विक्रेता के चयन में ध्यान देने योग्य बातें - Things to consider in vendor selection

विक्रेता के चयन में ध्यान देने योग्य बातें - Things to consider in vendor selection


विक्रेता के चयन में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। 


1. 'विक्रय अभिरुचि - विक्रेता का चुनाव करते समय यह देख लेना चाहिए कि उसकी विक्रय कार्य के प्रति रुचि है या नही। जिन व्यक्तियों में विक्रय में गहरी अभिरुचि होती है केवल वे ही अच्छे विक्रेता सिद्ध हो सकते है।


2. शिक्षा एवं भाषा विक्रेता को अच्छा शिक्षित होना तथा कई भाषाओं का ज्ञान होना आवश्यक है। क्योंकि अनेक प्रकार के भाषा बोलने वाले ग्राहको के साथ व्यवहार करना होता है। विक्रेता के चयन के लिए स्नातक की न्यूनतम शिक्षा के अतिरिक्त विक्रय क्षेत्र में डिप्लोमा या डिग्री होना उपयुक्त रहता है।


3. आयु - विक्रेता पद पर कार्य करने वाले व्यक्ति की उपयुक्त उम्र होना आवश्यक है। प्रौढ़ व्यक्ति में कार्य करने की क्षमता कम होती है तथा कम आयु में अनुभव योग्यता की कमी दिखायी देती है अत: ऐसे व्यक्ति का चुनाव होना चाहिए जिसकी उम्र 22 से 35 तक हो।


4. प्रकृति एवं स्वभाव विक्रेता को हंसमुख, मृदुभाष, शिष्ट, धैर्यवान और सत्यनिष्ठ होना चाहिए। जिससे ग्राहक तुरन्त प्रभावित हो सके। चयन के समय विक्रेता प्रकृति एवं स्वभाव का गहन अवलोकन किया जाना चाहिए।


5. आदतें - विक्रेता के चयन में उसकी आदतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

विक्रेता की जीवनशैली एवं आदत से उसका व्यवहार निर्मित होता है। बुरी आदतों का केवल विक्रय कार्य में ही नही बल्कि ग्राहकों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। चयन के लिए विक्रेता के पिछले जीवन की जाँच करनी चाहिए।


6. उच्च चरित्र - विक्रेता का चुनाव करते समय उसके चरित्र बल की जाँच करनी चाहिए। चरित्रवान विक्रेता न केवल व्यवसाय की प्रतिष्ठा को बढ़ाते है बल्कि ग्राहको का भी स्थायी रूप से दिल जीत लेते है।


7. अहंकार का अभाव - विक्रेता के पद पर कार्य करने वाले व्यक्ति में अंहकार तथा अकड़ नही होना चाहिए जो विक्रेता अपने ज्ञान तथा पद के दम्भ से ग्राहकों के साथ दुर्व्यवहार करते है

वे ग्राहकों को नाराज करते है तथा साथ संस्था की प्रतिष्ठा भी खराब करते है। अतः विक्रेता को विनम्र एवं शिष्ट होना चाहिए।


8. मनोविज्ञान का ज्ञान विक्रेता के चयन में इस बात को अवश्य देखना चाहिए कि वह मन का ज्ञाता है। तभी वह ग्राहकों के रुचियों, प्रवृत्तियों, भावनाओं तथा स्वभाव का सरलता से पता लगा लेता है। व्यवहार कुशलता एवं सदृजता लाने के लिए मनोविज्ञान का ज्ञान आवश्यक होता है।


9. तकनीकी ज्ञान- ऐसे व्यक्ति योग्य विक्रता सिद्ध हो सकते है।

जिसने तकनीकी शिक्षा प्राप्त की हो। ये वस्तु की बारीकियों को आसानी से समझ लेते है तथा ग्राहक को समझा सकते है।


10. अनुभव अनुभवी विक्रेता कुशलता पूर्वक बात करके ग्राहक को तुरन्त प्रभावित कर सकता है। चयन में अनुभव के साथ उसकी योग्यता पर भी ध्यान रखना चाहिए। 


