व्यक्तिगत बिक्री की रणनीति बिक्री और बेचने का कार्य - Personal Selling Strategy Sales and Selling

व्यक्तिगत बिक्री की रणनीति बिक्री और बेचने का कार्य - Personal Selling Strategy Sales and Selling


प्रायः वस्तुओं के बेचने के लिए सभी विक्रयकर्ताओं के द्वारा एक ही रास्ता अपनाया जाता है; जैसे, भावी ग्राहकों का पता लगाना व उनके बारे में जानकारी प्राप्त करना, फिर उनसे सम्पर्क स्थापित करना व वस्तु को उनके समक्ष प्रस्तुत करना, वस्तु की अच्छाइयां, आदि को बताना और यदि ग्राहकों द्वारा आपत्तियां उठायी जाती हैं तो उनका समाधान कर विक्रय करना। यदि वस्तु का विक्रय करना उस समय सम्भव न हो तो बाद में उसका अनुगमन करना। यह सभी विक्रय प्रक्रिया की अवस्थाएं है। यह अवस्थाएं एक-दूसरे से अन्तर्व्याप्त हैं। एडविन चार्ल्स ग्रीफ ने अपनी पुस्तक में विक्रय प्रक्रिया की पांच अवस्थाएं बतायी हैं : 1. ध्यानाकर्षण, 2. रुचि उत्पन्न करना 3. इच्छा उत्पन्न करना, 4. विश्वास व 5. समापन, जबकि हरबर्ट एन. केसन ने अपनी पुस्तक में छ: अवस्थाएं बताई हैं

1. स्वागत, 2. पूछताछ 3. प्रदर्शन 4. चयन, 5. संवर्द्धन 6. प्रशंसा एवं विदाई। संक्षेप में विक्रय प्रक्रिया की निम्न अवस्थाएं हो सकती हैं :


1. पूर्वेक्षण करना - विक्रय प्रक्रिया की यह सबसे पहली अवस्था है। इनमें विक्रयकर्ता यह पता लगाता है कि उस वस्तु की आवश्यकता किन व्यक्तियों व संस्थाओं को हैं तथा वे उस वस्तु को खरीदने में समर्थ हैं अथवा नहीं। इसका कारण यह है कि बिना आवश्यकता वाले या असमर्थ व्यक्तियों की और अधिक प्रयास करने में बिक्री में वृद्धि नहीं होती है, विक्रयकर्ता का समय व परिश्रम व्यर्थ ही जाता है तथा उसको कोई आर्थिक लाभ भी नहीं होता है। भावी ग्राहकों का पता किस प्रकार लगाया जा सकता है ? इसके लिए एक विक्रयकर्ता को कुछ प्रयत्न करना पड़ेगा। उदाहरण के लिए, यदि किसी कार विक्रेता को भावी क्रेताओं का पता लगाना है तो वह यह तीन कार्य कर सकता है:

1. सबसे पहले क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी के कार्यालय जाकर वहां का रजिस्ट्रेशन रजिस्टर देखकर यह पता लगा सकता है कि किन-किन व्यक्तियों के पास पुराने मॉडल क कारें हैं ; 2. दूसरे किसी वर्कशॉप में जाकर भी यह पता लगाया जा सकता है कि पुरानी कारें किन-किन के पास हैं और वे मरम्मत पर कितना व्यय कर रहे हैं? 3. इसी प्रकार स्वयं विक्रयकर्ता का मालिक भी अपना रिकॉर्ड देखकर पता लगा सकता है कि उसके कितने ग्राहकों के पास पुरानी कारें हैं। इसी प्रकार उन व्यक्तियों से भी सम्पर्क किया जा सकता है जिनको नौकरियों में पदोन्नति हुई है या जिनको लॉटरी, आदि का इनाम मिला है। जीवन बीमा की पॉलिसियों के बेचो वाले विक्रयकर्ता जिन्हें भारत में बीमा एजेण्ट कहते हैं अपने जीवन बीमा व्यापार की वृद्धि के लिए सम्भावित ग्राहकों को ढूंढ़ते हैं, जैसे नौकरी वाले या पेशेवर व्यक्ति - डॉक्टर, वकील, इन्जीनियर, चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट, आदि कभी-कभी यह लोग अपनी निगाह उन व्यक्तियों पर भी केन्द्रित कर देते हैं जिनको मकान बनवाने के लिए धन की आवश्यकता है क्योंकि भारतीय जीवन बीमा निगम अपने बीमादारों का मकान बनवाने के लिए ऋण भी देता है।


