पुनर्खरीद विकल्प/प्रति पुनर्खरीद विकल्प (रेपो / रिवर्स रेपो) - Repurchase Option / Repurchase Option (Repo / Reverse Repo)
पुनर्खरीद विकल्प/प्रति पुनर्खरीद विकल्प (रेपो / रिवर्स रेपो) - Repurchase Option / Repurchase Option (Repo / Reverse Repo)
पुनर्खरीद विकल्पों-रेपों (जिन्हें तात्कालिक अग्रिम संविदाएं भी कहा जाता है) लेन-देन में कोई एक पक्ष निधियों को एक निश्चित अवधि के लिए (जिसे रेपो अवधि कहा जाता है) किसी संपार्श्विक विशिष्ट प्रतिभूति के विरूद्ध पूर्व-निर्धारित दर ( रेपो दर) पर उधार लेता है। यद्यपि इसका प्राथमिक उद्देश्य निधियों को उधार लेना होता है तथापि प्रतिभूतियों का विधिक स्वामित्व भी बदल जाता है। इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि प्रथम पक्ष प्रतिभूतियाँ दूसरे पक्ष को बेच देता है, साथ ही इन्हीं प्रतिभूतियों को किसी अग्रिम तिथि को पूर्व निर्धारित दर पर फिर से खरीद लेने के लिए भी स्वीकृति दे देता है।
इसको परिणामस्वरूप प्रतिभूतियाँ बेचने वाले पहले पक्षकार को प्रभूतियाँ बेचने तथा इनकी पुनर्खरीद की तिथि तक की अवधि के लिए निधियाँ प्राप्त हो जाती हैं।
इसी प्रकार, कोई पक्ष जो अस्थाई रूप से अतिरेक नकदी को निवेश करना चाहता हैं, या प्रतिभूतियों की मात्रा को बढ़ाना चाहता है (संविधिक तरलता अनुपात की वचनबद्धता पूरी करने के लिए वाणिज्य बैंक), उपर्युक्त के ठीक विपरीत प्रकार का लेन-देन दूसरे पक्षकार के साथ करता है जिसके तहत वह दूसरे पक्ष से प्रतिभूतियों का क्रय करता है तथा उन्हें पूर्व निर्धारित दर पर पहले से रिवर्स रेपों कहा जाता है।
दूसरे शब्दों में प्रतिभूतियाँ बेचने वाले की दृष्टि से ऐसे सौदे रेपो सौदे हैं, जबकि प्रतिभूतियाँ खरीदने वाले की दृष्टि से ये रविस रेपो सौदे हैं। कोई लेन-देन रेपो या रिवर्स रेपों में से किस प्रकार का है यह बात पर निर्भर करता है कि इसकी शुरूआत किसने की है। सुनिश्चित तौर पर वर्ततमान में बेची गयी तथा आगे की तिथि को खरीदी जा सकने वाली प्रतिभूतियों की संपार्श्विक जमानत पर उधार लेने की एक विधि रेपो है जबकि रिवर्स रेपो वर्तमान में खरीदी जाने वाली तथा आगे की तिथि को बेची जाने वाली प्रतिभूतियों की विधि प्रति रेपो उधार देने की एक विधि है।
भारत में, रिर्जव बैंके के अलावा, केवल अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक को छोड़कर) एवं प्राथमिक डीलर ही रेपो / प्रति-रेपो कारोबार में भाग ले सकते हैं।
गैर-बैंकिंग प्रतिभागी (जैसे कि वित्ती संस्थान) केवल अर्ह प्रतिभागियों को प्रति रेपो के माध्यम से निधियाँ उधार दे सकते हैं। रेपों बाजार को बड़े आधार वाला बनाने के लिए भारतीय स्टॉक एक्सचेंजों में सूचीबद्ध कम्पनियों को अप्रैल 2005 से अपनी अतिरेक नकदी रेपों बाजार में
उधार देने की अनुमति प्रदान कर दी गयी है। रेपो लेन-देन की अधिकृत प्रतभूतियों में केन्द्र एवं राज्य सरकारों की प्रतिभूतियाँ तथा कोषागार हुण्डियाँ हैं।
अल्पकालीन तरलता (नकदी) को अवशोषित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक एक निश्चित दर पर रात भर (एक दिन) के लिए रेपो नीलामी करता है।
इसका अर्थ यह हुआ कि भारतीय रिजर्व बैंक उतनी प्रतिभूतयाँ बेचने को तैयार हैं, जितनी की माँग एक निश्चित दर प्रतिभागियों द्वारा की जाती हैं। सुनिश्चित रेपो दर इस दृष्टि से निश्चित मानी जाती है कि अल्प कालीन तरलता की माँग पूर्ति दशाओं के अनुसार इसमें नैत्यिक आधार पर परिवर्तन नहीं होता, जैसा कि परिवर्तनशील दर रेपो नीलामी में होता है। सुनिश्चित रेपो पद में जो भी परिवर्तन होता है वह वार्षिक मौद्रिक एवं साख नीति अथवा मौद्रिक एवं साख नीति के अर्द्धवार्षिक पुनरीक्षण में ही होता है। सरकारी प्रतिभूतियों के रेपो नीलामी (बहु कीमत नीलामी या परिवर्तनशील दर रेपो) दिसम्बर 1992 में प्रारम्भ की गयी थी।
