सैद्धान्तिक बनाम भावावेश प्रयोजन - Theoretical vs. Passion Purpose
सैद्धान्तिक बनाम भावावेश प्रयोजन - Theoretical vs. Passion Purpose
उपभोक्ता के व्यवहारिक विशेषों के अनुसार लक्ष्यों का चयन की दो श्रेणियां होती हैं - सैद्धान्कि एवं भावावेश। उनके लिए, सैद्धान्तिक का अर्थ उत्पाद के चयन से होता है, ग्राहक अपने मन में व सभी विकल्प रखता है और किसी एक का चयन उसे अधिकतम उपयोगिता देता है। विपणन के संबंध में इसका अर्थ उपभोक्ता उत्पाद को उद्देशित मापदंडों के आधार पर चयन करता है। इन मापदंडों के उदहारणार्थ, कीमत, वजन, इत्यादि होते हैं। भावात्मक उद्देश्य ऐसे स्वनिष्ठ या व्यक्तिगत श्रेणियों जैसे व्यक्तित्व, गर्व, स्नेह और भय के आधार पर चयनित किया जाता है। इस पूर्वमान्यता उन विश्वासों पर आधारित होता है जो सैद्धान्तिक एवं भावात्मक श्रेणीगत अधिकतम संतुष्टि एवं उपयोगिता को प्राप्त नहीं होते। इसी क्षण, इस बारे विचार करना अकारण ही होगा कि उपभोक्ता उन विकल्पों का चयन करता है जो उसकी अभिष्ट उद्देश्यों को यथासंभव पूरी करे।
अनुसंधानकर्ता क्रेताओं के दृष्टिकोण पर अध्ययन करता है और यह विचारने का प्रयत्न करता है कि प्रत्येक क्रेता के व्यवहार को सैद्धान्तिक राय ली जाए। अतएव ऐसे व्यवहारों के कारकों को अलग-थलग करने का प्रयत्न करते है ताकि पूर्वानुमित करने के योग्य बनाते हैं और तथापि उनके आगामी व्यवहार को प्रभावित करते हैं। प्रयोगकर्ता आमतौर पर सुखदायी प्रसन्नताओं का अध्ययन करते हैं जो उन्हें उपभोग व्यवहार जैसे कामुकता. खुशी, और काल्पनिक परिस्थितियों के कुछ तरीके प्रदान करे। यह उपभोक्ता को ज्ञान अर्जत करने और उनको समझने का अध्ययन होता है जो वे किसी विशिष्ट परिस्थितियों में व्यवहार करते हैं।
सक्रिय प्रेरणा की प्रकृति जरुरतें और लक्ष्य में नियमित परिवर्तन होता रहता है।
वे कभी समाप्त नहीं होते क्योंकि जरुरतें और लक्ष्य कभी भी पूर्णतः संतुष्ट नहीं होते। अगर जरुरतें पूरी हो भी जाएं उनको नई आवश्यकताओं में बदल दिया जाता है जिनका स्तर उच्च हो ।
• इच्छाएं कभी भी पूरक नहीं होती। सभी मानवों की इच्छाएं न ही पूर्ण होती है अतः न ही तृप्त होती हैं।
• अस्थायी लक्ष्य उपलब्धि जरुरत की आशातित संतुष्टी नहीं करता। जैसे जैसे जरुरतें पूर्ण होती रहती हैं उपभोक्ता की आवश्यकताएं नयी जरुरतों में बदल दिया जाता है। कछ प्रेरक योजनाकर्ता सोचते हैं कि जरुरतों की एक श्रृंख्ला सदा अस्तित्व में होती है
जिसका अर्थ निम्न स्तर को संतुष्ट करना जो उच्च स्तर की जरुरतों को उत्तेजित करती हैं। विपणनकर्ताओं को उनकी बदलती जरुरतों के साथ साथ ही कार्यशील रहना चाहिए। सफलता और नाकामियां लक्ष्यों को प्रभावित करती हैं।
अनुसंधानकर्ता एक व्यक्ति विशेष के व्यवहार को ध्यानार्थ रखते हैं जो उन्हें लक्ष्य को प्रतिस्थापित करने योग्य बनाते हैं जब वह एक निश्चित लक्ष्य को पाने में असफल होता है और जिसे वह विशिष्ट जरुरत को पाने के लिए करता है। एक लक्ष्य जो मूल लक्ष्य को प्रतिस्थापित करता है या परवर्ती की अपेक्षा संताषजनक नहीं होता, परन्तु यह उस जरुरत आधारित तनाव को कुछ हद तक कम करने में सहायक अवश्य होता है, परिणामवश उसकी लाचारिक अनुभूतियों को कम करने में सहायक होते हैं। जैसा कि पहले वर्णित किया जा चुका है
कि प्रत्येक व्यक्ति की लाचारिक परिस्थितियों को भिन्नता से परिभाषित करता है। परिस्थितियों के अनुरूप चलने वाले लोग किसी बाधा का सामना करने या किसी वैकल्पिक लक्ष्य का चयन करने में प्रयत्नशील हो जाता है। वे जो ज्यादा अनुरूपित नहीं होते, उस तथ्य को महसूस करते हैं कि वे व्यक्तिगत तौर पर उसे पाने में असफल रहे हैं और अंततः वे अनिश्चितता का सामना करते हैं।
कुछ विशिष्ट उद्देश्यों का आमतौर पर इस प्रकार चयन किया जाता है कि वे विशाल आवश्यकताओं की पूर्ति को प्रसन्नता से पूरक करें एक विशिष्ट जरुरत की पूर्ति करने की प्रक्रिया होती है।