2. पूर्व पहुंच जब एक विक्रयकर्ता को भावी ग्राहकों के नामों का पता लग जाता है तो विक्रय क्रिया की दूसरी अवस्था पूर्व पहुंच की आती है। इससे क्रेता के सम्बन्ध में साधारणतया उसकी आयु, आय, धर्म, शिक्षा, परिवार, मैत्री सम्बन्ध, अभिरुचि, राजनीतिक दृष्टिकोण, योजनाएं, आदि के सम्बन्ध में सूचनाएं एकत्रित की जाती हैं। इन सूचनाओं के एकत्रित कर लेने से विक्रयकर्ता अपनी भेंट में कम-से-कम गलतियां करता है और उसको विक्रय करने में सफलता मिलने की सम्भावनाएं अधिक हो जाती हैं।


3. पहुंच एवं प्रस्तुतीकरण सम्भावित क्रेता का पता लगाकर व उसके बारे में सूचना प्राप्त कर लेने के बाद इस बात की आवश्यकता होती है कि उस तक कैसे पहुंचा जाए व वस्तु का प्रस्तुतीकरण किया जाए।

क्रेता तक पहुंचने के कई तरीके हैं, जिनमें प्रमुख निम्न चार हैं: (i) सन्दर्भ पहुंचकर जब एक विक्रयकर्ता अपने किसी पुराने ग्राहक से कोई पत्र या नोट सम्भावित ग्राहक के नाम लिखा लेता है। और फिर उसको लेकर वह उस सम्भावित ग्राहक के पास जाता है तो ऐसी पहुंच सन्दर्भ पहुंच कहलाती है। साधारणतया यह देखा जाता है कि सन्तुष्ट ग्राहकों को ऐसा पत्र लिखने में कोई संकोच नहीं होता है, जबकि यह नोट विक्रयकर्ताओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। उनके लिए इसके आधार पर अपनी मित्रता सम्भावित ग्राहक से बढ़ाने में आसानी रहती है और आदेश मिलने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता है। (ii) परिचय पहुंच जब विक्रयकर्ता के पास सन्दर्भ के लिए कोई पत्र नहीं होता तो वह इस तरीके को अपनाता है। इसमें विक्रयकर्ता सम्भावित ग्राहक का अभिवादन कर अपना परिचय देता है और बताता है कि उसका क्या नाम है वह किस कम्पनी का कार्य करता है

और किन वस्तुओं के लिए वह उनके पास आया है? (iii) वस्तु पहुंच - इसमें विक्रयकर्ता ग्राहक के पास पहुंचते ही अपनी वस्तु उसके सामने रख देता है जिससे ग्राहक विक्रयकर्ता की भावना को समझ लेता है। यदि ग्राहक थोड़ी-सी भी रुचि उस वस्तु के बारे में दिखाता है तो विक्रयकर्ता उसको समझाकर आदेश लेने का प्रयत्न करता है। यदि स्थिति इसके विपरीत होती है तो क्रेता अपनी अनिच्छा व्यक्त कर क्षमा-याचना कर लेता है। ऐसी पहुंच उस समय अच्छी मानी जाती है, जब वस्तु मनमोहक हो।


(iv) उपभोक्ता लाभ पहुंच यह तरीका आमतौर पर विक्रयकर्ताओं द्वारा अपनाया जाता है। इसमें वस्तु से उपभोक्ता को क्या लाभ हैं इसकी जानकारी विक्रयकर्ता द्वारा सर्वप्रथम उपभोक्ता को दी जाती है और इससे उसको अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न किया जाता है।


