विक्रय प्रशिक्षण के सिद्धान्त - principles of sales training
विक्रय प्रशिक्षण के सिद्धान्त - principles of sales training
विक्रय प्रशिक्षण के सिद्धान्त इस प्रकार हैं
1. उद्देश्यों पर आधारित प्रशिक्षण एक उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है यह स्पष्ट होना चाहिए कि विक्रेता को प्रशिक्षण देने का मूल लक्ष्य क्या है। प्रशिक्षण उद्देश्य को तीन भागो ये बांट सकते हैं 1. प्रबन्धक उद्देश्य 2. प्रशिक्षार्थी उद्देश्य 3. विभागीय उद्देश्य उद्देश्य के अनुसार प्रशिक्षण ज्यादा प्रभावी होता हैं। उद्देश्यों के निर्धारित हो जाने पर कार्यक्रम का मूल्यांकन करना सुगम हो जाता हैं तथा इसे ठीक दिशा में चलाना संभव हो जाता है।
2. विषय सामग्री का निर्धारण प्रशिक्षण योजना बनाते समय विक्रेताओं को दिये जाने वाले प्रशिक्षण की विषय सामग्री की सुनिश्चित करनी चाहिए।
विषय सामग्री में सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक दोनो प्रकार की विषय वस्तु सम्मिलित की जानी चाहिए। इन विषयों में संस्था का इतिहास, नीतियाँ, उद्देश्य, वस्तु से सम्बन्धित जानकारी, विक्रय प्रक्रिया, विक्रय नीति, साख नीति, ग्राहक मनोविज्ञान, वितरण, विक्रय प्रतिवेदन, मूल्य निर्धारण, बिल बनाना, सरकारी नियम आदि सम्मिलित होनी चाहिए।
3. प्रशिक्षण का क्षेत्र प्रशिक्षण विक्रय विभाग के समस्त कर्मचारियों को प्रदान किया जाना चाहिए। - केवल बड़े पदों पर कार्य करने वाले विक्रय कर्मचारीयों को ही प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल करना सही नही हैं बल्कि निचले स्तर के कर्मचारियों को प्रशिक्षण की आवश्यकता ज्यादा जरुरी है।
4. प्रशिक्षण विधियाँ प्रशिक्षण विधियों को चयन संस्था की आवश्यकता एवं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाता है। प्रशिक्षण विधि मितव्ययी, विक्रेताओं के अनुरूप व सन्तोषजनक होनी चाहिए।
5. प्रशिक्षण का दायित्व प्रशिक्षण कार्यक्रम के अन्तर्गत यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि प्रशिक्षण का दायित्व स्वयं निस्था का है या विक्रय विभाग का प्रशिक्षण के कार्य में बाहरी संस्थायें उतनी रुचि नही लेती जितनी स्वंय की संस्था ले सकती है। अतः प्रशिक्षण का दायित्व स्वयं संस्था को ही ग्रहण करना चाहिए।
6. योग्य प्रशिक्षक प्रशिक्षण की विषय वस्तु के अनुरूप प्रशिक्षक पूर्णतः सक्षम एवं प्रभावशाली होने चाहिए अन्यथा प्रशिक्षण के उद्देश्यों की पूर्ति न हो सकेगी।
7. मितव्ययी प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रशिक्षण पर कितना ध्यान व्यय किया जाना है, उसकी पूर्ति किस प्रकार होगी, यह पूर्व निश्चित होना चाहिए। संस्था की वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखकर प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करना चाहिए।
8. विविधता प्रशिक्षण कार्यक्रम ऐसा हो जो विक्रेताओं को विक्रय के विभिन्न पहलुओं का अनुभव प्रदान करने में समर्थ हो। विक्रेताओं को व्यवहारिक व सैद्धान्तिक दोनों प्रकार का ज्ञान कराया जाना चाहिए।
9. सरलता प्रशिक्षण कार्यक्रम सरल होने चाहिए ताकि विक्रेता उसे सरलता से ग्रहण कर सके तथा उसका संचालन भी प्रभावशाली ढंग से किया जा सके। जटिल प्रशिक्षण से प्रशिक्षार्थियों की रुचि कम हो जाती है तथा इससे कोई लाभ नही होता है।
