विक्रय योग्यता के कुछ विशिष्ट पहलू - Some Specific Aspects of Marketability

विक्रय योग्यता के कुछ विशिष्ट पहलू - Some Specific Aspects of Marketability


विक्रेता के योग्यता एवं गुणों के संबंध में विशिष्ट पहलू निम्नलिखित है


1. उत्पाद ज्ञान


2. प्रभावी सम्प्रेषण


3. ग्राहक संबंध


1. उत्पाद ज्ञान विक्रेता को अपने व्यवसाय में अपने सभी उत्पादों का ज्ञान रखना चाहिए। ग्राहक उत्पादन के विभिन्न पहलुओं के बारे में प्रश्न उठा सकता है तथा विक्रेता के उत्तर से संतुष्ट न होने पर क्रय-विक्रय


को टाल सकता है। अत: विक्रेता को उत्पाद एवं सम्बद्ध पहलुओ की निम्न जानकारी रखनी चाहिए।


1. किस्म - वस्तु की किस्म ग्राहक के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। वह विक्रेता से विभिन्न प्रकार का प्रश्न पूछकर किस्म की उपयुक्तता के बारे में पूर्णतः आश्वस्त होना चाहता है। अतः विक्रेता को किस्म का अच्छा ज्ञान होना चाहिये।

2. आकृति - उत्पाद में उसकी आकृति, रुपाकृति एवं विशिष्ट लक्षणों का भी अधिक महत्व होता है। वस्तुओं की आकृति कलात्मक एवं आकर्षक हो सकती है जो ग्राहको को अचानक मोहित कर देती है। विक्रेता प्रतियोगी उत्पादो के साथ तुलना करके अपने उत्पाद के विशेष गुणों पर बल दे सकता है।


3. डिजाइन - उत्पाद की भिन्नता, नवीनता एवं श्रेष्ठता को वस्तु की डिजाइन के आधार पर दर्शाया जा सकता है। वस्तु की डिजाइन विक्रेता के लिए एक महत्वपूर्ण उपयोगी उपकरण होता है। कई बार वस्तु की किस्म हल्की होने पर भी विक्रेता ग्राहक का ध्यान वस्तु की डिजाइन की ओर आकर्षित करा सकता है।


4. रंग - विक्रेता को रंगो के रसायन एवं समाजशास्त्र का अच्छा ज्ञान होना चाहिए। रंगो की भी एक भाषा एवं मनोविज्ञान होता है। कई रंग आँखो को प्रिय लगते है तथा मस्तिष्क में शान्ति उत्पन्न करते हैं।


5. ब्रांड - ब्रांड नाम, शब्द, प्रतीक अथवा डिजाइन या उनका संयोजन होता है। इसका उद्देश्य व्यवसायी की वस्तु की पहचान बनाना तथा उसको प्रतियोगियो की वस्तुओं से भिन्न बतलाना है। विक्रेता वस्तु की ब्रांड के आधार पर ग्राहक को सही वस्तु होने का विश्वास दिला सकता है। ब्रांड के द्वारा विक्रेता अधिक ऊँची कीमतों पर माल बेचने में सफल हो सकता है।


6. पैकेज - उत्पाद की पैकिंग विक्रय प्रक्रिया मे महत्वपूर्ण रूप से सहायक होती है। विक्रेता को वस्तु के पैकेजिंग के विभिन्न पहलुओं, जैसे पैकेजिंग सामग्री, डिजाइन, लागत, पैकिंग खोलने की विधि, परीक्षण, वर्गीकरण आदि का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए।


7. आश्वासन विक्रेता को चाहिए कि वह ग्राहक को उत्पाद से संबंधित विभिन्न आश्वासनों से


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अवगत कराये तथा आश्वासन एवं गारंटी कार्ड प्रदान करें। क्रय, प्रेरणा, फर्म की प्रतिष्ठा एवं ग्राहक सन्तुष्टि की दृष्टि से आश्वासनों का अत्यन्त महत्व है। 8. उत्पाद सेवा कुछ तकनीकी एवं इलेक्ट्रानिक उत्पादों के सम्बंध में नियमित उत्पाद सेवा प्रदान -


करते रहने का अत्यन्त महत्व है। विक्रेता उत्पाद सेवा की विधि, आवृत्ति, स्थान आदि के बारे में


ग्राहक को जानकारी दे सकता है।


2. प्रभावी सम्प्रेषण - जिस विक्रेता को प्रभावी वार्तालाप की कला नही आती है, वह एक सफल विक्रेता नही बन सकता है। विक्रेता अपने ज्ञान, विचारों एवं दृष्टिकोण को बातचीत के द्वारा ही प्रकट करता है। प्रभावशाली सम्प्रेषण के लिए विक्रेता को निम्न सिद्धान्तों का पालन करना चाहिए