4. अभिनय - इसमें ग्राहक के समक्ष एक नाटक जैसा अभिनय किया जाता है जिससे कि ग्राहक उसकी उपयोगिता से प्रभावित हो और वस्तु को क्रय करने के लिए लालायित हो। साधारणतया यह देखा जाता है कि जीवन बीमा का उद्देश्य भावी जोखिम को सहन करना है जबकि बीमा कराने वाला बीमादार ऐसा नहीं सोचता। वह तो अपने आप को एक निश्चित काल तक जीवित रहने की बात करता है। ऐसे ही समय विक्रयकर्ता अपना नाटक खेलता है और अपने थैले में कुछ अखबारों के कटिंग निकालकर सामने रखता है और बताता है कि विवाहित नवयुवक की दुर्घटना में मृत्यु किस प्रकार उसके परिवार को अन्धकार में डाल देती है। यदि इस नवयुवक ने अपना जीवन बीमा करा लिया होता तो परिवार वालों को इतना धन अवश्य मिल जाता कि वे अपने जीवन को उचित रूप से चला सकते। नाटक का अभिनय करते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखा जाए कि ऐसे नाटक का ग्राहक पर विपरीत प्रभाव न पड़े। नाटक ग्राहक की रुचि के अनुरूप ही खेला जाए।



5. ट्रायल समाप्ति – जब विक्रयकर्ता अपनी बात कह चुका हो तथा वस्तु का प्रदर्शन पूर्ण कर लेता है तो फिर उसको यह पता लगाना होता है कि ग्राहक ने वस्तु खरीदने का निर्णय लिया है अथवा नहीं। कुछ ग्राहक ऐसे होते हैं, जो स्वयं बता दिया देते है कि अब आप ऑर्डर बुक कर सकते हैं, लेकिन कुछ ग्राहक ऐसे होते हैं जो अपनी प्रतिक्रिया का पता नहीं लगने देते। ऐसी स्थिति में विक्रयकर्ता को ऐसे प्रश्न करने पड़ते हैं जिनसे यह पता लग सके कि ग्राहक क्रय करने को तैयार है अथवा नहीं जैसे आपको कौन-सा मॉडल पसन्द है? आप किस रंग को पसन्द करेंगे? आपके लिए कितनी इकाइयां पैक करा दूं? आप वस्तु साथ ले जाएंगे या घर भिजवा दी जाए? आदि। यदि ग्राहक वस्तुओं को क्रय करने की स्थिति में है तो वह सकारात्मक उत्तर देगा अन्यथा नकारात्मक। जब ग्राहक नकारात्मक उत्तर दे तब उससे वस्तु के सम्बन्ध में आपत्तियां आमन्त्रित करनी चाहिए।


6. आपत्तियों का निवरण - जब ग्राहक वस्तु क्रय करने की स्थिति में नही होता या उसको वस्तु पसन्द नहीं आती तो वह विभिन्न प्रकार की आपत्तियां उठा देता है। एक अच्छे एवं कुशल विक्रयकर्ता को आपत्तियों से घबड़ाता नहीं चाहिए बल्कि अपनी विक्रय कला का प्रदर्शन इन आपत्तियों को दूर करने में करना चाहिए जिससे कि ग्राहक नैतिक दृष्टि से दब जाए तथा क्रय करने का आदेश दे सकें। ग्राहक की आपत्तियां कई प्रकार की होती हैं। कुछ आपत्तियां ऐसी होती हैं जिनको स्पष्ट आपत्तियां कहते हैं। यह वे आपत्तियां हैं जिन्हें ग्राहक स्पष्ट रूप से विक्रयकर्ता का बता देता है, जैसे, मूल्य आपत्ति, वस्तु आपत्ति, सेवा आपत्ति, आवश्यकता आपत्ति, आदि। ऐसी आपत्तियों के निवारण का अवसर विक्रयकर्ता को मिलता है और वह उनको अपने ढंग से दूर करके ग्राहक को क्रय करने के लिए विवश कर सकता है और भविष्य के लिए उचित सेवा प्रदान करने का आश्वासन दे सकता है, लेकिन कुछ आपत्तियां ऐसी होती हैं

