भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) - Securities and Exchange Board of India (SEBI)
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) - Securities and Exchange Board of India (SEBI)
एक विनियामक प्राधिकरण है जिसकी स्थापना प्रतिभूतियों में निवेशकों के हितों की सुरक्षा करने एवं पूंजी बाजार के विकास को बढ़ावा देने के लिए सेबी अधिनियम, 1992 के अधीन की गई थी। इसके कार्यों में शेयर बाजारों के व्यापार को विनियमित करना; शेयर दलालों, शेयर हस्तांतरण एजेंटों, व्यापारी बैंकरों, हामीदारों आदि का निरीक्षण करना; तथा प्रतिभूति बाजारों की अनुचित व्यापार प्रणालियों का निषेध करना शामिल है। सेबी के निम्नलिखित विभाग द्वितीयक बाजार के कार्यकलापों की निगरानी करते हैं:
1. बाजार मध्यवर्ती पंजीकरण एवं पर्यवेक्षण (एम आई आर एस डी) बाजारों के सभी खण्डों जैसे कि इक्विटी, इक्विटी व्युत्पन्नों,
ऋण और ऋण से संबंधित व्युत्पन्नों के संबंध में सभी बाजार मध्यवर्तियों के पंजीकरण, पर्यवेक्षण, अनुपालना निगरानी और निरीक्षण से संबंधित हैं।
2. बाजार विनियमन विभाग (एन आर डी) यह नई नीतियां तैयार करने, प्रतिभूति बाजारों, उनके सहायक बाजारों और बाजार संस्थाओं जैसे कि समशोधन और निपटान संगठन और निक्षेपागार की कार्यप्रणाली और संचालनों (व्युत्पन्नों से संबंधित संचालनों को छोड़कर) को निरीक्षण से संबंधित है। 3. व्युत्पन्न और नए उत्पाद विभाग (डी एन पी डी) यह विभाग शेयर बाजारों के व्युत्पन्न खंडों में
1लेन-देन का निरीक्षण करने, लेन-देन किए जाने वाले नए उत्पादों को शुरू करने और परिणामी नीतिगत परिवर्तन करने के कार्य से संबंधित है।
नीतिगत उपाय और पहलें
पूंजी बाजार के प्राथमिक और द्वितीयक खंडों में वित्तीय और विनियामक सुधार करने के लिए सरकार ने, समय समय पर, कई पहले शुरू की हैं। मुख्य तौर पर इन उपायों का उद्देश्य देश के पूंजी बाजार में निवेशकों (घरेलू और विदेशी दोनों) का विश्वास कायम रखना है। वर्ष 2016-17 के दौरान प्राथमिक बाजार में शुरू की गई नीतिगत
पहलें निम्नलिखित हैं: सेबी ने भारत में जमाकर्ताओं को रसीदें जारी करने की इच्छुक कंपनियों के प्रकटीकरणों और अन्य संबंधित अपेक्षाओं की अधिसूचित किया है। इसे यह अधिदेश दिया गया है कि:
(i) निर्गमकर्ता अपने देश में सूचीबद्ध होना चाहिए;
(ii) यह किसी भी विनियामक निकाय द्वारा वर्जित नहीं किया गया होना चाहिए; और
(iii) उनका प्रतिभूति बाजार विनियमों का अनुपालन करने का अच्छा ट्रैक रिकॉर्ड होना चाहिए.
