प्रतिफल की प्रणाली समाप्त हो जाने के साथ नकदी साख सुविधा समाप्त हो जाने से अल्पकालीन निधियों के बाजार के आकार एवं गहराई को विकसित होने का अवसर मिला।
वार्तालाप में शामिल हों