• जरुरतें और लक्ष्य व्यक्ति विशेष में अलग-अलग होती हैं। उनके व्यवहारात्मक उद्देश्यों तक पहुंचना कठिन होता है। भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं को रखने वाले समान लक्ष्यों का चयन कर इच्छाओं की पूर्ति की आशा करते हैं। हालांकि, समान जरुरतों वाले लोग अपने लक्ष्यों की पूर्ति भिन्न-भिन्न तरीकों से करते हैं।
प्रतिरक्षक कार्यविधि
निवासी जो अधिकतर क्षणों में गंभीरता का प्रबंध करते हैं मानसिक तौर पर भड़काऊ स्थितियों की स्वतः ही रक्षा करते है और स्वयं में विश्वास को पुर्नजागृत करते है। इन प्रतिक्रियाओं को प्रतिरक्षक कार्यविधि कहा जाता है।
लोग विभिन्न तरीकों से अपनी लाचारिकता को व्यक्त करते हैं क्योंकि उनके लक्ष्यों की पूर्ति नहीं होती। इन में कुछ कारक अत्यन्त उग्र होते हैं जो वैधता, अपने आप में बदतर होकर मुसीबत से बाहर खींच लेती हैं और कभी-कभी लाचारी की वजह से अपने अंतरंग ही दमन कर देती हैं।
विपणनकर्ता आमतौर पर उपभोक्ताओं के आत्म सम्मान की प्रतिरक्षा को ध्यानार्थ रखती हैं जब वे उनके विज्ञापित अपीलों को चयन करते हैं। विज्ञापन या अपील आम तौर पर व्यक्ति विशेष की असंतुष्ट परेशानी को विज्ञापित तरीकों से हल करता है।
उत्तेजक उद्देश्य
एक व्यक्ति विशेष की जरुरतें आम तौर पर निष्क्रय रहती हैं।
किसी भी क्षण में किसी व्यक्ति विशेष की सक्रियता के कारण, लगाव या सीखने की क्षमताओं या बाहरी हितों के कारण जागृत होती हैं खासकर विशिष्ट परिस्थितियों में।
मानसिक उत्तेजना
इस प्रकार की उत्तेजना उसकी दैहिक जरुरतों के कारण उत्पन्न होती हैं और व्यक्ति विशेष की मनोवैज्ञानिक स्थिति पर आधारित होती हैं। लगभग सभी मनोवैज्ञानिक संकेत अस्वैच्छिक होते हैं, जो दिमाग और स्नायुमंडल द्वारा नियन्त्रित होते हैं, परन्तु यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि वे उत्तेजना के आधार पर उत्पन्न होते हैं
जिसके परिणामस्वरुप तनाव को जन्म देकर अशांती उत्पन्न करती है उस समय तक जब तक कि वे जरुरतें पूरी न हों।
भावात्मक उत्तेजना
कभी-कभी, सोच या काल्पनिक आनन्द के आधारित जरूरतें प्रच्छन्न या प्रतिभाहीन जरुरतों का करक होती हैं। ये संभवतः असुविधाजनक तनावों और अशांती को जन्म देती हैं जो उनके व्यवहार की प्रवृत्ति पर झटकाव करती हैं जो लक्ष्य परिचित हाती हैं। संज्ञानात्मक उत्तेजना
कुछ अवधियों में, आक्समिक धारणाएं या आत्म-सफलता संज्ञानात्मक आवश्यकताओं की सजगता को उत्तेजित करती हैं।
पर्यावरणीय उत्तेजना
इच्छाओं का ढेर जो एक विशेष सर्वोत्तम मौके पर आमतौर पर पृष्ठभूमि से आने वालों यथार्थ इशारों में सलिप्त होते हैं। व्यक्ति विशेष जो ऐसे पर्यावरण में विद्यमान होते हैं जिनमें ज्यादा भिन्नता होती है और सामान्यता उपयुक्त स्थितियों में परस्पर अनुभवी होते हैं, आवश्यकताओं की उत्पत्ति करते हैं। दूसरी ओर, जब मानव निर्जन और निराश्रय परिवेशों में निर्वाह करता है तो उसकी कुछ मात्र ही जरुरतें क्रियाशील होती है। व्यवहारिक प्रयोगों के अनुसार, अभिप्रेरणा को एक यान्त्रिक क्रिया माना जाता है और व्यवहार को प्रेरक तत्वों का उत्तरदायी, जबकि सजग विचारक तत्वों को अन्देखा किया जाता है।
संज्ञानात्मक प्रयोग सभी प्रकार के व्यवहार को लक्ष्यों की ओर दिशागत करता है। भूतपूर्व अनुभवों और जरुरतों के विश्लेषण,
वर्गीकरण और बदलते व्यक्तित्वों और विश्वासों के कारण जो उसके व्यवहार के आचरणों को कार्यान्वित करते हैं।
जरुरतों की किस्में व व्यवस्थाएं
अधिकतर मानवीय आवश्यकताएं विचारों एवं विस्तार में भिन्न होती हैं। यद्यपि, यहां इस संदर्भ में बहुत ही असहमतियां सार्थक मनोगत जरुरतों की विशिष्ट किस्मों है, विशेषकर मानसिक आवश्यकताओं के प्रति विशिष्ट असहमति का स्तर पाया जाता है। हेनरी मुररे के अनुसार, मानसिक जरुरतों की 28 विभिन्न किस्में पायी जाती हैं जो व्यक्तित्व परीक्षणों की लोकप्रियता के समस्त समूह के बुनियादी आधार का निर्माता कही जा सकती है। मुररें के अनुसार मूल आवश्यकताएं अनेकों उद्देश्यों की संरचना करती है जो उपभोक्ता व्यवहार को जानने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। इन उद्देश्यों में से कुछ अर्जित, संपादित, प्रशंसनीय और प्रदर्शनीय होती हैं।
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