कोषागार हुण्डियाँ - treasury bills

कोषागार हुण्डियाँ - treasury bills


कोषागार बिल या हुण्डियाँ भारत सरकार द्वारा निर्गत (364 दिन तक) अल्पकालीन प्रतिभूतियाँ है जो तीन परिपक्वता अवधियों 91 दिवसीय 182 दिवसीय तथा 364 दिवसी के लिए जारी की जाती हैं। चूँकि ये चूक (डिफाल्ट) जोखिम से मुक्त होती है इसलिए कोषागार हुण्डियों पर प्रतिफल अन्य अल्प कालीन दरों के लिए ऊपरी सीमा (बेंचमार्क) की तरह होता है। कोषागार हुण्डी बाजार ऐसा बाजार है जहाँ अधिकांश देशों में केन्द्रीय बैंक अल्पकालीन व्याज दरों तथा तरलता को प्रभावित करने के लिए नियमित रूप से हस्तक्षेप करता है। खुले बाजार की क्रियाओं के परिचालन हेतु इस बाजार का विकास महत्त्वपूर्ण है।


कोषागार हुण्डियाँ अंकित मूल्य (फेस वैल्यू) की कटौती दर पर जारी की जाती है।

98.53 की कीमत पर जारी की जाती हैं तो इसका अर्थ यह है कि निवेशक उसे वर्तमान में रू.98.53 में खरीदकर 91 दिनों के बाद रू. 100 प्राप्त करेगा। इस उदाहरण में प्रतिफल की दर 5.0677 प्रतिशत होगी [ [(100 98.53)/98.53} × (364/91)। इसमें वर्ष को 364 दिन माना जाता है। 27 अक्टूबर 2004 से भारतीय रिजर्व बैंक के प्रतिफल की गणना हेतु वर्ष को 365 दिन का मानना प्रारम्भ कर दिया है।


91 दिवसीय कोषागार हुण्डियों की नीलामी प्रणाली तथा इनका एक कम्पायमान ( वाइब्रेन्ट) बाजार साठ के दशक से पूर्व चलन में था। दो घटनाओं ने इस बाजार को नष्ट कर दिया प्रथम, साठ के दशक के मध्य में नीलामी द्वारा 91 दिवसीय कोषागार हुण्डियों की बिक्री बन्द करके इसके स्थानपर ऑन-टैप 91-दिवसी कोषागर हुण्डियाँ प्रारम्भ कर दी गयी।

नई प्रणाली के अन्तर्गत स्थिर ब्याज दर पर 91- दिवसीय कोषागार बिक्री की जाने लगी कि साप्ताहिक आधार पर नीलामी के द्वारा। ऑन-टैप हुण्डी ब्याज दर सन् 1974 तक बैंक दर के अनुरूप परिवर्तनीय रही और उसके बाद से कई वर्षों तक 4.6 प्रतिशत के स्तरपर स्थिर रखी गयी। ऑन-टेप हुण्डियाँभारतीय रिजर्व बैंक तथा अन्य प्रतिभागियों को बेची जाती थी। द्वितीय, पचास के दशक के मध्य में तदर्थ कोषागार हुण्डियों की प्रणाली प्रारम्भ की यगी थी। जैसेही भारतीय रिजर्व बैंक के पास केन्द्र सरकार का नकदी अधिशेष एक निश्चित स्तर से कम हो जाता था, वैसे ही तदर्थ हण्डियाँ स्वतः भारतीय रिजर्व बैंक को जारी कर दी जाती थी। यह प्रणाली केन्द्र सरकार के घाटे के असीमित मौद्रीकरण का दौर वाली थी।

नवम्बर 1986 में 182 दिवसीय कोषागार हुण्डियों को प्रारम्भ किए जाने तथा कोषागार हुण्डियों एवं अन्य अनेक मुद्रा बाजार उपकरणों को द्वितीयक बाजार उपलब्ध कराने के लिए सन् 1988 में भारतीय बट्टा एवं वित्त गृह (डिस्कउन्ट एण्ड फायनेन्स हाउ आफ इण्डिया), की स्थापना के साथ कोषागार हुण्डियों में बाजार की रूचि फिर से दिखाई देने लगी।


अप्रैल 1992 से पन्द्रह दिवसीय नीलामी आधार पर 364 दिवसीय कोषागार हुण्डियों को जारी किए जाने के साथ ही कोषागार हुण्डी बाजार में सुधारों का दौर प्रारम्भ हुआ।

जनवरी 1993 में 91 दिवसी कोषागार हुण्डियों की नीलामी प्रणाली प्रारम्भ की गयी। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन तो उस समय आया जब केन्द्र सरकार एवं भारतीय रिजर्व बैंक ने एक समझौता करके 1 अप्रैल, 1997 से तदर्थ कोषागार हुण्डियों की बिक्री प्रणाली को बन्द कर दिया। इस प्रकार वर्ष 1997-98 से राजकोषीय घाटेका स्वतः मौद्रीकरण होना बन्द हो गया तथापित केन्द्र सरकार को राजकोषीय घाटे के वित्तीयन हेतु बाजारी उधारों पर निर्भरता बढ़ गयी। मौद्रिक नीति के लिए कुछ स्वतंत्रता सृजित हो जाने के साथ-साथ इस निर्णय से भारत में ऋण बाजार के विकास में तेजी आयी।


14- दिवसीय कोषागार हुण्डियों की नीलामी 6 जून, 1997 को प्रारम्भ की गयी तथा 14 मई,

2001 से बन्द कर दी गयी। 182 दिवसीय कोषागार हुण्डियों की नीलामी नहीं की गयी और अन्तत: इन्हें 14 मई 2001 को बन्द कर दियागया। अप्रैल 2005 के पहले सप्ताह में 182 दिवसीय कोषागार हुण्डियों की बिक्री फिर से प्रारम्भ कर दी गयी।


वाणिज्यिक बैंक, प्राथमिक डीलर, वित्तीय संस्थान, भविष्य निधियाँ, बीमा कम्पनियाँ, गैर-बैंकिंग बीमा कम्पनियाँ विदेशी संस्थागत निवेशक तथा राज्य सरकारें कोषागार हुण्डियों में निवेश करने वाले प्रमुख निवेशक है।