पारिश्रमिक भुगतान की पद्धतियाँ - Remuneration Payment Methods
पारिश्रमिक भुगतान की पद्धतियाँ - Remuneration Payment Methods
विक्रेताओं के लिए पारिश्रमिक भुगतान की अनेक पद्धतियाँ प्रचालित है। ये पद्धतियाँ निम्नलिखित है। 1. केवल वेतन पद्धति- इस पद्धति में विक्रेताओं को एक निश्चित समय पर एक निश्चित धन राशि वेतन के रूप में दी जाती है। इस राशि का भुगतान साप्ताहिक, पाक्षिक अथवा मासिक आधार पर किया जाता है। पारिश्रमिक भुगतान की यह सर्वाधिक प्रचलित विधि है। हमारे देश में विक्रेताओं को मासिक आधार पर भुगतान किया जाता है। जबकि अमेरिका तथा अन्य देशों में साप्ताहिक आधार पर भुगतान किया जाता है। इस पद्धति के अन्तर्गत विक्रेताओं को निम्नलिखित तीन प्रकार से भुगतान किया जा सकता है।
1. निश्चित वेतन पद्धति- इसमें विक्रेताओं को एक निश्चित समय के उपरान्त एक निश्चित वेतन दिया जाता है जिसमें कोई परिवर्तन नही होता है। यह विधि बहुत कम प्रचलन में है।
2. वेतन एवं वृद्धि विधि - इस विधि के अनुसार विक्रेताओं की नियुक्ति एक निश्चित वेतन श्रृंखला में की जाती हैं जिसमें विक्रेताओं को प्रतिवर्ष एक निश्चित वेतन वृद्धि प्राप्त होती है।
3. वेतन एवं भत्ता विधि इस विधि में विक्रेताओं को एक निश्चित वेतन के साथ-साथ विभिन्न व्ययों जैसे-यात्रा, भोजन, चिकित्सा आदि व्ययो को जो उसने अपने कार्य के दौरान किये है के लिए का भुगतान किया जाता है। ये भत्ते एक सीमा तक निश्चित भी किये जा सकते है।
2. केवल कमीशन पद्धति यह पारिश्रमिक प्रदान करने की यह ऐसी पद्धति है
जिसमें पारिश्रमिक का भुगतान निश्चित समय के आधार पर न करके विक्रयकर्ताओ के द्वारा प्राप्त कुल क्रयादेश के आधार पर किया जाता है। यह पद्धति वेतन विधि के ठीक विपरीत है जिसमें विक्रेता द्वारा उपलब्ध किये गये परिणामों के आधारों पर पारिश्रमिक का भुगतान किया जाता है। अतः विक्रेता जितना कार्य करेगा।
उसका पारिश्रमिक उतना अधिक होगा। यह पारिश्रमिक ही कमीशन कहलाता है। तथा इसके साथ विक्रेता द्वारा किये गये विभिन्न व्ययों, जैसे यात्रा, प्रवास आदि का भी भुगतान किया जा सकता है। कमीशन प्राय: निम्न दो आधारों पर दिया जा सकता है।
1. स्थिर आधार पर कमीशन इसमें विक्रय की सम्पूर्ण मात्रा पर कमीशन को दर स्थिर रहती है
अर्थात चाहे विक्रयकर्ता अपने निश्चित अभ्यंश से कम विक्री करे या अधिक लेकिन उसे कमीशन का भुगतान एक ही दर से किया जाता है।
2. प्रगतिशील आधार पर कमीशन इस पद्धति में विक्रय की अलग-अलग मात्रा के अनुसार कमीशन की दरें भी भिन्न-भिन्न होती है। इसमें विक्रय को विभिन्न वर्गों में बांट दिया जाता है एवं उनकी कमीशन दरें भी अलग-अलग होती है। इस प्रकार अधिक विक्रय करने वाले विक्रेता को अधिक कमीशन दिया जाता है तथा कम विक्रय वाले विक्रेता को कम कमीशन प्रदान किया जाता है। भारत में विभिन्न संस्थाओं जैसे-जीवन बीमा निगम, औषधि निर्माण संस्थाओं में आदि में ये पद्धति को अपनाया जाता है।