10. अभिप्रेरणा प्रशिक्षण में प्रेरणा का विशेष स्थान होता है। एक अच्छे प्रशिक्षण कार्यक्रम में यह होता है कि वह प्रशिक्षार्थियों को सीखने व ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरणा प्रदान करता है।
11. सहभागिता विक्रेताओं को जो वो सीखते है करने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। इस सिद्धान्त को प्रशिक्षण योजना में किया जाना चाहिए। प्रशिक्षण में विक्रेताओं की सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए।
12. नवीन ज्ञान का समावेश प्रशिक्षण योजना में विक्रय की नवीन एवं आधुनिक तकनीको का
समावेश होना चाहिए। विक्रय प्रशिक्षण की पद्धितयाँ
• विक्रेताओं को प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए कई पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है। इनको दो वर्गो में बांटा जाता है।
1. सामूहिक प्रशिक्षण पद्धति
2. वैयक्तिक प्रशिक्षण पद्धति
1. सामूहिक प्रशिक्षण पद्धतियाँ जब अधिक व्यक्तियों को एक साथ अथवा समूहों में विभाजित करके विक्रय प्रशिक्षण दिया जाता है तब ऐसे प्रशिक्षण को सामूहिक विक्रय प्रशिक्षण कहा जाता है। यह निम्नलिखित है
1. प्रवचन पद्धति प्रवचन एक औपचारिक एवं संगठित वार्ता है
जो किसी समूह के सम्मुख अपने - विचारों को किसी कक्ष या खुले स्थान पर भाषण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। प्रशिक्षणार्थी प्रवचन कर्ता की बात को सुनते तथा लिखते है और प्रश्नोत्तर द्वारा अपनी शंकाओं का समाधान करते हैं। प्रवचन को प्रभावी व रुचिपूर्ण बनाने के लिए, प्रोजेक्टर्स, टेपरिकार्ड, स्लाइड्स प्रदर्शनों का भी प्रयोग किया जाता है।
2. समूह परिचर्या - इस पद्धति में प्रशिक्षक, समूह संचालन अथवा कोई समूह सदस्य किसी विक्रय समस्या अथवा विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करता है। उसके उपरान्त समूह के सभी सदस्य बारी बारी से उस विषय पर अपने विचार प्रकट करते है। यह समस्या प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का एक अंग होती है तथा इसके अनेक पहलुओं पर विचार किया जाता है। सभी विक्रयकर्ता अपने दृष्टिकोणों एवं विचारों का आदान-प्रदान करते हुए एक दूसरे की शंकाओं का समाधान करते हुए सर्वसम्मति से समस्या का समाधान करने में सफल हो जाते है।
समूह परिचर्चा के लिए कई विषयों का चयन किया जा सकता है ग्राहक प्रेरणायें एवं व्यवहार विक्रय प्रस्तुतीकरण, सम्भावी ग्राहको की खोज एवं सम्पर्क, विक्रय संवर्धन कार्यक्रम, नवीन विक्रय तकनीकि, विक्रयकर्ता की बदली भूमिका, विपणन अनुसंधान, ग्राहक शिकायतो का मनोविज्ञान एवं निवारण आदि ।
3. विक्रय सम्मेलन पद्धति यह विचार-विमर्श पर आधारित एक प्रशिक्षण की पद्धति है जिसका उद्देश्य एक समूह के ज्ञान एवं अनुभव से सबको लाभ प्रदान करना है। सम्मेलन में विभिन्न विषयों पर आपसी विचार विमर्श एवं अनुभवो के आदान-प्रदान द्वारा सीखने पर दिया जाता है। सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रशिक्षार्थी अपने विचारा ज्ञान एवं दृष्टिकोण को प्रकट करने के लिए स्वतन्त्र होता है इसमें विचार विनिमय अनौपचारिक रूप से किया जाता है। सम्मेलनों के तीन प्रकार होते है।
1.निर्देशित सम्मेलन 2. समस्या समाधान मूलक सम्मेलन की सफलता बहुत कुछ भाग लेने वालो की इच्छा पर निर्भर करती है।