11. राष्ट्रीयता- विक्रेता के चयन में उसकी राष्ट्रीयता एवं जातीयता पर भी विचार करना चाहिए। किसी विशेष प्रान्त के लिए विक्रेता की नियुक्ति की जाती है तो उस क्षेत्र से सम्बन्धित विक्रेता ही उपयुक्त होगा। यदि विदेशों में विक्रेता की नियुक्ति की जाती हैं तो राष्ट्रीय भावना से ओत प्रोत व्यक्ति का चयन उपयुक्त होगा।


12. स्वास्थ्य एवं कार्य शक्ति - विक्रेता की नियुक्ति के लिए शारीरिक स्वस्थता एवं अधिक कार्य शक्ति की जाँच होना आवश्यक है। भ्रमणशील विक्रेता को अनेक क्षेत्रों में अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसलिए अधिक कार्य शक्ति वाले व्यक्ति का चयन होना चाहिए।


13. चयन नीति पर विचार-विक्रेता के चयन के समय संस्था द्वारा बनाई गयी चयन नीति के नियमों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।


विक्रेता के चयन प्रक्रिया में उसकी शारीरिक व मानसिक योग्यता एवं रुचि का विभिन्न प्रकार से परीक्षण किया जाता है

तथा योग्य पाने पर ही उसका चुनाव किया जाता है। चयन प्रक्रिया में आवेदक को विभिन्न स्तरों पर विभिन्न प्रकार से परखा जाता है। सभी संस्थानों में समान प्रकार की चयन प्रक्रिया का प्रयोग नही किया जाता है। एक सामान्य चयन प्रक्रिया में निम्न स्तर अथवा चरण हो सकते हैं


1. प्रारम्भिक तैयारियाँ करना इन प्रारम्भिक तैयारियों में निम्न कार्य शामिल होते है


1. सभी प्रार्थियों का विवरण तैयार करना।


2. विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आवेदन पत्रों पर विचार करना ।


3. प्रारम्भिक रूप से अयोग्य प्रार्थियों एवं अधूरे प्राथनाओं को निरस्त करना।


4. चयन बोर्ड गठित करना।


5. चयन नीति एवं सिद्धान्त निर्धारित करना।


6. चयन जाँच एवं लिखित परीक्षा हेतु प्रश्नपत्र एवं विभिन्न प्रोफार्मा तैयार करवाना।


7. आवश्यक विशेषज्ञों एवं विभागों से सम्पर्क करना।


8. निर्धारित प्रारूप वाले रिक्त आवेदन पत्र छपवाना।


2. नियोजन कार्यालय में प्रार्थी का स्वागत संस्था द्वारा दिये गये बुलाये पर जब प्रार्थी संस्था में आता है

तो कार्यालय में स्वागत किया जाना चाहिए तथा स्वागत कक्ष में बैठने का स्थान उपलब्ध होना चाहिए। और उसके आत्म सम्मान को किसी प्रकार का ठेस नही पहुचने देना चाहिए। अन्यथा योग्य प्रार्थी ऐसी संस्था में कार्य करना स्वीकार नही करेंगे।


3. प्रारम्भिक साक्षात्कार प्रारम्भिक साक्षात्कार का उद्देश्य अक्षम और अयोग्य व्यक्तियों की छटनी करना है। इसके अन्तर्गत साक्षात्कार कर्ता प्रार्थी से उसकी शैक्षणिक योग्यता, अनुभव, उम्र कार्य रुचि एवं अन्य विशिष्ट कार्य-गुणों आदि के बारे में सूचनायें प्रदान करता है। इस सूचना के आधार पर प्रारम्भिक तौर पर प्रार्थी की योग्यता के बारे में निर्णय किया जा सकता है। इस साक्षात्कार से प्रार्थी की रुचियों इच्छा, कार्य, लगन, उत्साह आदि के बारे में आधार सूचनायें प्राप्त की जाती है। तथा योग्य प्रार्थियों को अगले चरण के लिए रोका जा सकता है। इसलिए इसे छटनी साक्षात्कार भी कहा जा सकता है।


4. चयन जाँच - चयन जाँच के द्वारा प्रार्थी की योग्यता, चातुर्य, कार्य रुचि, स्वभाव आदि का मूल्यांकन किया जाता है। चयन जाँच के कई प्रकार हैं- योग्यता जाँच, व्यक्तित्व जाँच, अभिरूचि जाँच, उपसब्धि जाँच आदि। संस्था आवश्यकतानुसार किसी भी जाँच के द्वारा आवेदक की योग्यता का परीक्षण कर सकती है। जाँच के द्वारा सही व्यक्ति का सही पद के लिए चयन किया जा सकता है।