3. वेतन तथा कमीशन पद्धति इस पद्धति के अनुसार विक्रेताओं को निश्चित वेतन के साथ-साथ कमीशन का भी भुगतान किया जाता है। यह केवल वेतन' - 'केवल कमीशन' दोनों योजनाओं का मिश्रण है। इस लिए इस पद्धति को 'संयुक्त मिश्रण' पद्धति भी कहा जाता है। इस पद्धति में विक्रेताओं को निश्चित वेतन की राशि तय की जाती है जो उन्हें प्रति माह मिलती है। इसका साथ ही कमीशन की दरे भी विक्रेताओं के लिए निर्धारित की जाती है। ये दरे बिक्री की मात्रा से सम्बद्ध होती है। इस प्रकार निश्चित वेतन विक्रेताओं को आर्थिक सुरक्षा प्राप्त हो जाती है तथा कमीशन उन्हें अधिक से अधिक विक्रय करने की प्रेरणा देता है। इस पद्धति में पारिश्रमिक को समय और निष्पादन
दोनों से जोड़ दिया जाता है इसमें विक्रेताओं को उपयुक्त आय और प्रेरणा दोनों ही प्राप्त हो जाते है।
4. आहरण लेखा एवं कमीशन पद्धति यह पद्धति 'सीधी कमीशन पद्धति' का ही एक संशोधित रूप है। इसमें संस्था द्वारा प्रत्येक विक्रयकर्ता का एक अहरण खाता खोल दिया जाता है इसमें विक्रेता द्वारा अर्जित कमीशन क्रेडिट कर दिया जाता है। इस खाते से विक्रेता को जब भी आग्रेम राशि जरुरत होती है दे दी जाती तथा उसके खाते में डेबिट कर दी जाती है। ऐसी निकाली जाने वाली धन राशि को 'गारण्टोड आहरण राशि कहा जाता है। विक्रेता को अहरण खाते से एक निश्चित राशि निकालने का ही अधिकार होता है और विक्रेता द्वारा ली गई अग्रिम राशि आहरण खाते में क्रेडिट शेष से स्वतः करती जाती है और पारिश्रमिक का शेष विक्रेता को मिल जाता है।
इस पद्धति के विकास के पीछे मूल भावना यह थी कि विक्रेता को अपनी आवश्यकताओं को पूर्ति के लिए अग्रिम धन राशि की जरुरत पड़ती ही है।
अतः विक्रेता की इस अग्रिम राशि के सम्बन्ध के लिए यह आहरण खाता खोल दिया जाता है। इसमें से दी राशि को अल्पावधि का ऋण मान किया जाता है जिसका अर्जित कमीशन के साथ समायोजन होता है।
5. लाभ भागिता पद्धति – पारिश्रमिक भुगतान की यह विधि अपन आप में सम्पूर्ण पद्धति नही है। बल्कि एक पूरक पद्धति है जिसका प्रयोग किसी अन्य पद्धति नही है। बल्कि एक पूरक पद्धति है जिसका प्रयोग किसी अन्य पद्धति के साथ ही किया जा सकता है। यह प्रेरणात्मक विधि है इसके अन्तर्गत प्रत्येक विक्रयकर्त को संस्था के लाभो में से एक हिस्सा पारिश्रमिक के रूप में दिया जाता है। यह लाभ प्रत्येक वर्ष के अन्त में कुल लाभो के एक निश्चित प्रतिशत के आधार पर अथवा क्षेत्रीय विक्रय के आधार पर अथवा वार्षिक विक्रय के आधार पर दिया जाता है।