1. सजीव प्रस्तुतीकरण विक्रेता का सम्भाषण, यांत्रिक, उबाऊ व नीरस नही होना चाहिए। अपने सम्भाषण से विक्रेता को अपने वार्तालाप के दौरान शरीर भाषा का प्रभावी उपयोग करना चाहिए। वाणी के साथ-साथ चेहरे पर सदैव प्रसन्नता, सहयोग, अनुग्रह व सेवा की अभिव्यक्ति करने वाले भाव होने चाहिए। विक्रेता के सम्भाषण का लहजा व्यंगात्मक एवं उम्र नही होना चाहिए।


2. नियन्त्रण - विक्रेता को युक्तिपूर्वक वार्तालाप के विषय एवं दिशा पर नियन्त्रण रखना चाहिए। उसे अनावश्यक विषयों पर चर्चा करने, विवाद में फसने, व्यावधान डालने, कुतर्क आदि प्रवृत्तियों से बचना चाहिए।


3. भाषण शैली की गति - विक्रेता की भाषण शैली प्रभावी एवं संतुलित होनी चाहिए। सम्भाषण की


गति ग्राहक के विचारों तथा समझ की गति के अनुरूप होना चाहिए। धीमे विचारक के साथ यदि विक्रेता अपने सम्भाषण की गति तेज रखता तो कई विचार ग्राहक के मस्तिष्क से बाहर ही रह जायेगें तथा उनका कोई लाभ नही होगा।


4. बातचीत हो, भाषण नही विक्रेता को अपने विक्रय प्रस्तुतीकरण में बातचीत करनी चाहिए, भाषण नही देना चाहिए। ग्राहको को ऐसे विक्रेताओं से चिढ़ होती है जो व्याख्यान देते है। विक्रेता की बात एक सम्प्रेषण होनी चाहिए।


5. गम्भीरता - विक्रेता को अपनी बात को सदैव गम्भीरता के साथ प्रस्तुत करना चाहिए। उसे आपसी बातचीत को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर एवं उतावले ढंग से नही करना चाहिए। विक्रेता का प्रत्येक वाक्य सत्य, व्यवहारिक व विश्वास योग्य होना चाहिए। विक्रेता का कथन ग्राहक को सत्य प्रतीत होना चाहिए।


6. विनम्र एवं स्पष्ट सम्भाषण विक्रेता को अपनी बात पूर्ण ईमानदारी के साथ रखनी चाहिए। विक्रेता बातचीत का लक्ष्य ग्राहक को बेवकूफ बनाना नहीं होना चाहिए। ग्राहक विक्रेता का एक-एक शब्द नोट करता है, अत: बातचीत के दौरान विक्रेता को विनम्रता का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए।


7. द्वि-मार्गीय सम्प्रेषण - विक्रेता को एक तरफा बातचीत को टालना चाहिए। ग्राहकों को प्रश्न करने, अपनी आपत्तियाँ प्रकट करने तथा अपने विचारों एवं राय को अभिव्यक्त करने का पूर्ण अवसर दिया जाना चाहिए। विक्रय प्रस्तुती तभी प्रभावी होती है जब वह द्विमार्गीय हो। पारस्परिक आदान-प्रदान विक्रेता के सम्प्रेषण का आधार होना चाहिए।


8. शब्दो की पुनरावृत्ति नहीं विक्रेता को कई शब्दों का बार-बार प्रयोग नहीं करना चाहिए। शब्दो को बार-बार प्रयोग करने से सम्भाषण नीरस एवं अनुपयोगी हो जाता है। विक्रेता के पास शब्दों एवं भाषा का अथाह भण्डार होना चाहिए ताकि वह अपनी बात अधिक स्पष्टता के साथ कह सके।


3. ग्राहक सम्बन्ध विक्रेता अपनी योग्यता के साथ-साथ विशिष्ट प्रकार के उपायों व क्रियाओं से ग्राहको के साथ अच्छे सम्बन्धों का निर्माण कर सकता है जो निम्नलिखित है


1. पुराने ग्राहको से नियमित भेट विक्रेता को अपने पुराने एवं नियमित ग्राहकों से हमेशा मिलते रहना चाहिए। ग्राहक की वस्तु के संबंध में समस्याओं, कठिनाइयों और सुझावों का पता किया जाना चाहिए,

वस्तु के प्रयोग एवं अनुरक्षण के बारे में निर्देशों को दोहरा देना चाहिए। भेंट की दृष्टि से ग्राहको का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है


