विक्रय-शक्ति नियन्त्रण की प्रक्रिया - sales force control
विक्रय-शक्ति नियन्त्रण की प्रक्रिया - sales force control
स्टिल, केडिफ एवं गोवोनी के अनुसार विक्रय शक्ति नियन्त्रण की प्रक्रिया को निम्न चार चरणों में विभाजित किया जाता है। जो इस प्रकार है
1. निष्पादन प्रमापो की स्थापना प्रमाप ऐसे मापदण्ड है जिनके आधार पर वास्तविक कार्य की जाँच की जाती है। प्रमापों का निर्धारण नियन्त्रण प्रक्रिया का प्रारम्भिक चरण होता है। यह विक्रय विभाग का दायित्व होता है कि वह विक्रेताओं की क्रियाओं पर नियन्त्रण करने के लिए व्यवहारिक एवं प्रेरक प्रमापो को स्थापना करे प्रमापों के निर्धारण के समय निम्न बातों पर विचार किया जाना चाहिए।
1. विक्रेता के कार्यों, योग्यताओं, अधिकारों, कर्तव्यों आदि का ध्यान करके विक्रय प्रमाप निर्धारित किये जाने चाहिए।
2. बाजारों की स्थिति उसमें विक्री की सम्भावनाओं, प्रतियोगिताओं के स्तर आदि को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
2. वास्तविक निष्पादन का मापन इस चरण में विक्रय प्रबन्धक यह मासूम करते है कि विक्रेताओं ने अपने सौपे गये कार्यों को कहाँ तक पूरा किया है तथा किस रूप में पूरा किया है। विक्रेताओं के कार्य के प्रगति का मापन विभिन्न सूचनाओं के आधार पर किया जाता है जैसे आन्तरिक विक्री, व्यय लेखो तथा विभिन्न प्रतिवेदनों के द्वारा।
3. प्रमापो के साथ वास्तविक निष्पादन की तुलना करना – इस चरण में विक्रेता के निष्पादन का मूल्यांकन होता है। इस चरण का उद्देश्य विक्रेता के वास्तविक कार्यों का प्रमाप से विचलन की मात्रा ज्ञात करना है।
यदि विक्रेता का कार्य-निष्पादन निर्धारित प्रमापपों के आधार पर होता है तो उसका कार्य सन्तोषजनक है। यदि विक्रेता का कार्य निष्पादन निर्धारित प्रमापो के आधार पर नही है तो उसकर कार्य सन्तोष जनक नही है और उसमें सुधार करने की जरुरत है।
4. सुधारात्मक कार्यवाही करना इस प्रक्रिया के अन्तर्गत विक्रय प्रबन्धक को सुधारात्मक कार्यवाही करने अथवा न करने का निर्णय लेना होता है। यदि विक्रेता का कार्य निष्पादन निर्धारित प्रमापों के अनुसार होता है तो विक्रय प्रबन्धक को कोई कार्यवाही करने की आवश्यकता नही होती है यदि वास्तविक निष्पादन प्रमापो के अनुसार नही है
तो विक्रय प्रबन्धक को सुधारात्मक कार्यवाही करनी होती है। यह कार्यवाही निम्न प्रकार से की जा सकती है।
1. उद्देश्य प्राप्ति के प्रयासो को बढ़ाकर निष्पादन के प्रमापो के अनुसार समायोजित करना।
2. विक्रय लक्ष्यों को कुशलतापूर्वक प्राप्त किया जा सके इसके लिए निर्धारित की गई नीतियों, व्यूहरचनाओं तथा योजनाओं में संशोधन करना।
3. मूल्यांकन आधारों व लक्ष्यों में संशोधन करके उन्हें अधिक व्यवहारिक करना।
वार्तालाप में शामिल हों