6. विशिष्ट पारिश्रमिक पद्धति - इस पद्धति में विशिष्ट कार्यों को करने के लिए विशिष्ट पारिश्रमिक का भुगतान किया जाता है। विशिष्ट कार्य प्रतिदिन के सामान्य कार्यों के अतिरिक्त होते हैं उदाहरण के लिए विक्रेता से नये ग्राहकों की खोज, विक्रय संवर्द्धन, जन सम्पर्क, शिकायतो का समाधान, बाजार अनसुंधान, बकाया राशि की वसूली तथा अन्य किसी विशिष्ट विक्रय कार्यों का सम्पादन करवाने के लिए विशिष्ट पारिश्रमिक के भुगतान का पारस्परिक समझौता किया जा सकता है। विशिष्ट कार्य को करने के लिए अस्थायी विक्रेताओं को रखा जा सकता है अथवा स्थायी विक्रेताओं से ही अतिरिक्त समय से ये कार्य करवाये जा सकते है। इन कार्यों के लिए उन्हें भिन्न दर से पारिश्रमिक दिया जाता है।
7. बोनस पद्धति – बोनस प्रायः उन कार्यों के निष्पादन के लिए दिया जाता है
जिसके लिए विक्रेताओं को किसी प्रकार का पारिश्रमिक व कमीशन प्राप्त नही होता है। ऐसे कार्यों में गैर-विक्रय कार्य, जैसे लाभप्रद विक्रय विचार प्रस्तुत करना, ग्राहकों के हितों की रक्षा करना, संस्था की छवि में सुधार करना, अतिशीघ्र प्रतिवेदन प्रस्तुत करना, कोई उपयोगी सुझाव देना, ख्याति निर्माण करना आदि सम्मिलित किया जाता है। इसके अतिरिक्त बोनस ऐसे विक्रेताओं को भी दिया जा सकता है जिनके ग्राहक आदेशों की संख्या अधिकतम हो अथवा जिनके विरुद्ध ग्राहकों की शिकायते बहुत कम हो। बोनस की राशि एवं समयाविधि के निर्णय भी अत्यन्त महत्वपूर्ण होते है। सामान्यतः संस्था द्वारा बोनस तब दिया जाता है जबकि संस्था में अत्यधिक लाभ हुआ हो। इसी प्रकार बोनस की घोषणा प्रायः होली, दिवाली या नव वर्ष के अवसर पर की जाती है।
8 अन्य पद्धतियाँ पारिश्रमिक भुगतान की अन्य प्रमुख विधियाँ निम्निलिखित है।
1. अभ्यंश पद्धति यह पद्धति वेतन एवं कमीशन पद्धति का ही एक संशोधित रूप है। इसमें प्रत्येक विक्रेता के लिए विक्रय क्षेत्र तथा एक निश्चित अवधि में विक्रय की मात्रा निर्धारित कर दी जाती है जिसे विक्रय अभ्यंश कहा जाता है। इस पद्धति में विक्रेता को निश्चित वेतन के साथ-साथ कमीशन भी दिया जाता है किन्तु विक्रेता को ऐसा कमीशन तभी दिया जाता है जबकि वह निर्धारित अभ्यंश के बराबर माल का विक्रय कर लेता है।
2. अनुषंगी लाभ विधि इस पद्धति में विक्रेता को उसके सेवा काल तथा सेवा निवृत्ति के पश्चात् विभिन्न वांछित सुविधाये प्रदान की जाती है जिन्हें अनुषंगी लाभ' कहा जाता है। इन सुविधाओं में मुख्य रूप से पेशन, अवकाश वेतन, बीमा, बोनस, बिमारी लाभ, भविष्य निधि, मकान भत्ता, गेच्युटी, प्रशिक्षण शिक्षा, यात्रा भत्ता, मनोरंजन, पुस्तकालय आदि को सम्मिलित किया जाता है।
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