सहकारी बैंकिंग प्रणाली - co-operative banking system

सहकारी बैंकिंग प्रणाली - co-operative banking system


सहकारी बैंकिग का संगठन


भारत में साख सहकारी समितियाँ या बँकिग के संगठन का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जा सकता है:


(क) साख की अवधि के अनुसारः- साख की अवधि के अनुसार समितियों को दो भागों में बाँटा जा सकता है:


(i) अल्पकालीन तथा मध्यकालीन साख समितियाँ:- ये समितियाँ अपने सदस्यों को थोड़े समय या मध्यकाल के लिए कर्जे देती है। इन समितियों को प्राथमिक सहकारी समितियाँ कहा जाता है।


(ii) दीर्घकालीन साख समितियाँ:- ये समितियाँ लंबे समय के लिए कर्जे देती है। ये अपने सदस्यों की भूमि गिरवी रख कर कर्जे प्रदान करती है। इन्हें सहकारी कृषि तथा ग्रामीण विकास बैंक कहा जाता है।


(ख) संगठन के आधार परः- उपरोक्त दोनों प्रकार की समितियों को संगठन के आधार पर निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है:


(i) अल्पकालीन साख समितियाँ तीन प्रकार की होती है:


(अ) प्राथमिकता सहकारी साख समितियाँ (आ) केंद्रीय सहकारी बैंक


(ii) दीर्घकालीन साख समितियाँ दो प्रकार की होती है:


(अ) प्राथमिक सहकारी कृषि एवं विकास बैंक (आ) केंद्रीय सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक


(अ) प्राथमिक कृषि सहकारी साख समितियाँ


संसार में सभी प्रकार की सहकारी समितियों में 44 प्रतिशत सहकारी साख समितियाँ है । भारत में 64 प्रतिशत सहकारी आंदोलन में इनका प्रमुख स्थान है। इन समितियों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है:


(क) सदस्यता तथा आकार:- इन साख समितियों को क्षेत्र सीमित रखा जाता है। विभिन्न राज्यों में इनकी सदस्य संख्या विभिन्न है। परंतु अधिकतर राज्यों में दस से अधिक व्यक्तियों को मिलकर एक समिति बनाने की सुविधा दी गई है। राष्ट्रीय विकास परिषद् ने यह नियम स्वीकार कर लिया है कि ग्राम समुदाय को प्राथमिक इकाई मानकर सहकारी समितियों को बनाया जाना चाहिए। सरैया समिति के अनुसार प्रति समिति की सदस्य संख्या औसत 32 है। (ख) उद्देश्यः - इन समितियों का मुख्य उद्देश्य अपने सदस्यों को अल्पकालीन तथा मध्यकालीन साख देना है। ये समितियाँ अपने सदस्यों में बचत करने की प्रवृति को भी प्रोत्साहन देती हैं। (ग) दायित्वः-सन् 1912 के सहकारी समिति कानून के अनुसार इन समितियों का दायित्व असीमित रखा गया है। कुछ अर्थशास्त्री सीमित दायित्व करने के पक्ष है परंतु उत्तर प्रदेश और बिहार को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में इन समितियों का दायित्व असीमित ही रखा गया है।


(घ) प्रबंधः - साख समितियों का प्रबंध प्रजातन्त्रात्मक तरीकों से किया जाता है। प्रत्येक सदस्य को एक ही वोट देने का अधिकार मिलता है चाहे उसके कितने ही शेयर क्यों न हों। सभी सदस्यों के संगठन को सामान्य समिति कहा जाता है। ये सदस्य अपने में से कुछ सदस्यों की प्रबंध समिति चुन लेते हैं। प्रबंध समिति के सदस्यों को वेतन नहीं दिया जाता, केवल मंत्री को ही कुछ वेतन दिया जाता है।


(ङ) वित्तः- ये समितियाँ अपने कार्य को चलाने के लिए वित्त कई साधनों से प्राप्त करती है। इन साधनों को दो भागों में बाँटा जा सकता है:


(i) आन्तरिक साधनः- इन समितियों के आन्तरिक साधन कई है, जैसे-प्रवेश शुल्क, शेयर पूँजी, सदस्यों की जमा तथा रिजर्व फण्ड । ये समितियाँ थोड़ी रकम के शेयर बेचकर पूँजी इकट्ठे करती है।


(ii) बाहरी साधनः- ये समितियाँ सरकार, केंद्रीय वित्त संस्थाओं, रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया आदि से धन प्राप्त करती हैं। इन समितियों में भेंट, दान, तथा अनुदान आदि के द्वारा भी धन की प्राप्ति होती है।


(च) कर्जेः- ये समितियां उत्पादन कार्यों के लिए अपने सदस्यों को अल्पकालीन ऋण देती हैं। ये मध्यकालीन साख भी एक सीमा तक दे सकती है। ऋण देते समय किसान की आर्थिक अवस्था पर विचार कर लिया जाता है और ॠण जमीन की जमानत पर दिए जाते है। अब फसल की जमानत पर भी ऋण दिए जाने लगे हैं। सदस्यों से ऋण पर ब्याज लिया जाता है किन्तु यह ब्याज काफी कम (6 प्रतिशत से 7 प्रतिशत) होता है। सदस्य अपने कर्जे किस्त में चुका सकते हैं।