निरन्तर सूचीबद्ध रहने की एक शर्त के तौर पर सूचीबद्ध कंपनियों को जारी किए गए कुल शेयरों के 25 प्रतिशत की सार्वजनिक शेयरधारिता न्यूनतम स्तर पर बनाए रखना होगी। इसके कुछ अपवाद हैं:
(i) ) वे कंपनियां जिन्हें प्रतिभूति संविदा (विनियम) नियमावली, 1957 के अनुसार 10 प्रतिशत से अधिक लेकिन 25 प्रतिशत से कम का स्तर बनाए रखना अपेक्षित है; और
(ii) वे कंपनियां जिनके दो करोड़ अथवा इससे अधिक सूचीबद्ध शेयर और 1,000 करोड़ रुपए अथवा उससे अधिक और बाजार पूंजी है।
सेबी द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार निर्गमकर्ताओं से अपेक्षा की जाती है
कि वे अपने पेशकश प्रलेख के आवरण पृष्ठ पर इस बात का उल्लेख करें कि क्या उन्होंने रेटिंग एजेंसियों से आईपीओ (आरम्भिक सार्वजनिक पेशकश) ग्रेडिंग के लिए विकल्प दिया है। यदि निर्गमकर्ता ग्रेडिंग का विकल्प देते हैं तो उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे विवरण पत्रिका में अस्वीकृत ग्रेडों सहित ग्रेडों का प्रकटीकरण करें।
सेबी ने निधियां जुटाने की एक त्वरित और किफायती प्रणाली जिसे 'पात्र संस्थागत नियोजन (क्युआईपी)' कहा जाता है, की सुविधा प्रदान की है, जिसमें भारतीय प्रतिभूति बाजार से प्रतिभूतियों के निजी नियोजन अथवा पात्र संस्थागत विक्रेता के परिवर्तनीय बॉण्डों के जरिए निधियां जुटाई जाती हैं।
सेबी ने यह विनिर्दिष्ट किया है कि आरम्भिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) करने वाली गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के निर्गम-पूर्व शेयरों पर 'लॉक इन अवधि न होने के लाभ को, जो इस समय उद्यम पूंजी निधियों (वीसीएफ)/ विदेशी उद्यम पूंजी निवेशकों (एफवीसीआई) द्वारा धारित शेयरों के लिए उपलब्ध हैं, निम्नलिखित तक सीमित कर दिया जाएगा:- (i) सेबी को प्रारूप विवरणिका प्रस्तुत करने की तारीख को सेबी में कम से कम एक वर्ष से पंजीकृत वीसीएफ अथवा एफवीसीआई के द्वारा धारित शेयर और (ii) सेबी में पंजीकृत वीसीएफ / एफवीसीआई को सेबी में प्रारूप विवरणिका प्रस्तुत करने की तारीख से पूर्व एक वर्ष की अवधि के दौरान परिवर्तनीय लिखतों के रूपातंरण पर जारी शेयर
सेबी ने प्रतिभूतियों के निर्गम की आयोजना करने वाली कंपनियों द्वारा निर्गम-पूर्व प्रचार को नियंत्रित करने के लिए ‘प्रकटीकरण और निवेशक सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देशों' में संशोधन करके निर्गम- पूर्व प्रचार पर प्रतिबंध को लागू किया है।
प्रतिबंधों में, अन्य बातों के साथ-साथ निर्गमकर्ता कंपनी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इस बात को सुनिश्चित करे कि इसका प्रचार विगत प्रणालियों के सुसंगत है, उसमें कोई ऐसे पूर्वानुमान / अनुमान / सूचना निहित नहीं है जो सेबी में प्रस्तुत किए गए पेशकश प्रलेख से अलग हो।
इसी प्रकार वर्ष 2016-17 के दौरान द्वितीयक बाजार में शुरू की गई नीतिगत पहले निम्नलिखित हैं:
• वर्ष 2015 से नकदी बाजार के टी+2 चल निपटान परिदृश्य में लागू व्यापक जोखिम प्रबंधन प्रणाली के भ्रम में, शेयर बाजारों को सलाह दी गई है कि वे व्यापार शुरू करने के पिछले दिवस के समापन मूल्य और प्रातः 11 बजे, दोपहर 12.30 बजे,
