विक्रय प्रदेश की स्थापना की प्रक्रिया - Process of setting up sales territory

विक्रय प्रदेश की स्थापना की प्रक्रिया - Process of setting up sales territory


विक्रय प्रदेशों की स्थापना करने के लिए एक क्रमबद्ध प्रक्रिया अपनानी होती है इस प्रक्रिया में निम्नलिखित कदम उठाने होते है


1. आधारभूत इकाइयों का चयन आधारभूत इकाइयाँ विक्रय प्रदेशों का सबसे छोटा हिस्सा होती है। इसको मिलाकर ही विक्रय प्रदेश का निर्माण होता है। विक्रय प्रदेश की स्थापना करने में उपयुक्त आधारभूत इकाइयों का चयन एक महत्वपूर्ण कदम है। इनका चयन करते समय ये ध्यान रखा जाना चाहिए कि ये इकाइयाँ प्रबन्धकीय आकार वाली हो ताकि ये मितव्ययिता से कवर की जा सके। इसका एक रूप होना भी आवश्यक है, यद्यपि इनके भौगोलिक आकार में सामान्यतः परिवर्तन नही होते है। एक संस्था आधारभूत इकाइयों के रूप में देश, राज्य, जिले या व्यापार क्षेत्र का चयन कर सकती है।


2. बुनियादी इकाइयों में विद्यमान विक्रय सम्भावनाओं का निर्धारण बुनियादी इकाइयों की विक्रय सम्भावनाओं का पता लगाना विक्रय प्रदेश की स्थापना का दूसरा महत्वपूर्ण कदम है। इसके लिए प्रबन्धकों को बुनियादी इकाइयों के वर्तमान एवं भावी ग्राहकों की पहचान करके सम्भावित बिक्री का पूर्वानुमान करना होता है। प्रत्येक बुनियादी इकाई एक विशिष्ट भौगोलिक बाजार खण्ड होती है। इसमें रहने वाले ग्राहको की पहचान करने के लिए विभिन्न प्रकार की सूचनाओं जैसे ग्राहको का लिंग, आयु, वर्ग, प्रकृति, रुचियां क्रय शक्ति आवश्यकताओं आदि का संकलन करना होता है। उपभोक्ता वस्तुओं की दशा में उपभोक्ताओं की संख्या अधिक होने के कारण उनसे प्रत्यक्ष सम्पर्क कर पाना सम्भव नही होता। किन्तु औद्योगिक वस्तुओं के विक्रय की दशा में क्रेताओं से प्रत्यक्ष सम्पर्क करके आवश्यक जानकारी प्राप्त की जा सकती है।


3. विक्रय प्रदेशों का अस्थायी निर्धारण विक्रय सम्भावना को निश्चित कर लेने के बाद संस्था के सम्पूर्ण बाजार को प्रारम्भिक तौर पर अलग-अलग प्रदेशों में बाँटने का कार्य किया जाता है ताकि विक्रय प्रदेश की संख्या, विक्रयकर्ताओं की संख्या, आवश्यक शाखाओं तथा मध्यस्थो की संख्या आदि को प्रारंभिक रूप में ज्ञात किया जा सके। इस अस्थायी निर्धारण के आधार पर ही प्रबन्धक स्थायी प्रदेशों की स्थापना की तैयारी करते है, आवश्यक विक्रयकर्ता मध्यस्थ नियुक्त करते है तथा साधन सुविधायें जुटाने की योजना बनाते है।


4. बुनियादी इकाइयों का प्रायोगिक विक्रय प्रदेश में संयोजन - प्रत्येक इकाई की विक्रय सम्भावना एवं विक्रय कवरेज का निर्धारण करने के पश्चात नियोजनकर्ता को इस चरण में प्रायोगिक विक्रय प्रदेशों की स्थापना करनी होती है।

इसके लिए उन बुनियादी इकाइयों को मिलाकर प्रायोगिक विक्रय प्रदेश स्थापित किये जाते है जो विक्रय सम्भावनाओं को भावी बिक्री में बदलने की क्षमता रखती है। इस चरण में विक्रय प्रदेशों का निर्माण प्रायोगिक तौर पर किया जाता है जिनमें बाजार कवरेज की समस्या को ध्यान में रखते हुए भविष्य में समायोजन किये जा सकते है। सामान्यतः यह ध्यान रखा जाता है कि इन प्रदेशों की बिक्री सम्भावनायें समान हो। प्रायोगिक विक्रय प्रदेशों के निर्धारण में प्राय: निकटस्थ नियन्त्रण इकाइयों का समूहीकरण किया जाता है।


5. प्रायोगिक विक्रय प्रदेशों का समायोजन एवं पुर्नवितरण –

इस चरण में प्रायोगिक विक्रय प्रदेशों में - आवश्यक समायोजन एवं उनका पुर्नवितरण करके उन्हें अन्तिम रूप दिया जाता है। प्रायोगिक बिक्री प्रदेशो की बिक्री सम्भावनाओं तथा कवरेज कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए उनके आकार एवं आकृति में परिवर्तन किया जाता है। सवोत्तम प्रादेशिक व्यवस्था की प्रप्ति के लिए विक्रय प्रदेशों की स्थापना इस प्रकार की जानी चाहिए कि सभी प्रदेशों में अभिवृत्ति बिक्री का व्यय समान हो।


6. बिक्री कर्मचारियो को विक्रय प्रदेशों का कार्य भार सौंपना विक्रय प्रदेशों का स्वरूप निर्धारित हो जाने के बाद प्रदेश के आवश्यकता के अनुरूप उचित विक्रय कर्ताओं की नियुक्ति की जाती है तथा उन्हें उपयुक्त विक्रय प्रदेश का कार्य भार सौप दिया जाता है।