5. मुख्य साक्षात्कार साक्षात्कार चयन प्रक्रिया का प्रमुख उपकरण है। जाँच में योग्य पाये जाने वाले प्रार्थियों का साक्षात्कार किया जाता है।

लगभग सभी संस्थाओं में साक्षात्कार को चयन पद्धति का प्रमुख आधार माना जाता है। साक्षात्कार अपने भावी कर्मचारी से एक सीधी बातचीत है। विक्रेता की नियुक्ति से पूर्व साक्षात्कार करके, उसकी योग्यता, विचार शैली, आचरण, व्यक्तित्व, वाणी, नेतृत्व, क्षमता आदि की जाँच किया जा सकता है। साक्षात्कार का मुख्य उद्देश्य भावी विक्रेता के साथ सूचनाओं का आदान प्रदान करना है।


6. सन्दर्भ जाँच - सन्दर्भ जाँच का मुख्य उद्देश्य प्रार्थी के चरित्र, आचरण एवं नैतिक व्यवहार की जाँच करना हैं। यह जानना आवश्यक है कि विक्रेता पहले कहीं गलत आचरण एवं छल-कपट का दोषी तो नही रहा है

प्रार्थी अपने चरित्र प्रमाण पत्र भी संलग्न करता है जो कई बार गलत पाया जाता है। अतः प्रबन्धकों प्रार्थी के बारे में व्यक्तिगत सम्पर्क करके सही जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।


7. चिकित्सा परीक्षण चिकित्सा परीक्षण के द्वारा विक्रेता की शारीरिक अक्षमताओं, बिमारियों व अन्य योग्यताओं का पता लगाया जा सकता है। ऐसा विक्रेता किसी रोग अथवा शारीरिक दुर्बलता के कारण कार्य करने में अयोग्य है उन्हें अस्वीकार किया जा सकता है। इसी लिए विक्रेता को शारीरिक दृष्टि से सक्षम एवं योग्य होना आवश्यक है। योग्य विक्रेता का शारीरिक प्रलेख तैयार किया जाता है ताकि श्रमजीवी क्षतिपूर्ति वाले मामलों में निर्णय लिया जा सके।


8. सेवा शर्तों का निर्धारण प्रार्थी का चयन होने के बाद सेवा की शर्तें निर्धारित की जाती है। कभी कभी सेवा की शर्तों का उल्लेख विज्ञापन एवं साक्षात्कार के समय कर दिया जाता है किन्तु अधिक योग्यता एवं अनुभव प्राप्त प्रार्धियों के लिए सेवा शर्तों में इस स्तर पर परिवर्तन भी किया जा सकता है। सेवा की शर्तों में वेतन, कमीशन, कार्य के घण्टे, सवेतन अवकाश, भत्ते, आवास सुविधा भ्रमण आदि का निर्धारण किया जाता है।


9. चयन निर्णय एवं नियुक्ति प्रार्धियों के संबंधी सभी चरण सफलता पूर्वक पार कर लेने के बाद अंतिम रूप से उन्हें चुन लिया जाता है तथा उन्हें नियुक्ति पत्र दे दिया जाता है।

कई संस्थानों में नियुक्ति देने से पूर्व प्रार्थी की सेवा शर्तों पर भी विचार किया जाता है यदि विक्रेता कुशल है तो अधिक वेतन एवं सुविधायें भी देना हानिकारक नहीं होता है।


10. पदभार सौंपना एवं कार्य परिचय प्रार्थी पद भार ग्रहण करने की तिथि से ही वह संस्था का कर्मचारी बन जाता है कार्य सम्भालने पर प्रार्थी को उसके कर्तव्य दायित्व एवं जबाबदेही का ज्ञान करवा दिया जाता है। कार्यभार ग्रहण करने के बाद वह विक्रेता बन जाता है। नये विक्रेता को अपनी संस्था और कार्य और वातावरण के साथ जोड़ना आवश्यक होता है ताकि वह अपने को संस्था में अपरिचित अनुभव न कर सकें।