(छ) लाभ का वितरण :- ये समितियाँ अपने लाभ का 25 प्रतिशत सुरक्षित कोष में रखकर बाकी अपने सदस्यों में बाँट देती हैं।


(ज) निरीक्षण:- इन समितियों को अपना हिसाब किताब रजिस्ट्रार द्वारा नियुक्त निरीक्षकों द्वारा निरीक्षण करवाना पड़ता है।


वर्तमान स्थिति - 2009-20 में प्राथमिक कृषि सहकारी समितियाँ की संख्या 94,942 हो गई है। इनके 1,320 लाख सदस्य है। इनकी जमाराशि रु. 97,224 करोड़ है। तथा रु. 49,614 करोड़ के ॠण दिए है। इनके रु. 58,620 करोड़ के ऋण बकाया है। शहरों में प्राथमिक सहकारी बैंकों की संख्या 1,587 है। इनकी जमा राशि रु. 93,089 करोड़ है। वर्ष 2006-07 में सहकारी बैंकों ने कृषि तथा संबंधित क्षेत्रों को रु. 42,480 करोड़ का संस्थागत साख उपलब्ध कराया।

(आ) केंद्रीय सहकारी बैंक


इन बैंकों की स्थापना 1912 के सहकारी समिति कानून के अनुसार हुई। ये बैंक प्राथमिक सहकारी समितियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने और उन्हें कुशलतापूर्वक संगठित करने में सहायक सिद्ध होते है। इन बैंकों की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है:


(क) सदस्यता तथा कार्यक्षेत्र:- केंद्रीय बैंक के सदस्य, साख समितियाँ, दूसरे प्रकार की सहकारी समितियाँ तथा सार्वजनिक क्षेत्र के प्रसिद्ध व्यक्ति बन सकते हैं।

ये बैंक एक जिले या उसके किसी भाग की प्राथमिक समितियों की देखरेख करते हैं तथा उनको वित्तीय सहायता देते हैं। इन बैंकों का दायित्व सीमित होता है।


(ख) प्रबंध: - इन बैंकों के सभी सदस्य सामान्य सभा का निर्माण करते हैं। इसका प्रबंध एक संचालक मण्डल द्वारा होता है, जिसे साधारण सभा हर वर्ष एक सदस्य एक वोट के आधार पर चुनती है। इनकी सदस्य संख्या अलग-अलग हैं परंतु साधारणतया इनके सदस्य 10 से 24 तक है। ये बैंक अपना कार्य चलाने के लिए प्रशिक्षित स्टॉफ वेतन पर रखते हैं।


(ग) कार्य:- इन बैंकों का मुख्य कार्य सदस्य समितियों को रूपया उधार देना है।

(i) प्राथमिक कृषि साख समितियों को ये बैंक बिना किसी जमानत के रूपया उधार देते है, बाकि सदस्यों से जमानत लेते हैं।


(ii) ये बैंक साधारण बैंकिंग कार्य जैसे लोगों का रूपया जमा करना, रुपये का स्थानान्तरण करना आदि कार्य भी करते हैं।


(iii) ये बैंक प्राथमिक समितियों की समस्याओं को सुलझाने में भी सहायता करते हैं। 


(iv) कुछ राज्यों में यें बैंक प्राथमिक समितियों के निरीक्षण का भी कार्य करते हैं।


(v) केंद्रीय बैंक प्राथमिक समितियों में संतुलन स्थापित करते हैं। जिन समितियों के पास धन अधिक होता है उनसे रुपया अपने पास जमा कराते है और यह रुपया उन समितियों को उधार देते हैं जिनके पास धन कम होता हैं।


(घ) पूँजी:- इन बैंकों को पूँजी चार साधनों से प्राप्त होती है: 


(i) शेयर पूँजी: ये बैंक अपने सदस्यों को हिस्से बेचते है, शेयरों का मूल्य रु. 10 से रु. 100 तक होता है।


(ii) जमा: ये बैंक सदस्यों और गैर सदस्यों, दोनों का ही रुपया जमा करते है। 


(iii) रिजर्व फंड: सन् 1912 के सहकारी समिति कानून के अनुसार इन बैंकों को अपने लाभ का 25 प्रतिशत भाग रिजर्व फण्ड के रूप में रखना पड़ता है। मेहता कमेटी ने यह सुझाव दिया था कि इन बैंकों को विशेष डूबा ऋण कोष बनाना चाहिए।


(iv) कर्ज: ये बैंक सस्ती दर पर सहकारी बैंकों तथा सरकार से भी कर्जा प्राप्त करते हैं।


संक्षेप में, इन बैंकों को कई साधनों से पूँजी प्राप्त होती है।


(ङ) कजैं:- ये बैंक व्यक्तियों और समितियों को कर्जे देते हैं समितियों को कर्जे उनके प्रतिज्ञा पत्रों के आधार पर दिए जाते हैं। व्यक्तियों को कर्जे के लिए जमानतें देनी पड़ती है। (च) प्रगतिः - मार्च, 2007 के अन्त में 371 केंद्रीय सहकारी बैंक कार्य कर रहे थे। इनकी जमाराशि रु. 94529 करोड़ है। इन्होंने रु. 89.038 करोड़ के ऋण दिए हैं। इनके रु. 67, 152 करोड़ के ऋण बकाया है। इसकी कुल परिसंपत्ति / दायित्व रु. 1,58,894 करोड़ था ।