4. समस्या अध्ययन पद्धति- इस विधि में प्रशिक्षणार्थियों के सम्मुख एक चुनौती रखी जाती है जिसे स्वीकार करके वह समस्या का सही हल खोजने के लिए उत्प्रेरित होता है इस विधि के द्वारा विक्रेताओं की विश्लेषणात्मक योग्यता एवं तर्क शक्ति विकसित होती है। इस पद्धति का मुख्य उद्देश्य स्व-शिक्षण अथवा स्वतः सीखना है। इस पद्धति में प्रशिक्षणार्थी को निम्न अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। 1. समस्या का अध्ययन करना 2. तत्वों का संग्रहण करना 3. समस्या के मूल तत्वों को परिभाषित करना 4. समस्या के संदर्भ में निर्णय लेना 5. सम्पूर्ण समस्या को अपने शिक्षण का आधार बनाना।
5. भूमिका निर्वाह पद्धति इस पद्धति में प्रशिक्षार्थियों को नाटकीय तौर पर विभिन्न पद सौपे जाते है तथा फिर उन्हें अपनी भूमिका निभाने के लिए कहा जाता है। भूमिका निर्वाह के दौरान प्रशिक्षार्थियों के आचरण, भावों, संवेगो, उत्तेजना, आत्म-नियन्त्रण, अभिव्यक्ति को परखा जाता है। अन्त में प्रशिक्षक कुछ सामान्य निष्कषो के साथ प्रशिक्षार्थियों को कार्य निष्पादन की सही विधियों का ज्ञान कराते है। भूमिका निर्वाह पद्धति को नाट्य खेलना, वास्तविकता, व्यवहार, मनोनाट्य भी कहा जाता है।
6. विशेष पाठन पद्धति विशेष पाठन कार्यक्रम प्रशिक्षण की एक विधि है जिसमें व्यक्ति किसी विशेष विषय पर अपना भाषण पढ़ता है
तथा अन्य उसे सुनते है तथा उस पर विचार-विमर्श करते है यह विधि भी आपसी विचार-विमर्श द्वारा प्रशिक्षण की विधि है। ऐसे कार्यक्रम संस्थाओं द्वारा अपने विभाग में ही नये व पुराने विक्रेताओं के लिए आयोजित किये जाते हैं।
7. गोलमेज पद्धति यह वार्ता प्रशिक्षणार्थियों द्वारा एक प्रशिक्षक के निर्देशन में एक गोलमेज के इर्द गिर्द बैठकर की जाती है। प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के विभिन्न विषयों पर ये वार्ताये आयोजित की जाती है। तथा प्रश्नोत्तर तथा विचार-विमर्श के द्वारा यह प्रशिक्षण सम्पन्न किया जाता है।
8. सचेतनता पद्धति - विक्रता को अपने ग्राहक की भावनाओं,
विचारो मनोवृत्तियों, भावात्मक प्रतिक्रियाओं के प्रति सचेतनता रखनी होती है। इस दृष्टि से प्रशिक्षण की यह विधि अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस विधि में प्रशिक्षार्थियों को अपने व्यवहार से दूसरे पर पड़ने वाले प्रभावों के प्रति जागरूक करना है। इस प्रशिक्षण का प्रमुख उद्देश्य प्रशिक्षणार्थियों में मानवीय व्यवहार की योग्यता का विकास करना है।
9. विक्रय नाट्य प्रशिक्षण इस विधि में नये विक्रय कत्ताओं के समक्ष विक्रय प्रक्रिया, विक्रय वार्ता एवं विक्रय प्रदर्शन को नाटकीय ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। इसमें प्रशिक्षक, विक्रय प्रबन्धक तथा पुराने विक्रयकर्ता विक्रय व्यवहारों एवं कार्यों को अभिनव के रूप में प्रस्तुत करते है ।
इस प्रकार नाट्य प्रदर्शन को देखकर नये विक्रेता अपनी भूमिका, कार्य व विक्रय व्यवहारों के बारे में महत्वपूर्ण बाते सीखते प्रशिक्षण की यह पद्धति प्रभावी होने के साथ-साथ अत्यन्त रोचक भी है। विक्रय क्षेत्र में इसका प्रयोग लगातार बढ़ रहा है।
10. विशेष पाठ्यक्रम - विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं प्रबन्ध संस्थाओं द्वारा विपणन, विक्रय प्रबन्ध, विक्रयकला, विज्ञापन एवं प्रचार, विपणन अनुसंधान आदि विषयों के प्रशिक्षण हेतु विशिष्ट पाठ्यक्रम तैयार किये गये है। व्यवसायिक संस्थायें अपने विक्रयकताओं प्रशिक्षण के लिए इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिला कर प्रशिक्षण दिलवा सकती हैं।
