विक्रय कोटा की सीमायें - Sales Quota Limits

विक्रय कोटा की सीमायें - Sales Quota Limits


विक्रय कोटा के संबन्ध में कुछ विद्वानों का मत है कि इसका उपयोग सीमित मात्रा में किया जाना चाहिए। इस सन्दर्भ में कोटा प्रणाली की आलोचना इस आधार पर की जा सकती है।


1. इसके ग्राहक के पास आवश्यकता से अधिक वस्तु जमा हो जाती है और उस पर काफी दबाब डालकर विक्रय किया जाता है।


2. दूसरे साधारणतया यह देखा जाता है कि कोटे का निर्धारण किसी विपणन अनुसंधान के आधार पर न करके मनमाने ढंग से किया जाता है जो या तो अधिक या कम होते है जो विक्रयकर्ता व संस्था दोनो के लिए अनुचित है।


3. सही कोटा निर्धारित करना असम्भव है। इसका कारण यह कि बहुत सी बाते ऐसी है जो कभी भी स्थिर नही रहती जैसे सरकारी कर, प्रतियोगिता, मौसम, हड़ताले व तालाबन्दी, स्टाइल में परिवर्तन आदि। यह सभी वह घटक है जो वस्तु के विक्रय को प्रभावित करते हैं जबकि कोटा इन सबमे स्थिरता को मानकर चलता है। आजकल इस सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि आधुनिक उन्नत सांख्यिकी व बाजार विश्लेषण तकनीकि से इन सभी बातो को ध्यान में रखकर कोटा निर्धारित किया जाता है। जो वास्तविकता से मेल खा सकता है।


कुल बिक्री के भावी अनुमान को विक्रयकर्ताओं, डीलर, शाखाओं, क्षेत्रों, आदि को किस प्रकार बांटा जाय ? इसके बांटने के निम्न तरीके हैं


1. सबसे सरल व आसान तरीका यह है कि जिस दर से भावी बिक्री का अनुमान संस्था ने लगाया है उसी दर से उस क्षेत्र, विक्रेता, विक्रयकर्ता, आदि की गत वर्ष की बिक्री में वृद्धि करके नया कोटा निर्धारित कर दिया जाय। उदाहरण के लिए यदि संस्था ने अपनी कुल बिक्री में 20 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया है तो विक्रयकर्ता, शाखा, वितरक, आदि की गत वर्ष की बिक्री को आधार मानकर उसमें 20 प्रतिशत से वृद्धि करके नया कोटा निर्धारित कर दिया जायेगा। यह तरीका अधिक अच्छा प्रतीत नहीं होता है। इसका कारण यह है कि इसमें आर्थिक, सामाजिक व अन्य परिवर्तनों को ध्यान में नहीं रखा जाता है।


2. विक्रय का कोटा निर्धारित करने का यह दूसरा तरीका है। इसमें सबसे पहले उस सम्बन्धित वर्ष के लिए सम्पूर्ण बिक्री का अनुमान लगाया जाता है, फिर यह पता लगाया जाता है

कि गत वर्ष में उद्योग की कुल बिक्री का कितना प्रतिशत सम्बन्धित क्षेत्र में बिका। इसके बाद भावी विक्रय अनुमान में उसी प्रतिशत का गुणा करके जो फल आता है उसे उस क्षेत्र के कोटे के रूप में निर्धारित कर दिया जाता है। यह इस बात पर आधारित है कि किसी क्षेत्र में गत वर्ष में जितने प्रतिशत बिक्री हुई है उसमें अगले वर्ष कोई अन्तर नहीं पड़ेगा और उतने ही प्रतिशत बिक्री अगले वर्ष भी हो जायेगी। इस प्रकार यह तरीका भी गत वर्ष की बिक्री पर आधारित है। इसमें यह अवगुण है कि भावी प्रतियोगिता व अन्य परिवर्तनशील बातों को ध्यान में नहीं रखा जाता है।


3. विक्रय कोटा निर्धारित करने का एक तरीका यह भी है कि जिसमें पहले संस्था की कुल बिक्री का अनुमान लगाया जाता है और फिर उस कुल बिक्री को गत वर्ष की कुल बिक्री का जितना प्रतिशत क्षेत्र में बिका है

उसके आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में बांटकर कोटा निर्धारित कर दिया जाता है। यह तरीका ऊपर वाले तरीके जैसा ही है अन्तर सिर्फ इतना है कि दोनों के कोटे निर्धारित करने के आधार अलग-अलग हैं। पहले वाले में आधार सम्बन्धित क्षेत्र में उद्योग की बिक्री का प्रतिशत है जबकि दूसरे में संस्था की कुल बिक्री का आधार । यह बात दोनों में ही पायी जाती है कि पिछली बिक्री को आधार मानकर ही कोटा निर्धारित करते हैं। अतः इस तरीके में भी वही अवगुण हैं कि इसमें भावी प्रतियोगिता व अन्य परिवर्तनशील बातों को ध्यान में नहीं रखा जाता है।


4. कोटा निर्धारित करने का यह चौथा व अन्तिम तरीका है जिसमें विभिन्न सूचनाएं एकत्रित की जाती हैं और उनका सहसम्बन्ध ज्ञात किया जाता है। इसके लिए उन घटकों को चुना जा रहा है जो संस्था की बिक्री से सहसम्बन्ध रखते हैं और फिर उनके आधार पर एक अनुक्रमांक बना दिया जाता है। इस अनुक्रमांक के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों का कोटा निर्धारित कर दिया जाता है।