(i) सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्राहक


(ii) महत्वपूर्ण ग्राहक


(iii) कम लाभप्रद ग्राहक


(iv) न्यूनतम महत्व के ग्राहक


भेट की आवृत्ति व ध्यान इनके अनुसार तय किया जा सकता है।


2. आवर्तक व्यवसाय की रचना आवर्ती व्यवसाय' को बनाने में विक्रेता का बहुत योगदान होता है। विक्रेता को ऐसे ग्राहको का निर्माण करना चाहिए जो फर्म के स्थायी, नियमित और बार-बार क्रय करने वाले ग्राहक हो। इसका आधार विक्रेता की ईमानदारी, निर्णय शक्ति, कल्पना शक्ति व ग्राहक


सेवा होना चाहिए।


3. विक्रय बाधाओं का निराकरण ग्राहक सम्बन्धों की सुदृढ़ता के लिए विक्रय के दौरान आने वाली बाधाओं को दूर करना आवश्यक होता है। ग्राहक द्वारा क्रय की जाने वाली मात्रा को भी तभी बढ़ाया जा सकता है जब ग्राहक सभी प्रकार के क्रय संदेहों से मुक्त हो ।


4. ग्राहक को 'निष्क्रिय' होने से रोकना ग्राहक की निष्क्रियता संबन्ध टूटने का संकेत होती है। कई कारणों से ग्राहक निष्क्रिय हो जाते है और सम्बन्ध टूट जाते है जैसे भ्रम हो जाना, आदेश पूर्ति, बिलिंग में विक्रेता द्वारा त्रुटि होना, ग्राहक का पर्याप्त ध्यान नही देना, वस्तु में दोष होना आदि


प्रभावी सम्प्रेषण के द्वारा ग्राहक को निष्क्रिय होने से रोका जा सकता है।


5. ग्राहक का समर्थन प्राप्त करना व्यवसाय में ग्राहक भी विक्रेता, कम्पनी व उत्पाद के लिए सहायक सिद्ध हो सकता है। व्यवसाय में ग्राहक को एक सहायक अंग के रूप में देखा जाना चाहिए। ग्राहक के साथ मात्र परिचय नही वरन मैत्री का संबंध निर्मित किया जाना चाहिए।


6. ग्राहक व्यवहार को प्रभावित करना - विक्रयण ग्राहक के लिए एक विशिष्ट अनुभव होता है जिसके द्वारा वह नई नई बातों, व्यवहार व प्रवृत्तियों को ग्रहण करता है। विक्रेता अपने व्यवहार और आचरण से ग्राहक को शिक्षित एवं निर्देशित कर सकता है। विक्रेता का दृष्टिकोण, विचार शैली व सम्प्रेषणीयता भी ग्राहक संबन्धों में सुधार लाती है।


7. ग्राहक शिकायतो को दूर करना यदि विक्रेता के कुछ ग्राहक असन्तुष्ट हो तो शिकायतो का


प्रभावी ढंग से निपटारा करके ग्राहक संबंधों को सुदृढ़ किया जा सकता है। इसके लिए विक्रेता को


निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए।


(i) विक्रेता को वस्तु तथा ग्राहको की आवश्यकताओं का पूर्ण ज्ञान रखना चाहिए। ताकि वह ग्राहक को सही वस्तु खरीदने में सहायता कर सके। (ii) विक्रेता को सुनिश्चित करना चाहिए कि क्रय जाने वाली वस्तु के संबंध में दोनों के विचार


एक जैसे हो।


(iii) विक्रेता को जहाँ जरुरत हो कम्पनी की नीतियों एवं कार्य पद्धतियों का उल्लेख करना


चाहिए। (iv) विक्रेता को सदैव अपने द्वारा दिये गये आश्वासनों, गारंटी एवं वचनों को पूरा करना चाहिए।


8. विभिन्न सेवायें प्रदान करना ग्राहक व्यवसाय संबन्धो की सुदृढ़ता का आधार ग्राहकों को दी जाने वाली सेवायें हो सकती हैं। ग्राहको के लिए प्रमुख सेवायें निम्नलिखित है।


(i) कई तकनीकी वस्तुओ के सही संचालन व रख रखाव के बारे में उचित निर्देश प्रदान करना।


(ii) कई वस्तुओं के संबन्ध में नियमित जाँच, मरम्मत, सफाई, धुलाई आदि की निःशुल्क सुविधा देना।


(iii) वस्तु के विभिन्न उपयोग सुझाना व अन्य उपयोगी जानकारी प्रदान करना। 


(iv) यंत्र स्थापना, पैकिंग, गृह खरीद, माल वापसी, साख, डाक, टेलिफोन एवं अन्य सामान्य सेवायें प्रदान करना।


(v) व्यापारी ग्राहकों को विक्रय, विज्ञापन व प्रबन्धक सहायत प्रदान करना। ये सभी सेवाये प्रदान करके ग्राहक के साथ सम्बन्धों में सुधार लाया जा सकता है।