बिलों की पुनर्कटौती - rediscount of bills

बिलों की पुनर्कटौती - rediscount of bills


वस्तुओं की बिक्री के सन्दर्भ में कोई विनिमय बिल उस समय उत्पन्न होता है जब कोई क्रेता इसका भुगतान कुछ समय बाद (जैसे कि इन वस्तुओं की पुनर्बिक्री के बाद) करना चाहता हैं और उसका बिक्रेता इसका भुगतान पहले प्राप्त करना चाहता है। ऐसी स्थिति में क्रेता (या आदेशक) एक निश्चित परिपक्वता अवधि का बिल बिक्रेता (यचा आदेशिती) पर जारी कर देता है और इसे बिक्रेता को भेज देता है। क्रेता उस बिल को या तो पृष्ठांकित कर देता है या स्वीकार कर लेता हैं। इसका अर्थ है कि क्रेता उस बिल का भुगतान करने को तैयार है, या बिल में अंकित भावी तिथि को इसका भुगतान कर देगा। यह बिल पृष्ठांकनोपरान्त बिक्रेता को वापस भेज दिया जाता है।

बिक्रेता इस बिल का भुगतान जल्दी से जल्दी प्राप्त करना चाहता है, इसलिए वह इस स्वीकृत बिल को अपने बैंकों को प्रस्तुतकर वहाँ से इसका भुगतान प्राप्त कर लेता है। वास्तविक तौर पर बैंक बिक्रेता से इस प्रकार के बिल में दर्शायी गयी कीमत से कुछ कम कीमत पर क्रय कर लेता है (वह कीमत जिसे क्रेता भावी तिथि को भुगतान करने के लिए सहमत हो गया है)। यह प्रक्रिया बैंक द्वारा बिलों की कटौती कहलाती है। बैंक को इस प्रकार के बिलों का भुगतान वास्तविक क्रेता द्वार सहमत हुई भावी तिथि को प्राप्त हो जाता है। बैंक को बिल की धनराशि तथा क्रेता को भुगतान की गयी धनराशि का अन्तर प्राप्त हो जाता है जो बैंक की आय है जबकि बिक्रेता के लिए यह अन्तर उसकी लागत है। इस मामले में कटौती करने वाला यह सुनिश्चित कर लेता है

कि उसे इस बिल का भुगतान निर्धारित तिथि को अवश्य प्राप्त हो जाय ( इसके लिए बैंक क्रेता के बैंक के साथ मिलकर बिक्रेता से संपार्श्विक जमानत प्राप्त करके रखता है) । चूँकि विनिमय बिल हस्तान्तरणीय उपकरण है इसलिए बैंक इन्हें किसी तीसरे पक्ष को बेच सकता है। (अन्य बैंक) कोई बैंक इस प्रकार के बिलों को केन्द्रीय बैंक से पुनर्कटौती करा कर उधार देने के लिए निधियाँ प्राप्त कर सकता है। सामान्य तौर पर यह पुनर्कटौती बैंक दर पर की जाती है। ये बिल अन्तर्देशीय (भारत में आहरित किए जाने वाले एवं भुगतान योग्य) हो सकते हैं या विदेशी (भारत से बाहरित किए जाने वाले तथा भारत में या भारत के बाहर भुगतान योग्य)

बिलों को माँग बिल (जबकि बिलों का भुगतान क्रेताओं द्वारा उन्हें प्राप्त होते ही किया जाता है) या सावधि बिल (जब बिलों का भुगतान किसी आगे की तिथि को किया जाना संभव हो) प्रकार के हो सकते है।


भारत में, यद्यपि बैंक बड़ी मात्रा में नियमित रूप से बिलों की कटौती करते हैं, तथापि इन बिलों की पुनर्कटौती के द्वितीय बाजार की कमी है। पहले भारतीय रिजर्व बैंक इन बिलों की पुनर्कटौती करके वाणिज्यिक बैंकोंको, उनकी माँग के अनुरूप, निधियाँ उपलब्ध कराता था लेकिन अस्सी के दशक के बाद से यह व्यवस्था बन्द सी कर दी गयी है।