जो छिपी हुई होती हैं जिनको ग्राहक स्पष्ट नहीं करता है। वह वस्तु को नही खरीदने के लिए ही आपत्तियां उठा रहा है। ऐसी आपत्तियां टालमटोल वाली आपत्तियां कहलाती हैं; जैसे, कुछ समय सोचने के लिए दीजिए", "दो माह बाद मिलिए " "अगले माह के पहले सप्ताह तक इन्तजार कीजिए। यदि विक्रयकर्ता ऐसी आपत्तियों को मान ले तो उसका अधिकांश समय ऐसे ही ग्राहकों में निकल जाएगा और वह उचित मात्रा में व्यवसाय नहीं कर पाएगा। अतः आवश्यकता इस बात की है कि ग्राहकों को निश्चय की स्थिति में आने के लिए विवश करना चाहिए जिससे दुबारा जाने की आवश्यकता प्रतीत न हो, लेकिन कुछ परिस्थितियों में विक्रयकर्ता को धैर्य रखना वांछनीय होगा। प्रत्येक दशा में विक्रयकर्ता को अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए।


7. समाप्ति या समापन एक विक्रयकर्ता द्वारा सम्भावित ग्राहक का पता लगाना,

उस तक पहुंचना, वस्तु को प्रस्तुत करना, आपत्तियों का निवारण करना, आदि इस उद्देश्य से किया जाता है कि ग्राहक वस्तु को क्रय करने का आदेश दे दे और इस प्रकार विक्रय समाप्ति कर दी जाए। यदि किसी प्रकार विक्रयकर्ता ग्राहक को सन्तुष्ट नहीं कर पाता तो वह आदेश भी प्राप्त नहीं कर सकता है तो उसका सारा श्रम बेकार चला जाता है।


वस्तु के क्रय करने की इच्छा बहुत बार ग्राहक स्पष्ट रूप से बता देता है, लेकिन कभी-कभी ग्राहक अपनी ओर से क्रय करने की बात नहीं करता है। ऐसी स्थिति में विक्रयकर्ता को स्वयं ही विक्रय समाप्ति की ओर अग्रसर होना चाहिए और इसके लिए समापन तकनीक काम में लानी चाहिए।

समापन तकनीक के अनुसार विक्रयकर्ता यह मानकर चलता है कि ग्राहक वस्तु क्रय करने के लिए तैयार है तथा वह इस प्रकार प्रश्न करता है कि आपकी संस्था का नाम क्या है? माल भेजने के लिए क्या पता है? कितनी यूनिट माल भेज दें? हमारा इन्जीनियर किस तारीख को आपकी फैक्टरी पर पहुंच जाए? आदि।


8. अनुगमन - विक्रय समाप्ति के पश्चात् इस बात की आवश्यकता होती है कि ग्राहक का अनुगमन किया जाय। यह अनुगमन विभिन्न कारणों से किया जाता है जिसमें दो कारण प्रमुख हैं प्रथम, ग्राहक को वस्तु उसके आदेश के अनुसार मिल जाए। इसके लिए विक्रयकर्ता को चाहिए कि माल की डिलीवरी स्वयं अपने सामने कराये या डिलीवरी के बाद ग्राहक से अवश्य मिल ले जिससे कि ग्राहक की असुविधाओं का पता लग जाए व ग्राहक यह महसूस करने लगे कि विक्रयकर्ता अपनी जिम्मेदारी के प्रति सजग है।

द्वितीय, ग्राहक सन्तुष्ट रहेगा तो भविष्य में आदेश मिलने की सम्भावना बनी रहेगी। ऐसा होने से विक्रयकर्ता का अधिक समय बर्बाद नहीं होगा और उसकी आय में कोई कमी नहीं होगी।


समय-समय पर ग्राहकों से मिलते रहना अनुगमन नीति के अन्तर्गत आता है। ऐसा करते रहने से ग्राहक दूसरे विक्रेताओं की ओर आकर्षित नहीं होने पाता। यदि विक्रयकर्ता से ग्राहक सन्तुष्ट है तो मिलने के समय भी उसको कुछ न कुछ आदेश अवश्य ही दे देता है।


एक विक्रयकर्ता के लिए निष्ठावान ग्राहकों का वर्ग बनाना बहुत लाभप्रद है। यह अनुगमन।से ही सम्भव है। यदि ग्राहक को एक बार उचित सेवा दी जाती है तो वह ग्राहक सदा ही प्रसन्न रहता है और भविष्य में भी अन्य आवश्यकताओं के समय ध्यान रखता है।