प्रारम्भ में रेपो लेन-देन एक या दो दिन की अवधि के लिए किए जाते थे। बाद में ये 14 दिन की अवधि के लिए भी होने लगे। कठोर तरलता दशाओं के चलते बाजार में माँग में कमी हो जाने पर इन्हें सन् 1995 के प्रारम्भ में रोक दिया गया। रेपो लेन-देन सन् 1997 के प्रारम्भ में फिर से प्रारम्भ किए गए लेकिन अब इनका अवधि चक्र 3 से 4 दिन तक का था। 3 से 4 दिन की अवधि वाली स्थिर दर रेपो (सार्वभौमिक कीमत नीलामी) नवम्बर 1997 में प्रारभ की गयी। भारतीय रिजर्व बैंक स्थिर दर रेपो की नीलामी 7 से 14 दिन तक की अवधि के लिए करता है। साथ रात पर के लिए परिवर्तनीय दर नीलामी भी इसी के द्वारा की जाती है। 1 नवम्बर 2004 से 7 से 14 दिन की अवधि वाली स्थिर दर रेपो नीलामी तथा रात भर की परिवर्तनीय दर नीलामी बन्द कर दी गयी है, तथापि इसे फिर से प्रारम्भ करने का अधिकार भारतीय रिजर्व बैंक के पास सुरक्षित है।
यदि परिस्थितियों के अनुसार ऐसा करना आवश्यक हो जाए तो। वर्तमान में, स्थिर दर रेपो तथा प्रति-रेपो नीलामी भारतीय रिजर्व बैंक द्वार दैनिक आधार पर (शनिवार, रविवार एवं अन्य सार्वजनिक अवकाशो को छोड़कर) एक दिन की अवधि के लिए की जाती है।
मौद्रिक प्रणाली में तरलता बढ़ाने के लिए, भारतीय रिजर्व बैंक प्रति- रेपो की नीलामी रेपो दर से ऊँची स्थिर दर पर करता है। प्रति रेपो दर इस दृष्टि से रेपो दर से सम्बद्ध होती है कि इसकी दर रेपो दर से एक निश्चित प्रतिशतांक ही अधिक होती है। स्थिर रेपो दर अक्टूबर 27, 2004 से 4.50 प्रतशत से बढ़ाकर 4.75 प्रतिशत कर दी गयी तथा रेपो दर एवं प्रति रेपो दर के बीच का अनतराल 150 आधार बिन्दु (100 आधार बिन्दु | प्रतिशत ) से घटाकर 125 आधार बिन्दु कर दिया गया।
बढ़ती हुई मुद्रा स्फीति अनुशंसाओं को देखते हुए स्थिर रेपो दर 29 अप्रैल, 2005 से बढ़कर 5 प्रतिशत कर दी गयी तथा प्रति रेपो दर 6 प्रतिशत के स्तर पर ही बनी रही। इस प्रकार इन दोनों के बीच अन्तर 100 आधार बन्दु का बना रहा। चालू वर्ष 2006-07 की पहली त्रैमासिक समीक्षा में रेपो दर 7.0 प्रतिशत तथा प्रति रेपो दर 6.0 प्रतिशत कर दी गयी। 31 अक्टूबर 2006 से प्रभावी रेपो दर 7.25 प्रतिशत है जबकि प्रति रेपो दर 6.0 प्रतिशत के स्तर पर ही स्थिर बनी हुई है। रेपो / रिवर्स रेपो लेन-देन भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मौद्रिक नीति को लागू करने के लिए किए जाते हैं। अर्ह प्रतिभागी भी बाजार निर्धारित दरों पर आपस में रेपो लेन-देन करने लिए स्वतंत्र हैं।
तथापि, वर्तमान में भारतीय रिजर्व बैंक द्वार निर्धारित स्थिर रेपो दर की मौजूदगी में, बाजारी रेपो दर स्थिर रेपोदर से बहुत अधिक आगे-पीछे नहीं रहती है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जिस रूप में रेपो एवं रिवर्स रेपो को ऊपर परिभाषित किया गया है वह अन्तरराष्ट्रीय प्रवृत्ति का ठीक उल्टा है। भारतीय सन्दर्भ में जिसे रेपो कहा जाता है, अन्तरराष्ट्रीय लेन-दने उसे रिवर्स रेपो माना जाता है और भारत में जिसे रिवर्स रेपो माना जाता है उसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर रेपो कहा जाता है। तेजी से बढ़ते वैश्वीकरण के दौरे में इससे भ्रम उत्पन्न हो सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए 27 अक्टूबर 2004 से भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो एवं रिवर्स रेपो की परिभाषाओं को बदल कर उन्हें अन्तरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कर लिया है। लेकिन इस इकाई में पूरा विवरण पुरानी भारतीय परिभाषा के अनुसार ही है।
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