2.00 बजे के मूल्यों और व्यापारी सत्र की समाप्ति पर मूल्य को हिसाब में लेते हुए, लागू जोखिम पर मूल्य (वीएआर) के मार्जिन को एक दिन में कम से कम 5 बार अद्यतन करें। ऐसा, जोखिम प्रबंधन ढांचे को नकदी और व्युत्पन्न बाजारों के साथ जोड़ने के लिए किया गया है।
‘अपने ग्राहक को पहचानें' संबंधी मानदंडों को सुदृढ़ बनाने और प्रतिभूति बाजार में लेन-देन की एक ठोस लेखा-परीक्षा प्रणाली स्थापित करने के लिए दृष्टि से लाभानुभोगी मालिक का खाता खोलने और नकदी खंड में लेन-देन करने के लिए 1 जनवरी, 2007 से 'स्थाई लेखा संख्या (पैन) को अनिवार्य बना दिया गया है।
• सेबी ने कॉर्पोरेट बाण्डों के लेन-देन के लिए एक सम्मिलित मंच का निर्माण करने के प्रस्ताव को कार्यान्वित करने की दृष्टि से यह विनिर्दिष्ट किया है कि बीएसई लिमिटेड कॉर्पोरेट बाण्ड सूचना मंच की स्थापना करेगा और उसका रखरखाव करेगा। सभी संस्थाओं जैसे कि बैंकों, सरकारी क्षेत्र उद्यमों, नगर निगमों, निगमित (कॉर्पोरेट) निकायों और कंपनियों द्वारा जारी की गई सूचीबद्ध ऋण प्रतिभूतियों के सभी लेन-देन की सूचना दी जाएगी।
• भारतीय प्रतिभूति बाजार की आधारभूत ढांचा कंपनियों में विदेशी निवेश संबंधी भारत सरकार की नीति के अनुरूप शेयर बाजारों, निक्षेपगार और समाशोधन निगमों में विदेशी निवेश की सीमाएं इस प्रकार विनिर्दिष्ट की गई है:-
(i) इन कंपनियों में 26 प्रतिशत की पृथक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) सीमा और 23 प्रतिशत विदेशी संस्थागत निवेश (एफआईआई) सीमा के साथ 49 प्रतिशत तक विदेशी निवेश की अनुमति दी जाएगी। (ii) एफडीआई की अनुमति विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) के विशेष पूर्वानुमोदन पर दी जाएगी; (iii) एफडीआई की अनुमति केवल द्वितीयक बाजार में खरीदों के माध्यम से दी जाएगी; और (iv) एफआईआई निदेशक मंडल में प्रतिनिधित्व की मांग नहीं करेगा और न ही उसे प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा।
एफआईआई निवेश के आवेदन की प्रक्रिया को सरल बना दिया गया है और एचआईआई के तहत निवेश की नई श्रेणियों (बीमा और पुनर्बीमा कंपनियां, विदेशी सेंट्रल बैंक, निवेश प्रबंधक, अंतरराष्ट्रीय संगठन) को शामिल किया गया है।
• म्युचुअल फंडों की प्रारम्भिक निर्गम खर्च और लाभांश वितरण प्रक्रिया को युक्तिसंगत कर दिया गया है।
• म्युचुअल फंडों को स्वर्ण विनिमय व्यापारिक निधियां लागू करने की अनुमति दी गई है।
• सरकारी प्रतिभूति बाजार में, भारतीय रिजर्व बैंक ने राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम (एचआरबीएम) के उपबंधो के अनुसार केंद्र सरकार नके प्राथमिक निर्गमों में भाग लेना छोड़ दिया है।
• विदेशी संस्थागत निवेशकों को प्रतिभूति प्राप्तियों में निवेश की अनुमति दी गई है।
इस प्रकार, पूंजी बाजार देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है जैसा कि यह वास्तविक बचतों की मात्रा बढ़ाता है; निवेश की जाने योग्य निधियों का आबंटन बढ़ाकर निवेशों की क्षमता को बढ़ाता है; और अर्थव्यवस्था में पूंजी की लागत को कम करता है।
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