11. व्यक्तिक प्रशिक्षण पद्धतियाँ- वैयक्तिक प्रशिक्षण पद्धतियाँ निम्न प्रकार की हैं
1. कार्य पर प्रशिक्षण प्रशिक्षण की इस विधि में नये विक्रय कर्ता को पुराने विक्रयकर्ता की देखरेख में प्रशिक्षण दिया जाता है।
इसमें विक्रयकर्ता स्वयं कार्य करते हुए सीखता है। वस्तुत: यह विधि कार्य करने करके दिखाने, अभ्यास करने तथा अपने कार्य का मूल्यांकन करने का एक मिश्रित रूप है। इस विधि में प्रक्रिया चार्ट, क्रियात्मक प्रदर्शन, मैन्युअल आदि का भी प्रयोग किया जाता है।
2. कार्य हेर-फेर प्रशिक्षण - इस विधि के द्वारा विक्रेता को विभिन्न विभागों से संबन्धित कार्यों का प्रशिक्षण देने का प्रयास किया जाता है। विक्रेता को एक विभाग से दूसरे विभागों में विभिन्न स्थानों पर कार्य करने का भेजा जाता है जैसे बही खाते विभाग, अनुसंधान विभागा, निर्माण विभाग, विज्ञापन, क्रय पैंकिग व जनसम्पर्क विभागा विक्रेता को पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार कार्य कराया जाता है। इससे उसे विक्रय में सम्बन्धीत सभी बातो का व्यवहारिक ज्ञान हो जाता है। सभी विभागों का अनुभव होने के बाद उसे प्रमुख विक्रय कार्य में लगा कर प्रशिक्षण दिया जाता है।
3. व्यक्तिक परिचर्चा इस विधि में विक्रयकर्ता एवं विक्रय प्रबन्धक या अन्य बड़े अधिकारी आपस मिल बैठकर विक्रय कर्ताओं की विक्रय समस्याओं, शंकाओं आदि पर चर्चा करके उसे दूर करते है। यह चर्चा निजी तौर पर की जाती है इसमें विक्रयण की प्रभाविता, मार्ग नियोजन, माँग सारणीयन ग्राहकों से भेंट, विक्रय समस्याओं के निवारण आदि विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया जाता है।
4. पत्राचार पाठ्यक्रम यह विधि विक्रय कर्ता को उनकी नियुक्ति से लेकर सेवा समाप्ति तक प्रशिक्षण देने के लिए काम में लायी जा सकती है।
इस विधि का प्रयोग अनुभवी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने के लिए किया जाता है। इस विधि का प्रयोग विक्रेताओं को नवीनतम जानकारी देने, नवीन अनुसंधानो के निष्कर्षो को बताने तथा तकनीकि परिवर्तनो से अवगत कराने के लिए भी किया जाता है। कई संस्थाये, बीमा कम्पनियाँ, तकनीकि औद्योगिक संस्थाये पत्राचार द्वारा अपने विक्रयकर्ता को प्रशिक्षण उपलब्ध करवाती है।
5. कार्यक्रमिक निर्देशन यह विधि पत्राचार से मिलती जुलती है। इसमें प्रशिक्षण की विषय सामग्री को क्रमांकित निर्देशन ईकाइयों में विभाजित कर दिया जाता है। तत्पश्चात् इसे पुस्तक या माइक्रो फिल्म के रूप में बदल लिया जाता है।
प्रत्येक सामग्री ढांचे में किसी विषय की विस्तृत व्याख्या तथा विक्रेता के ज्ञान के परीक्षण के लिए एक समस्या या प्रश्न दिया जाता है, प्रशिक्षणार्थी अपने उत्तरों का मूल्यांकन अन्य सामग्री ढाँचे से करते है। इस प्रकार अपना मूल्यांकन वह प्रशिक्षण पाठ्य सामग्री की सहायता से स्वयं करते है। विक्रय
प्रशिक्षण में इस पद्धति का प्रयोग कम होता है। 6. प्रशिक्षण सहायता प्रशिक्षण की विभिन्न विधियों में प्रशिक्षण सामग्री व उपकरणों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है प्रशिक्षण सहायता व उपकरणों में फिल्म पट्टियों, स्लाइड्स, मूवीज, स्वर रिकार्डिंग उपकरण, पोस्टर्स, चाटर्स टेलिविजन कैमरे को शामिल किया जाता है। इसके द्वारा प्रशिक्षण प्रविधि को प्रभावशाली रुचिकर और लाभप्रद बनाया जा सकता है।
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